(राष्ट्रीय मुद्दे) एनपीआर - राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (National Population Register (NPR) and Challenges)


(राष्ट्रीय मुद्दे) एनपीआर - राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (National Population Register (NPR) and Challenges)


एंकर (Anchor): कुर्बान अली (पूर्व एडिटर, राज्य सभा टीवी)

अतिथि (Guest): अमिताभ कुंडु (प्रोफेसर - जेएनयू), आलोक वाजपेई (पॉपुलेशन फाउंडेशन आफ इंडिया)

चर्चा में क्यों?

पिछले 24 दिसंबर को, केंद्रीय मंत्रिमंडल ने राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर यानी NPR अपडेट करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। साथ ही, मंत्रिमंडल ने इस काम के लिए खर्च होने वाले 8,500 करोड़ रुपये के भी प्रस्ताव पर भी अपनी सहमति दे दी। जनगणना आयोग के मुताबिक NPR का मकसद देश के हर "सामान्य निवासी" का एक व्यापक पहचान डेटाबेस तैयार करना है। हालांकि कुछ लोग सरकार के इस कदम का विरोध कर रहे हैं। विरोधियों का कहना है कि एनपीआर के जरिए सरकार पूरे देश भर में एनआरसी लागू करना चाह रही है।

राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर क्या है?

NPR ‘भारत में रहने वाले सामान्य निवासियों’ की एक सूची है। गृह मंत्रालय के मुताबिक, ‘देश का सामान्य निवासी’ की श्रेणी में ऐसे लोग आएँगे जो कम-से-कम पिछले छह महीनों से किसी स्थानीय क्षेत्र में रह रहा है या या फिर आगामी छह महीनों के लिये उस स्थान पर रहने का इरादा रखता है।

ऐसा कयास लगाया जा रहा है कि NPR को तैयार करने का काम पूरा होने के बाद एक नेशनल रजिस्ट्रेशन आइडेंटिटी कार्ड यानी NRIC तैयार करने की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। और एनपीआर एनआरआईसी को तैयार करने का एक आधार हो सकता है। इस तरह कुछ जानकारों का कहना है कि NRIC को असम के NRC का राष्ट्रीय संस्करण कहना गलत नहीं होगा।

कैसे तैयार किया जाएगा NPR?

NPR को तैयार करने का काम स्थानीय, उप-ज़िला, ज़िला, राज्य और राष्ट्रीय स्तरों पर किया जाएगा। आपको बता दें कि भारत के रजिस्ट्रार जनरल यानी RGI ने पहले ही 5,218 गणना ब्लॉकों के जरिए जानकारी इकट्ठा करने का काम शुरू कर दिया है। इस काम को 1,200 से अधिक गाँवों और 40 कस्बों और शहरों में एक पायलट परियोजना के तौर पर शुरू किया गया है। फाइनल गणना अप्रैल 2020 में शुरू होगी और सितंबर 2020 तक पूरी कर ली जाएगी।

NPR का कानूनी पहलू

नागरिकता कानून 1955 भारतीय नागरिकता से जुड़ा एक व्यापक कानून है। इसमें अब तक 5 बार संशोधन किया जा चुका है। साल 2004 में संशोधन के जरिए इस कानून में एनपीआर से जुड़े प्रावधान बनाए गए। नागरिकता कानून 1955 के धारा 14A के मुताबिक केंद्र सरकार देश के हर नागरिक का अनिवार्य पंजीकरण कर राष्ट्रीय पहचान पत्र जारी कर सकती है। इस काम के लिए नेशनल रजिस्ट्रेशन अथॉरिटी भी गठित की जा सकती है।

इस तरह NPR को नागरिकता कानून 1955 और नागरिकता (नागरिकों का पंजीकरण और राष्ट्रीय पहचान पत्र निर्गमन) नियम, 2003 के मुताबिक तैयार किया जा रहा है।

इस क़ानून के मुताबिक, देश के हर "सामान्य निवासी" को NPR में रजिस्ट्रेशन कराना जरूरी है। NPR को अपडेट करने का काम भारत के रजिस्ट्रार जनरल (RGI) के कार्यालय द्वारा जनगणना 2021 के पहले चरण के साथ शुरू कर दिया जाएगा। RGI भारत सरकार के गृह मंत्रालय के तहत काम करता है।

क्या NPR पहली बार लाया गया है?

दरअसल कारगिल युद्ध के बाद साल 2000 में तत्कालीन एनडीए सरकार ने एक कारगिल समीक्षा समिति गठित की थी। इस समिति ने नागरिकों और गैर-नागरिकों के अनिवार्य पंजीकरण की सिफारिश की थी। साल 2001 में इन सिफारिशों को सरकार ने मान लिया था और 2003 के नागरिकता (पंजीकरण और राष्ट्रीय पहचान पत्र जारी करना) के लिए नियम पारित किया।

इस तरह साल 2010 में यूपीए के शासन काल में पहली बार NPR को लागू किया गया था। उस समय जनगणना-2011 के पहले चरण के लिए, जिसे हाउसलिस्टिंग चरण कहा जाता है, एनपीआर से जुड़े डाटा को इकट्ठा किया गया था। उसके बाद 2015 में एनपीआर की इस डेटा को एक डोर-टू-डोर सर्वे के जरिए अपडेट किया गया। और अब इस बार पिछले 3 अगस्त को सरकार ने अधिसूचना जारी करके NPR को फिर से अपडेट करने की बात कही है।

किस तरह की जानकारी इकट्ठा की जाएगी NPR में?

मौजूदा NPR में जनसांख्यिकीय और बायोमेट्रिक (Biometric) दोनों प्रकार के डेटा एकत्र करेगा। बायोमेट्रिक जानकारी को देना बाध्यकारी नहीं होगा बल्कि निवासियों की इच्छा पर निर्भर करेगा।

हालांकि जांच के लिए मोबाइल नंबर, आधार, पैन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, वोटर आईडी कार्ड तथा पासपोर्ट संबंधी जानकारी भी एकत्र की जाएगी। साथ ही RGI जन्म और मृत्यु प्रमाण पत्र के नागरिक पंजीकरण प्रणाली को अपडेट करने के लिये भी काम कर रहा है।

गृह मंत्रालय के मुताबिक NPR में रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य है लेकिन दूसरी जानकारियों मसलन पैन नंबर, आधार, ड्राइविंग लाइसेंस और मतदाता पहचान पत्र आज से जुड़ी जानकारियाँ देना स्वैच्छिक है। इसके अलावा NPR के लिए निवासियों की जानकारी को ऑनलाइन अपडेट करने का विकल्प भी उपलब्ध रहेगा।

NPR और आधार नंबर के बीच क्या लिंक है?

आसान शब्दों में NPR को सामान्य निवासियों की एक सूची या फिर रजिस्टर के तौर पर समझा जा सकता है। इसमें शामिल डेटा को आधार कार्ड जारी करने या फिर गलती से दोबारा आधार कार्ड जारी ना हो जाए को रोकने के लिये भारतीय विशिष्‍ट पहचान प्राधिकरण (UIDAI) को भेजा जाएगा। इस प्रकार NPR में जानकारी के तीन सेक्शन हैं (i) डेमोग्राफिक डेटा (ii) बायोमेट्रिक डेटा और (iii) आधार नंबर (UID Number)।

NPR को लेकर दिक्कत क्या है?

सरकार ने NPR को अपडेट करने का काम ऐसे वक्त में शुरू किया है जब असम में लागू किये जा रहे NRC लिस्ट से 19 लाख लोगों को बाहर कर दिया गया है। ऐसे में लोगों के मन में एक संदेश सा पैदा हो गया है।

आधार कार्ड को लेकर निजता के अधिकार का उल्लंघन का मामला अभी शांत नहीं हो पा रहा है कि इसी बीच NPR भी अपडेट किया जाने लगा। और अब यहां भी वही सवाल उठ रहा है कि निजता के अधिकार का उल्लंघन हो सकता है।

पहचान पत्र को लेकर ढेर सारे कागज़ात मसलन आधार, वोटर कार्ड, पासपोर्ट आदि पहले से ही मौजूद हैं। ऐसे में NPR जैसी प्रक्रिया की अचानक कौन सी जरूरत आन पड़ी। यानी यह केवल पहचान पत्रों की भरमार लगाने वाली बात हुई।

NPR और निजता का मुद्दा

मौजूदा वक्त में निजता के मुद्दे पर बहस जारी है है लेकिन पायलट प्रोजेक्ट से पता चला है कि ज्यादातर लोगों को सरकार के साथ अपनी जानकारी साझा करने में कोई दिक्कत नहीं है। हालांकि दिल्ली जैसे कुछ शहरी क्षेत्रों में थोड़ा बहुत विरोध देखने को मिल सकता है।

बहरहाल निजता के मुद्दे को लेकर सरकार का कहना है कि NPR की जानकारी पूरी तरह से निजी और गोपनीय होगी। मतलब इसे किसी तीसरी पार्टी के साथ साझा नहीं किया जाएगा। इससे अलग कुछ जानकारों का कहना है कि इतनी बड़ी मात्रा में डाटा के संरक्षण के लिये सरकार ने क्या व्यवस्था की है इस पर कोई स्पष्टता क्यों नहीं है?

क्या फर्क है NPR और NRC में?

साल 1947 में जब भारत पाकिस्तान का बँटवारा हुआ तो बड़ी मात्रा में दोनों ओर से शरणार्थियों का स्थानांतरण हुआ। इस दौरान काफी संख्या में लोग असम से पूर्वी पाकिस्तान चले गए। लेकिन इन लोगों की ज़मीनें और संपत्तियां असम में थी, इस कारण इनमें से कई लोगों का आज़ादी के बाद भी भारत आना-जाना लगा रहा। इसका परिणाम यह हुआ कि मूल भारतीय नागरिकों और अवैध शरणार्थियों के बीच विभेद करना मुश्किल होने लगा। जिसके कारण कारण कई प्रकार की समस्याएं पैदा होने लगी। सरकार ने इस दिक्कत से निपटने के लिए साल 1951 में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर तैयार किया।

वर्ष 1971 में बांग्लादेश बनने के बाद भारी संख्या में बांग्लादेशी शरणार्थी भारत आये और इससे राज्य की आबादी का स्वरूप बदलने लगा। इसके ख़िलाफ़ 80 के दशक में अखिल असम छात्र संघ यानी आसू ने एक आंदोलन शुरू कर दिया। आसू के छह साल के संघर्ष के बाद वर्ष 1985 में असम समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे। इसमें तय किया गया कि 24 मार्च, 1971 से पहले असम आए लोग ही भारतीय नागरिकता के हक़दार होंगे।

नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटिज़न्स (NRC) एक ऐसा रजिस्टर है, जिसमें सभी वैध भारतीय नागरिकों का नाम शामिल किया जाता है। वर्तमान में, असम एनआरसी की व्यवस्था वाला इकलौता राज्य है। वर्ष 1951 में पहली बार राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर तैयार किया। अवैध शरणार्थियों से जुड़ी शिकायतें सिर्फ असम में ही नहीं बल्कि पड़ोसी राज्यों से भी आने लगी है। इसलिए ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि असम के अलावा एनआरसी की व्यवस्था अन्य राज्यों में भी लागू की जा सकती है।

जहां एनआरसी नागरिकता सिद्ध करने को लेकर जानी जा रही है वही एनपीआर नागरिकता से जुड़ा कोई जनगणना अभियान नहीं है। क्योंकि एनपीआर में भारतीयों का नाम तो शामिल किया ही जाएगा, इसके अलावा छह महीने से ज्यादा वक्त तक भारत में पहले से रह रहे या रहने वाले किसी विदेशी को भी इस रजिस्टर में शामिल किया जायेगा।

हालांकि NPR को असम में लागू नहीं किया जाएगा। यानी असम को छोड़कर देश के बाकी सभी क्षेत्रों के लोगों से जुड़ी सूचनाओं को एनसीआर में शामिल किया जाएगा।

NPR और NRC को लेकर कयास क्या है?

एनपीआर के जरिए निवासियों की जिस सूची तैयार किया जा रहा है, बाद में उसी सूची के जरिए सरकार से नागरिकों के सत्यापन के लिये राष्ट्रीय स्तर पर NRC शुरू कर सकती है। यानी एनपीआर, एनआरसी लागू होने की गारंटी तो नहीं देता, लेकिन इसकी संभावना ज़रुर नजर आती है। यही इसके विरोध की असल वजह भी है। यही कारण है कि एनआरसी का विरोध कर रहे बंगाल और केरल जैसे राज्यों ने एनपीआर के काम में सहयोग देने से मना कर दिया है। इस तरह इन राज्यों के मन में डर है कि NPR एक बड़ा तबका भारतीय नागरिकता से वंचित हो सकता है।

NPR को लेकर सरकार का क्या तर्क है?

किसी भी देश में सरकार के दो प्रमुख काम होते हैं पहला नीति निर्माण और दूसरा राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करना। इस लिहाज से सरकार के लिए जरूरी होता है कि वह अपने निवासियों का व्यापक पहचान डेटाबेस से जुड़ी जानकारी अपने पास रखे। ताकि सरकार को बेहतर नीति निर्माण और राष्ट्रीय सुरक्षा में सहूलियत मिल सके। इसके अलावा NPR के पक्ष में सरकार का तर्क है कि यह आगामी जनगणना को पूरा करने और तमाम कल्याणकारी योजनाओं से लाभ पहुंचाने में मददगार साबित होने वाला है। इस तरह कागज़ी कार्रवाई और लालफीताशाही में भी कमी आने की उम्मीद है।