(Global मुद्दे) अमेरिका - ईरान तनाव (Tensions between America and Iran)



(Global मुद्दे) अमेरिका - ईरान तनाव (Tensions between America and Iran)


एंकर (Anchor): कुर्बान अली (पूर्व एडिटर, राज्य सभा टीवी)

अतिथि (Guest): क़मर आग़ा (मध्य पूर्व मामलों के जानकार), हर्ष वी. पंत (अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति के जानकार)

चर्चा में क्यों?

बीते दिनों अमेरिका ने एक हवाई हमले में ईरानी कुद्स बल के कमांडर जनरल क़ासिम सोलेमानी की हत्या कर दी। इस घटना के बाद से दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ गया है। अमरीका ने इसे अपने नागरिकों की सुरक्षा की लिहाज से उठाया गया कदम बताया। बदले में, ईरान ने बगदाद स्थित अमेरिकी दूतावास पर एक के बाद एक कई रॉकेट दागे। जिसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को धमकी देते हुए कहा कि इसका परिणाम अच्छा नहीं होगा।

सुलेमानी की मौत क्यों मायने रखती है?

जनरल कासिम सुलेमानी ईरान के राजनीतिक हल्के में ऊँची हैसियत रखता था। आयतुल्लाह अली खामेनेई के बाद जनरल सुलेमानी ईरान का सबसे ताक़तवर नेता माना जाता था।

  • ईरान के शीर्ष नेतृत्व में उसकी अच्छी ख़ासी पहुंच थी।
  • जनरल सुलेमानी महत्वपूर्ण सैन्य ऑपरेशनों के संचालन और ख़ुफ़िया जानकारी जुटाने में माहिर था। अमेरिका उसे अपने लिए एक खतरे के रूप में देखता था।
  • सीरिया, यमन और इराक जैसे जगहों पर ईरान द्वारा चलाए गए छद्म युद्धों का मास्टरमाइंड था।
  • अमेरिका का मानना था कि जनरल सुलेमानी ईरान में अमेरिका विरोधी भावनाएं भड़का रहा था।

किस तरह की नीतियाँ दोनों देश अपना रहे हैं?

अमेरिका: अमेरिका ईरान पर ‘अधिकतम दबाव बनाने की नीति’ अपना रहा है। इसके लिए वह परमाणु समझौते से बाहर आने, आर्थिक प्रतिबंध लगाने और ईरानी सेना को आतंकवादी संगठन घोषित करने जैसे कदम उठा रहा है।

ईरान: अमेरिका के खिलाफ ईरान ‘अधिकतम विरोध करने की नीति’ अपना रहा है। इसके लिए वह सऊदी के तेल टैंकरों पर हमला करवाने, अमेरिकी ड्रोन को मार गिराने और यमन में सक्रिय हूथी विद्रोहियों को सऊदी अरब के खिलाफ समर्थन देने जैसे कदम उठा रहा है।

क्यों बढ़ गया अमेरिकी-ईरान तनाव?

परमाणु क़रार का रद्द होना: साल 2015 में, जर्मनी समेत संयुक्त राष्ट्र के पांच स्थायी सदस्यों (P5+1) और ईरान के बीच एक परमाणु समझौता हुआ। समझौते के मुताबिक़ ईरान को अपने संवर्धित यूरेनियम भंडार को कम करने और अपने परमाणु संयंत्रों को संयुक्त राष्ट्र के निरीक्षकों को निगरानी की इजाज़त देनी थी। इसके अलावा इस समझौते के तहत ईरान को हथियार और मिसाइल ख़रीदने की भी मनाही थी। अमेरिका इन समझौते के बदले ईरान को तेल और गैस के कारोबार, वित्तीय लेन देन, उड्डयन और जहाज़रानी के क्षेत्रों में लागू प्रतिबंधों में ढील देने के लिए राजी था। लेकिन अमेरिका में रिपब्लिकन पार्टी को ये डील रास नहीं आयी और उन्होंने कहा कि अगर उनकी पार्टी सत्ता में आती है तो वे इस डील को रद्द कर देंगे। इसी के मुताबिक़ ट्रम्प प्रशासन ने पिछले साल इस परमाणु समझौते से बाहर होने का निर्णय ले लिया।

ईरान पर प्रतिबंधों का लगाया जाना: ईरान की अर्थव्यवस्था कमज़ोर करने के लिहाज़ से अगस्त, 2018 में अमेरिकी प्रशासन ने वे सभी प्रतिबंध फिर से उस पर लगा दिए जिन्हें परमाणु करार के तहत हटा लिया गया था। अमेरिका का मानना था कि आर्थिक दबाव के चलते ईरान नए समझौते के लिये तैयार हो जाएगा और अपनी हानिकारक गतिविधियों पर रोक लगा देगा।

अमेरिका द्वारा आइजीआरसी को आतंकी संगठन घोषित करना: अमेरिका ने बीते आठ अप्रैल को ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी आइजीआरसी को आतंकी संगठन घोषित किया। ऐसी पहली बार हुआ है कि किसी देश द्वारा किसी दूसरे देश के सरकारी सुरक्षा एजेंसी को आतंकी संगठन घोषित किया गया हो। बदले में ईरान ने भी अमेरिकी सेना को आतंकी समूह क़रार दे दिया।

तेल टैंकरों पर हमले के कारण तल्ख़ी और बढ़ गई: होरमूज स्ट्रेट में बीते 13 मई को चार अमेरिकी तेल टैंकरों पर हमला किया गया। अमेरिका को लगता है कि ये हमला ईरान ने कराया है लेकिन ईरान ने इन आरोपों को खारिज कर दिया। इसके बाद 24 मई को अमेरिकी प्रशासन ने इस क्षेत्र में अपनी स्थिति और मजबूत करने के लिहाज़ से 1500 और सैनिकों को भेजने का फैसला लिया।

ईरान ने अमेरिकी ड्रोन को मार गिराया: ईरान ने 20 जून को एक अमेरिकी ड्रोन को मार गिराया। ईरान ने दलील दी कि ड्रोन उसकी वायु सीमा में प्रवेश कर रहा था इसलिए इसे निशाना बनाया गया। लेकिन अमेरिका का कहना था कि ड्रोन अंतरराष्ट्रीय जल सीमा पर था। ईरान ने कहा कि अमेरिका चाहे कोई भी फैसला करे लेकिन ईरान अपनी सीमाओं का उल्लंघन बर्दाश्त नहीं करेगा और वो हर खतरे का जवाब देने को तैयार है।

अरामको पर ड्रोन हमला: बीते 14 सितम्बर को सऊदी अरब की सरकारी तेल कंपनी अरामको के दो बड़े ठिकानों - अबक़ीक़ और ख़ुरैस - पर भयानक ड्रोन हमले हुए। जिसके चलते अस्थाई तौर पर इन दोनों जगहों पर तेल उत्पादन प्रभावित हुआ। सऊदी अरब ने इस हमले का आरोप ईरान पर लगाया। अमेरिका ने भी हमले का आरोप ईरान पर मढ़ा और कहा कि उसका पास इस बात का पूरा प्रमाण है कि हमला ईरान द्वारा करवाया गया है। हालांकि ईरान ने अपने ऊपर लगे इन आरोपों को सिरे से ख़ारिज किया था। वहीं इससे अलग इस हमले की अधिकारिक ज़िम्मेदारी यमन के हूथी विद्रोहियों ने ली। ग़ौरतलब है कि यमन के हूथी विद्रोहियों को ईरान का समर्थन प्राप्त है।

बीते 27 दिसम्बर को इराक स्थित अमेरिकी दूतावास में तोड़-फोड़ और आगजनी, घटना का आरोप ईरान के मत्थे।

क्या है ईरान परमाणु समझौता?

ईरान परमाणु समझौता 2015 में ईरान और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों जर्मनी तथा यूरोपीय संघ के बीच वियना में हुआ था। समझौते के मुताबिक़ ईरान को अपने संवर्धित यूरेनियम के भंडार को कम करना था। और बचे हुए हिस्से की निगरानी अंतरराष्ट्रीय निरीक्षकों से कराना था।

अमेरिका इन समझौते के बदले ईरान को तेल और गैस के कारोबार, वित्तीय लेन देन, उड्डयन और जहाज़रानी के क्षेत्रों में लागू प्रतिबंधों में ढील देने के लिए राजी था। लेकिन साल 2016 में आए ट्रम्प ने इस समझौते को घाटे का सौदा बताया और मई 2018 में अमेरिका ईरान परमाणु समझौते से बाहर हो गया।

इस तनाव का क्या प्रभाव हो सकता है?

मध्य पूर्व में तनाव बढ़ने का असर एक नहीं बल्कि कई क्षेत्रों और देशों पर पड़ेगा। मसलन तेल की कीमतों में बढ़ोत्तरी देखी जा सकती है।

अपने जनरल और एक लोकप्रिय नेता के मारे जाने के बाद इरान बदले के तौर पर कई प्रकार के कदम उठा सकता है और उठा भी रहा है। इससे मध्य पूर्व में अस्थिरता बढ़ सकता है। कुछ लोग तो इसे तीसरे विश्व-युद्ध की शुरुआत के रूप में भी देखने लगे हैं। इस तनाव के आग की तपिश दुनिया के हर देश तक महसूस होगी।

मध्य-पूर्व तेल संसाधनों का एक बड़ा स्रोत है अगर इस जगह तनाव बढ़ता है तो तेल की कीमतों पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है।

इस तनाव के वक्त भारत के सामने क्या मुश्किलें हैं?

मध्यपूर्व में माहौल गरमाने से भारत भी अछूता नहीं रहने वाला है। क्योंकि मध्य पूर्व भारत से ज्यादा दूर नहीं है। ऐसे में भारत कतई नहीं चाहेगा कि वहां पर कुछ अनहोनी हो।

  • भारत के सामने ईरान और अमेरिका के साथ अपने संबंधों को संतुलित रखने की एक बड़ी चुनौती है। इन हालात में भारत को ऐसे रास्तों के बारे में सोचना होगा, जिससे ईरान के साथ हमारे रिश्ते भी मधुर बने रहें और अमेरिका भी नाराज़ न हो।
  • मध्य पूर्व में चल रहे अस्थिरता का असर तेल की कीमतों पर भी पड़ने वाला है और क्योंकि भारत तेल का बड़ा आयातक देश है ऐसे में इसका नकारात्मक प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी देखने को मिल सकता है।
  • एक आंकड़े के मुताबिक करीब 80 लाख भारतीय मध्य-पूर्व देशों में रह रहे हैं। भारत के सामने अपने इन नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती है।
  • खाड़ी देशों में रह रहे भारतीय अपने सगे संबंधियों को करीब 40 अरब डालर सालाना रेमिटेंसेस के रूप में भेजते हैं। अगर मध्य-पूर्व में युद्ध भड़कता है तो भारत को इसका आर्थिक ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ सकता है।
  • भारत में बड़ी तादाद में शिया मुस्लिम रहते हैं। अगर ईरान और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ता है तो भारत में भी इस तरीके के चरमपंथी विरोध की घटनाएँ देखने को मिल सकती हैं।