(राष्ट्रीय मुद्दे) 70 वर्षों का भारतीय संविधान (70 Years of Indian Constitution)


(राष्ट्रीय मुद्दे) 70 वर्षों का भारतीय संविधान (70 Years of Indian Constitution)


एंकर (Anchor): कुर्बान अली (पूर्व एडिटर, राज्य सभा टीवी)

अतिथि (Guest): प्रो. सुब्रता मुखर्जी (राजनितिक विज्ञान के जानकार), टी. आर. रामाचंद्रन (वरिष्ठ पत्रकार)

परिचय

हमारा संविधान एक निर्जीव किताब मात्र नहीं है, बल्कि ये क्रियाशील संस्थाओं की जरूरतों और उम्मीदों के साथ लगातार विकसित होने वाला एक सजीव दस्तावेज़ है। आज के 70 साल पहले क़रीब 3 साल की व्यापक बहस के बाद 26 नवंबर 1949 को संविधान सभा द्वारा भारतीय संविधान को स्वीकार किया गया था। अनुच्छेद 394 के मुताबिक़ संविधान के 15 अनुच्छेद 26 नवंबर को ही प्रभावी हो गए थे। जबकि बाकी के प्रावधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुए। साल 2015 में इस 26 नवंबर को ही 'संविधान दिवस' के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया। हाल ही में, पिछले 26 नवंबर को संविधान का 70वां वर्षगांठ मनाया गया। इस मौके पर सरकार द्वारा कई आयोजन भी किये गए।

भारतीय संविधान का निर्माण

भारत में औपचारिक रुप से संविधान सभा के विचार को सबसे पहले एम.एन. रॉय ने सुझाया था। 31 दिसंबर 1929 को जवाहरलाल नेहरू द्वारा लाहौर अधिवेशन में संविधान सभा के बारे में ज़िक्र किया गया। 4 सप्ताह बाद, 26 जनवरी 1930 को 'पूर्ण स्वराज' दिवस के रूप में घोषित कर दिया गया। सबसे पहले, साल 1942 में क्रिप्स मिशन ने भारत में संविधान सभा के गठन की बात को पूरी तरह से स्वीकार किया था। लेकिन 1946 में कैबिनेट मिशन प्रस्ताव द्वारा इसे व्यवहारिक रूप दिया गया।

संविधान सभा के सदस्यों का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से प्रांतीय विधानसभा के सदस्यों द्वारा किया गया। संविधान सभा के कुल सदस्य संख्या 389 तय की गई लेकिन बंटवारे के बाद इसमें केवल 299 सदस्य ही रह गए। **संविधान बनाने में 2 वर्ष 11 माह 17 दिन लगे।**

नोट : संविधान बनाने में लगे समय में मतभेद है। लक्ष्मीकांत और कुछ अन्य पुस्तकों के मुताबिक़ संविधान बनाने में (2 वर्ष 11 माह 18 दिन) लगे थे, पर लोकसभा की आधिकारिक वेबसाइट में (2 वर्ष 11 माह 17 दिन) दिया हुआ है इसके लिए आप दिए गए लिंक से पुष्टि कर सकते है। (http://bit.ly/2DIoJD8)

11 दिसंबर 1946 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद को सर्वसम्मति से संविधान सभा का स्थाई अध्यक्ष और बी. एन. राव को संवैधानिक सलाहकार चुन लिया गया। एच.सी. मुखर्जी संविधान सभा के उपाध्यक्ष बने और संविधान सभा की कार्यवाही जवाहरलाल नेहरू द्वारा 13 दिसंबर 1946 को पेश ‘उद्देश्य प्रस्ताव’ के साथ प्रारंभ हुई। इसमें संविधान की संरचना के ढांचे व दर्शन के झलक थी। उद्देश्य प्रस्ताव को 22 जनवरी 1947 को मंजूरी मिल गई।

अक्टूबर 1947 में संविधान सभा के संवैधानिक सलाहकार बी. एन. राव ने संविधान का प्रथम प्रारूप तैयार किया, जिसमें कुल 243 अनुच्छेद और 13 अनुसूचियां थी। ग़ौरतलब है कि बी. एन. राव द्वारा तैयार संविधान के मूल पाठ पर विचार करने के लिए डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की अध्यक्षता में एक सात सदस्यीय प्रारूप समिति का गठन किया गया था। प्रारूप समिति ने संविधान के मूल पाठ पर विचार करने के बाद उसे 21 फरवरी 1948 संविधान सभा के सामने विचार के लिए रखा। संविधान सभा ने इस प्रारूप पर तीन चरणों में विचार किया और कई प्रकार के संशोधनों के बाद 26 नवंबर 1949 को इसे स्वीकार कर लिया गया। उस वक्त संविधान में कुल 395 अनुच्छेद, 8 अनुसूचियां और 22 भाग थे। मौजूदा वक्त में संविधान में कुल 448 अनुच्छेद 12 अनुसूचियां और 25 भाग हैं।

सभा की अंतिम बैठक 24 जनवरी 1950 को हुई इसी दिन से विधानसभा के सदस्यों से विधान पर अंतिम रूप से दस्तख़त किया और डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद को भारत का प्रथम राष्ट्रपति चुना गया। उसके बाद संविधान सभा को भंग कर उसे अंतरिम संसद में बदल दिया गया। इस तरह भारत के संविधान को पूरी तरह 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया। ग़ौरतलब है कि 1929 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन में पारित हुए संकल्प के आधार पर कांग्रेस द्वारा पूर्ण स्वराज दिवस मनाया गया था। इसीलिए संविधान को पूरी तरह से 26 जनवरी को लागू किया गया।

भारतीय संविधान की कुछ ख़ासियत

भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में संविधान की अपनी एक खास अहमियत है। लोकतांत्रिक सरकार में सरकार की शक्तियों और नागरिकों के अधिकारों के बीच एक स्पष्ट संतुलन और विभाजन होता है। सरकार और नागरिकों की गतिविधियों की सीमाएं किस प्रकार तय की जाए, यह बात संविधान द्वारा तय की जाती है। इस नज़रिये से, भारतीय संविधान की कुछ खासियत इस प्रकार हैं-

  • विशाल और विस्तृत लिखित संविधान
  • भारतीय संविधान के कई प्रावधान दूसरे देशों के संविधान और तमाम स्रोतों से लिए गए हैं।
  • कठोरता और लचीलेपन का मिश्रण
  • केंद्र सरकार के पक्ष में थोड़ा झुका हुआ संविधान
  • संसदीय व्यवस्था
  • संविधान की सर्वोच्चता
  • एक स्वतंत्र न्यायपालिका
  • संसदीय संप्रभुता और न्यायिक सर्वोच्चता में संतुलन और समन्वय
  • मौलिक अधिकार
  • नीति निदेशक तत्व
  • मूल कर्तव्य
  • एक पंथ निरपेक्ष राज्य
  • एकल नागरिकता
  • निर्वाचन आयोग, कैग और यूपीएससी जैसे स्वतंत्र एवं संवैधानिक निकाय
  • आपातकाल से जुड़े प्रावधान
  • तीन स्तर का सरकार

संविधान की आलोचना

उपर्युक्त तमाम खासियतों के बावज़ूद भारतीय संविधान के निम्नलिखित आधारों पर आलोचना की जाती रही है-

  • उधार का संविधान
  • संविधान का ज्यादातर हिस्सा 1935 के अधिनियम से लिया गया है।
  • काफी विशाल संविधान
  • तकनीकी दृष्टि से काफी जटिल संविधान या यूं कहें ‘वकीलों का स्वर्ग’
  • संतुलन के सिद्धांत के बावजूद विधायिका और न्यायपालिका में अक्सर टकराव की गुंजाइश

निष्कर्ष

26 जनवरी 1950 के बाद संविधान सभा का कार्य समाप्त हो गया, लेकिन न्यायिक व्याख्या और संशोधनों के जरिए संविधान निर्माण की प्रक्रिया आज भी जारी है। कुल मिलाकर, ‘संविधान’ शब्द का आशय कुछ भी माना जाए, लेकिन एक बात तो तय है कि संविधान का पूरा मूल्यांकन उसके केवल कुछ लिखित नियमों से नहीं किया जाना चाहिए। बल्कि बतौर एक संस्था, संगठन, सरकार या नागरिक हम संवैधानिक मूल्यों का हक़ीक़त में कितना पालन करते हैं, इस पर निर्भर करता है।




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