(Global मुद्दे) सीरिया-तुर्की संघर्ष (Syria-Turkey Conflict)



(Global मुद्दे) सीरिया-तुर्की संघर्ष (Syria-Turkey Conflict)


एंकर (Anchor): कुर्बान अली (पूर्व एडिटर, राज्य सभा टीवी)

अतिथि (Guest): पिनाक रंजन चक्रवर्ती (पूर्व राजदूत), प्रो. अब्दुल नाफ़े (कूटनीतिक मामलों के जानकार)

चर्चा में क्यों?

सीरिया से अमेरिकी सेना के हटने के बाद तुर्की ने सीरिया में मौजूद कुर्द लड़ाकों के ठिकानों पर हमला किया है। तुर्की ये हमला अपने सैन्य अभियान ऑपरेशन पीस स्प्रिंग के तहत कर रहा है। सीरिया में हुए इस हमले के बाद नागरिकों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और बुनियादी ढांचे की रक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ती जा रही हैं। दरअसल तुर्की द्वारा किये जा रहे हवाई हमलों का कई आम नागरिक भी शिकार हुए हैं। दुनिया भर के देश तुर्की के इस हमले के लिए तुर्की की आलोचना भी की है। तुर्की के इस फैसले पर भारत ने गहरी चिंता ज़ाहिर करते हुए ये अपील की कि वो सीरिया के क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करे। तुर्की का ये कदम क्षेत्र में स्थिरता और आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को कमजोर कर सकता है। इसके अलावा इस कदम से मानवीय संकट पैदा होने की संभावना है। साथ ही चिंता ये भी ज़ाहिर की रही है कि तुर्की के ये हवाई हमले दुनिया को ISIS के ख़िलाफ़ जंग में मिली क़ामयाबी को कम कर देंगे।

तुर्की ने उत्तर सीरिया में मौजूद कुर्दों पर क्यों किया हमला

तुर्की ने ये हमला ऐसे वक़्त में किया है जब अमेरिकी सैनिक सीरिया से वापस लौट चुके हैं और सीरिया के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में कुर्द लोगों की स्वयं की सरकार स्थायित्व प्राप्त कर रही थी। इसी मौके का फायदा उठाते हुए तुर्की सेना ने सीरिया के उत्तर-पूर्वी क्षेत्रें में हमला बोल दिया ताकि कुर्द लड़ाकों को यहाँ खदेड़ा जा सके।इसके अलावा तुर्की सरकार के मुताबिक़ पीपुल्स प्रोटेक्शन यूनिट यानी YPG, कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी PKK से ही जुड़ा हुआ है। ग़ौरतलब कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी PKK ने ही साल 1984 में तुर्की के साथ कुर्द स्वायत्तता के लिए लड़ाई लड़ी थी। तुर्की के मुताबिक़ पीपुल्स प्रोटेक्शन यूनिट YPG तुर्की की संप्रभुता और अखंडता के लिये खतरा है। इसके अलावा तुर्की में क़रीब 12 मिलियन कुर्द जातीय समूह के लोग रहते हैं ऐसे में तुर्की का कहना है कि अगर पीपुल्स प्रोटेक्शन यूनिट YPG दोबारा किसी भी तरह का कुर्द राष्ट्रवादी आंदोलन शुरू करता है और अलग कुर्दिस्तान की मांग करता है तो इसका असर तुर्की पर पड़ेगा और तुर्की में रह रहे कुर्द लोगों के मन में भी अलगाववाद की भावना पैदा होगी।

हमले के पीछे तुर्की का मक़सद

दरअसल तुर्की सीरिया के साथ सीमा साझा करता है। ऐसे में तुर्की सीरिया के साथ लगने वाले सीमा को सुरक्षित क्षेत्र घोषित करना चाहता है। जानकरों के मुताबिक़ ये क्षेत्र लगभग 480 किमी. लंबा होगा और सीरिया में 30 किमी. तक फैला होगा। तुर्की इस क्षेत्र को सुरक्षित इस लिए बनाना चाहता है ताकि वो मौजूदा वक़्त में सीरिया से तुर्की भाग कर आए क़रीब 3.6 मिलियन से अधिक सीरियाई शरणार्थियों को रहने के लिये जगह मुहैया करा सके।

ऑपरेशन पीस स्प्रिंग क्या है?

तुर्की ने सीरिया के उत्तर-पूर्व में पीपुल्स प्राटेक्शन यूनिट और इस यूनिट के समर्थन वाली कुर्द सरकार के विरुद्ध अपनी सैन्य कार्रवाई को ‘ऑपरेशन पीस स्प्रिंग’ नाम दिया है। तुर्की का कहना है कि ‘कुर्दिस वर्कस पाटी’ और ‘पीपुल्स प्रोटेक्शन यूनिट’ दोनों ही चरमपंथी संगठन हैं जो तुर्की व मध्य-पूर्व के स्थायित्व और शांति के लिए खतरा हैं। दरअसल तुर्की, सीरिया के उत्तर-पूर्व में ऑपरेशन पीस स्प्रिंग द्वारा सीरिया के उन समूहों एवं शरणार्थियों को बसाना चाहता है जो तुर्की से मित्रतापूर्ण संबंध रखते हैं। तुर्की इस लिए सीरिया की सीमा से लगने वाली सीमा को सुरक्षित क्षेत्र में तब्दील करना चाहती हैं जहां ऐसे लोगों को बसाया जाए जो तुर्की के प्रति सहानुभूति रखते हों। ग़ौरतलब है कि सीरिया में कई ऐसे समुदाय या समूह हैं जो तुर्की के प्रति सहानुभूति रखते हैं। यदि ये सहानुभूति रखने वाले लोग सीरिया के उत्तर-पूर्व में तुर्की की सीमा के पास बस जायेंगे, तो सीरिया के कुर्दों और तुर्की के कुर्दों के बीच संपर्क टूट जायेगा इसका परिणाम यह होगा तुर्की कुर्दिस्तान की माँग शिथिल पड़ेगी।

सुरक्षित क्षेत्र (Safe Zone) क्या है?

सीरिया के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में तुर्की अपनी सीमा को सुरक्षित करने के उद्देश्य से यहाँ एक ‘सुरक्षित क्षेत्र’का निर्माण करना चाहता है, इसीलिए वह इस क्षेत्र से अपने विरोधी ‘कुर्दों’ को खदेड़ रहा है। संरक्षित क्षेत्र उत्तर-पूर्वी सीरिया क्षेत्र में तुर्की सीमा के साथ-साथ लगभग 480 किमी लम्बा और 30 किमी चौड़ा एक पट्टीनुमा क्षेत्र होगा। इसमें तुर्की के हितों के रक्षक लोग (सीरियाई शरणार्थी) रहेंगे। ग़ौरतलब है कि सीरियाई शरणार्थी ऐसे लोग हैं जो सीरिया में गृह युद्ध के दौरान तुर्की में पलायन कर गये थे। इसके अलावा ये तुर्की से यूरोपीय एवं अन्य देशों की ओर भी गये हैं, लेकिन ज्यादातर अभी तुर्की में ही रह रहे हैं।

कुर्द-तुर्की संघर्ष और विश्व

कुर्द और तुर्की के बीच मौजूदा वक़्त में चल रहे संघर्ष की वैश्विक स्तर पर आलोचना की जा रही है, जिसे आप निम्नांकित बिन्दुओं के ज़रिए समझ सकते हैं-

  • अमेरिका सहित विश्व के अन्य लोग इस संघर्ष के पीछे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्पकी गलत नीतियों को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। इनका कहना है कि अमेरिकी सरकार ने सीरिया के उत्तर-पूर्वी खेत्रें से अचानक सेना वापस बुला ली, जिससे तुर्की को सैन्य कार्रवाई का मौका मिल गया। अमेरिका को चाहिए था कि इस क्षेत्र से धीरे-धीरे चरणबद्ध तरीके से सेना की वापसी सुनिश्चित की जाती ताकि वहाँ शांति और स्थायित्व के लिए समय मिलता।
  • सीरियन डेमोक्रेटिक फोर्स के प्रमुख अंग ‘पीपुल्स प्रोटेक्शन यूनिट’ ने सीरिया में इस्लामिक स्टेट को खत्म करने के लिए अग्रणी भूमिका निभायी थी। इस यूनिट ने मध्य-पूर्व से आतंकवाद को खत्म करने हेतु अमेरिका का भरपूर साथ दिया था और आतंकियों के विरुद्ध जमीनी लड़ाई में सबसे आगे रहा था। तो इस स्थिति में जानकारों द्वारा यह सवाल उठाना लाज़मी है कि कभी अमेरिका की सहयोगी रही पीपुल्स प्रोटेक्शन यूनिट को अमेरिका एकदम से अकेला कैसे छोड़ सकता है? यह स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब साधनविहीन कुर्द लड़ाकों के विरुद्ध साधन सम्पन्न तुर्की सेना हो।
  • जानकारों का मानना है कि अमेरिका सिर्फ अपने फायदे को देखते हुए काम करता है। उसके इस विचार को अफगानिस्तान में भी देखा जा सकता है, दरअसल सोवियत संघ को संतुलित करने के लिए अमेरिका ने अफगानिस्तान को गृहयुद्ध की स्थिति में ढकेल दिया और अब वह तालिबान जैसे चरमपंथी व आतंकी समूहों से समझौता करने में लगा है और इसी प्रकार की रणनीति को अमेरिका ने सीरिया में भी अपनाया है।
  • अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका जानबूझ कर पश्चिम एशिया के क्षेत्र को अशांत रखना चाहता है ताकि उसे सस्ती दरों पर कच्चा तेल (पेट्रोलियम) प्राप्त हो सके। गौरतलब है कि पश्चिम एशिया के कई क्षेत्र पेट्रोलियम संसाधन से संपन्न हैं, ऐसे में जिस शक्ति का इन पर नियंत्रण होता है, अमेरिका उसके साँठ-गाँठ करके ‘तेल की राजनीति’करता है।
  • अमेरिका ने चौतरफा दबाव को देखते हुए तुर्की के साथ एक अस्थाई संघर्ष विराम का समझौता किया है ताकि मतभेदों को दूर करके स्थिति को सामान्य किया जा सके। लेकिन विशेषज्ञों की राय है कि अमेरिका और तुर्की के बीच हुआ अस्थाई संघर्ष विराम का समझौता का असर नहीं हो रहा है क्योंकि तुर्की की सेना और कुर्द लड़ाकों के बीच रुक-रुककर गोलाबारी जारी है। इसके अतिरिक्त, तुर्की लगातार कड़े बयान दे रहा है कि वो किसी भी दबाव के आगे झुका नहीं और कुर्दों के विरुद्ध तब तक कार्रवाई जारी रहेगी जब तक वो सुरक्षित क्षेत्र से पीछे नहीं हट जाते हैं। इसके अलावा तुर्की का कहना है कि अमेरिका के साथ हुआ संघर्ष विराम समझौता हमारी शर्तों पर हुआ है। अमेरिका को इस समझौते के द्वारा सिर्फ कुछ समय दिया गया है जिससे कि वो चरमपंथी ताकतों को सुरक्षित क्षेत्र छोड़ने हेतु समझा सके।
  • यूरोपीय संघ ने अमेरिका की ही तरह तुर्की पर आर्थिक एवं अन्य प्रतिबंध लगाने की कड़ी चेतानवी दी हैं इसके जवाब में तुर्की का कहना है कि वह सीरिया के आये शरणार्थियों को संरक्षित क्षेत्र में बसा रहा है यदि इस योजना में बाधा आयी तो मध्यपूर्व से पश्चिमी देशों की ओर जाने वाले शरणार्थियों की संख्या में इजाफा होगा जिसका खामियाजा सभी को भुगतना पड़ेगा।
  • सीरिया में रूस और ईरान जैसे देशों के अपने हित हैं। यही कारण है कि इन देशों ने अभी तक तुर्की पर अतिरिक्त दबाव नहीं बनाया है। भारत के ऐसे पड़ोसी देश जो आंतकवाद के पोषक हैं और उसे अपनी विदेश नीति का एक उपकरण मानते हैं उन्होंने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से तुर्की का समर्थन किया है।

कौन हैं कुर्द?

कुर्द दुनिया का सबसे बड़ा राज्यविहीन जातीय समूह है। दुनिया भर में मौजूद कुर्दों की संख्या क़रीब 35 - 40 मिलियन है। कुर्द दक्षिणी और पूर्वी तुर्की, उत्तरी इराक, उत्तरपूर्वी सीरिया, उत्तर-पश्चिमी ईरान और दक्षिण आर्मेनिया जैसे इलाक़ों में अल्पसंख्यक समूह के रूप में रहते हैं। ज़्यादातर कुर्द फारसी और पश्तो से से जुडी भाषाओँ का प्रयोग करते हैं। कुर्दों को इतिहास से ही एक कुशल योद्धा के रूप में जाना जाता है।

क्या है कुर्द और तुर्की के बीच संघर्ष की कहानी

कुर्दों की क़रीब 35 - 40 मिलियन संख्या होने के बावजूद भी उनकी अपनी ख़ुद की कोई ज़मीन या कोई राष्ट्र नहीं रहा है। पहले विषय युद्ध के बाद कुर्दों ने वर्साय के शांति सम्मेलन में एक नए कुर्दिस्तान का प्रस्ताव रखा था। इस प्रस्ताव के तहत नए कुर्दिस्तान में तुर्की, इराक और ईरान के कुछ इलाक़ों को शामिल किए जाने की बात थी। लेकिन 1920 की सेव्रेस संधि ने क़ुर्दों को कुर्दिस्तान के लिए काफी कम क्षेत्र दिया जिसका ज़्यादातर हिस्सा तुर्की में ही शामिल था।

1920 की इस संधि के बाद तुर्की ने 1923 में मित्र देशों के साथ एक लॉज़ेन की संधि की और सेव्रेस संधि को ख़त्म कर दिया गया। लॉज़ेन संधि के तहत कुर्दिस्तान के लिये मिलने वाला पूरा क्षेत्र तुर्की को मिल गया जिसके बाद तब से आज तक कुर्द लोग एक अलग कुर्दिस्तान की मांग समय-समय पर करते रहे हैं। इसी क्रम में साल 1978 में मार्क्सवादी क्रांतिकारी अब्दुल्ला अकालान ने एक आज़ाद कुर्दिस्तान के निर्माण के लिए कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी का गठन किया।

कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी ने साल 1984 में तुर्की की सेना के ख़िलाफ़ जंग शुरू कर दी और वो लड़ाई साल 1999 तक जारी रही। ग़ौरतलब है कि कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी और तुर्की के बीच चले इस संघर्ष के दौरान क़रीब 40,000 कुर्द नागरिक मारे गए। कुर्दिस वर्कर्स पार्टी और तुर्की सेना के बीच अस्सी के दशक में शुरू हुई जंग आज तक जारी है। हालाँकि समय-समय पर इस संघर्ष पर विराम जरूर लगे किन्तु कुर्द लोगों की कुर्दिस्तान की माँग खत्म नहीं हुई है।

सीरिया में विद्रोही लड़ाकों और ISIS का उदय

सीरियाई सरकार के इस कदम के बाद सैकड़ों समूह ऐसे थे जो सरकार का विरोध कर रहे थे। इन्हीं समूहों में इस्लामिक स्टेट IS भी शामिल था जो बशर अल-असद के खिलाफ था। उग्रवादी और हिंसक विचारों वाले इस्लामिक स्टेट IS ने उन सभी के ख़िलाफ़ हथियारों का प्रयोग किया जो इस्लामिक स्टेट के विचारों से सहमत नहीं थे। साल 2014 तक आते - आते इस्लामिक स्टेट ने सीरिया के पड़ोसी मुल्क़ इराक में भी अपना काफी विस्तार किया और इसके बाद वे पूर्वी सीरिया की ओर चले गए।

कुर्द पीपुल्स प्रोटेक्शन यूनिट और सीरियन डेमोक्रेटिक फोर्सेज़

इस्लामिक स्टेट अपने उदय के कुछ ही सालों बाद मानवता के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बन गया। दुनिया भर में उसे रोकने की ज़रूरत महसूस होने लगी थी। इसी क्रम में सितंबर 2014 में अमेरिका ने IS के खात्मे के मक़सद से सीरिया में हवाई हमले शुरू किए। हालाँकि अमेरिका इन हवाई हमलों से क़ामयाब नहीं हुआ। इसके बाद अमेरिका ने IS के ख़िलाफ़ कुर्द पीपुल्स प्रोटेक्शन यूनिट YPG में शामिल कुर्द लोगों और सीरियाई अरबों के साथ मिलकर साल 2015 में सीरियन डेमोक्रेटिक फोर्सेज़ SDF का गठन किया। ग़ौरतलब है कि अमेरका द्वारा बनाए SDF में काफी अधिक संख्या में कुर्द सैनिक शामिल थे जिन्हें अमेरिका ने IS ख़िलाफ़ लड़ने के लिए आर्थिक व सैन्य सुविधाएँ मुहैया कराई थी। इस तरह से अमेरिका ने SDF के ज़रिए सीरिया से इस्लामिक स्टेट का खात्मा कर दिया। इसके बाद सीरिया के उन इलाकों (उत्तर-पूर्वी क्षेत्र) में जहाँ कुर्द जनसंख्या ज्यादा रहती है वहाँ कुर्द लोगों ने अपनी सरकार बना ली और इस सरकार को पीपुल्स प्रोटेक्शन यूनिट YPG का पूरा सहयोग प्राप्त हुआ।

सीरियन डेमोक्रेटिक फोर्सेज़ SDF के पीछे क्या थे अमेरिका के मक़सद

जानकारों का कहना है कि SDF के गठन के पीछे अमेरिका का मक़सद सिर्फ इस्लामिक स्टेट को हराना ही नहीं था, बल्कि वो कुर्द लड़ाकों के ज़रिए बशर अल-असद की सत्ता को भी सीरिया से उखाड़ फेंकना चाहता था। अमेरिका ये सब सीरिया के एक ईंधन संपन्न देश होने के नाते चाहता था, हालाँकि वो ऐसा करने में नाक़ामयाब रहा क्यूंकि बशर अल-असद रूस के ज़्यादा करीबी थे।

मौजूदा वक़्त में कहां है इस्लामिक स्टेट

अब सीरिया के किसी भी शहर पर इस्लामिक स्टेट का कब्जा नहीं है। अमेरिका और सीरियन डेमोक्रेटिक फोर्सेज़ ने मिलकर इस्लामिक स्टेट को सीरिया से खदेड़ दिया है। मौजूदा वक़्त में इस्लामिक स्टेट लड़ाके मरुस्थली क्षेत्रें की ओर भाग गये हैं।

कुर्द-तुर्की संघर्ष और भारत

भारत ने तुर्की की तरफ से सीरिया के पूर्वोत्तर हिस्से में की जा रही अकारण सैन्य कार्रवाई पर कड़ा एतराज जताया है। भारत का कहना है कि तुर्की की इस कार्रवाई से न सिर्फ सीरिया के उत्तर-पूर्व क्षेत्र की शांति व स्थिरता में बाधा आयेगी बल्कि आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक लड़ाई भी कमजोर पड़ेगी। तुर्की की सैन्य कार्रवाई सीरिया की संप्रभुता पर चोट है, ऐसे में किसी देश को दूसरे देश के आंतरिक मामलों पर कार्रवाई से बचना चाहिए। इस तरह की कार्रवाई से बड़ा मानवीय संकट पैदा होने का खतरा है। इसके अतिरिक्त भारतीय विदेश मंत्रलय ने कहा कि हम तुर्की से आग्रह करते हैं कि वह संयम बरते और सीरिया की भौगोलिक संप्रभुत्ता और अखंडता का आदर करे। हम सभी मामलों का शांतिपूर्ण बातचीत से सुलणने का भी आग्रह करते हैं।

ग़ौरतलब है कि बीते दिनों कश्मीर मुद्दे पर तुर्की द्वारा भारत के ख़िलाफ़ की गई प्रतिक्रिया के बाद दोनों देशों के संबंधों में तल्ख़ी आई है। दरअसल जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 के हटने के बाद तुर्की के राष्ट्रपति ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में पाकिस्तान का समर्थन करते हुए इस मुद्दे पर ‘गहरा खेद’व्यक्त किया था। इसके अलावा कुछ दिन पहले भारत ने भी नौसेना सहायता जहाज़ के निर्माण के लिये तुर्की की रक्षा कंपनी अनादोलू शिपयार्ड के साथ हुई एक परियोजना को रद्द कर दिया है और कंपनी को भारतीय रक्षा बाज़ार में प्रतिबंधित कर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत भी अपनी विदेश रणनीति में संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है। हालाँकि भारत हमेशा मानवता का पक्षधर रहा है। और हर देश की संप्रभुत्ता का सम्मान किया है। इन सब के अलावा सीरिया पर तुर्की द्वारा किए गए हमले का असर भारत पर भी पड सकता है। दरअसल इस हमले से मध्य-पूर्व के देशों में तेल उत्पादन के प्रभावित होने की सम्भावना है। ऐसे में वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतों में इज़ाफ़ा होगा जोकि भारत के आर्थिक दृष्टि से लाभकारी नहीं होगा।

आगे की राह

अमेरिका सहित पूरी विश्व बिरादरी को तुर्की पर दबाव बनाने की आवश्यकता है ताकि सीरिया के कुर्दों के मानव अधिकारों को संरक्षित किया जा सके। अमेरिका को अपना प्रभाव का इस्तेमाल करके एक स्थाई संघर्ष विराम समझौता करना होगा और सीरिया के उत्तर-पूर्व में वहाँ के मूल निवासियों की पुनर्वापसी सुनिश्चित करनी होगी। सभी पक्षों को यह समझने की आवश्यकता है कि किसी भी मुद्दे का हल युद्ध या संघर्ष नहीं हो सकता, बल्कि इसके लिए शांतिपूर्ण वाता हो सबसे उपर्युक्त रास्ता है। आज विश्व को गाँधीवादी की ओर देखने की आवश्यकता है, गाँधीजी का मानना था कि मानवता ही सर्वोपरि धर्म है और शांति व अहिंसा मानव के सबसे बड़े हथियार हैं।