(Global मुद्दे) विश्व व्यापार संगठन की प्रासंगिकता (Relevance of World Trade Organization - WTO)



(Global मुद्दे) विश्व व्यापार संगठन की प्रासंगिकता (Relevance of World Trade Organization - WTO)


एंकर (Anchor): कुर्बान अली (पूर्व एडिटर, राज्य सभा टीवी)

अतिथि (Guest): अशोक सज्जनहार (पूर्व राजदूत), शिशिर सिन्हा (आर्थिक मामलों के जानकार)

चर्चा में क्यों?

विश्व व्यापार संगठन यानी (WTO) को आमतौर पर अंतरराष्ट्रीय व्यापार विवादों पर अंतिम फैसला सुनाने वाली संस्था के तौर पर देखा जाता है। लेकिन पिछले 10 दिसंबर के बाद से यह संगठन किसी भी विवाद का फैसला देने में असमर्थ हो चुकी है। दरअसल WTO की अपीलीय निकाय के तीन में से दो जजों के रिटायर होने के बाद अब यह किसी मामले की सुनवाई नहीं कर सकता है। आम तौर पर इस निकाय में 7 जज होते थे। लेकिन अमेरिका की ओर से जजों की नियुक्ति और बजट में अड़ंगों के चलते यह संख्या 3 के न्यूनतम कोरम तक आ गई थी। और अब तो इसमें केवल एक जज बचा हुआ है।

विश्व व्यापार संगठन की संरचना

विश्व व्यापार संगठन (पूर्व नाम गैट (GATT)) 1 जनवरी, 1995 को बहुआयामी व्यापार समझौते के उरुग्वे दौर में तात्कालिक सदस्यों की सहमति से अस्तित्व में आया। भारत दोनों ही संगठनों के संस्थापक सदस्यों में से एक रहा है। डब्ल्यूटीओ का मुख्यालय जेनेवा (स्विट्ज़रलैंड) में स्थित है। इसके सदस्यों की संख्या 164 है।

विश्व व्यापार संगठन के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं- व्यापार समझौतों को प्रशासित करना, व्यापार प्रतिनिधियों के लिए फोरम की स्थापना करना, व्यापार विवादों को सुलझाना, व्यापार नीतियों की निगरानी करना, विकासशील देशों के लिए तकनीकी सहयोग व प्रशिक्षण देना तथा अन्य अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं से सहयोग करना। विश्व व्यापार संगठन की संरचना तीन स्तरीय होती है-

  • मंत्री स्तरीय सम्मेलन
  • सामान्य परिषद
  • महानिदेशक एवं सचिवालय

डब्ल्यूटीओ की शीर्ष इकाई मंत्रिस्तरीय सम्मेलन है। इसके सारे नीतिगत निर्णय एवं समझौते इसी इकाई द्वारा किए जाते हैं। इसमें प्रत्येक सदस्य देश का एक-एक प्रतिनिधि होता है। इसकी बैठक प्रत्येक दो वर्षों की अवधि में एक बार अनिवार्य रूप से होती है। मंत्रिस्तरीय सम्मेलन के निर्णयों एवं समझौतों के कार्यान्वयन की देखरेख के लिए एक सामान्य परिषद (General Council) की व्यवस्था की गई है जिसमें सभी सदस्य देशों के प्रतिनिधि रहते हैं। सामान्य परिषद को अन्य समितियों के लिए नियम एवं प्रक्रिया निर्धारित करने का अधिकार प्राप्त है। सामान्य परिषद की सहायता के लिए सेवा व्यापार परिषद, वस्तु व्यापार परिषद एवं व्यापार से जुड़े बौद्धिक सम्पदा अधिकार परिषद बनाई गयी है जो सामान्य परिषद की देखरेख एवं सामान्य निर्देशन के अंतर्गत कार्य करती है।

विश्व व्यापार संगठन के निर्णयों एवं समझौतों के कार्यान्वयन के लिए जेनेवा में एक सचिवालय है जो एक महानिदेशक की नियुक्ति मंत्रिस्तरीय सम्मेलन के द्वारा की जाती है ओर इसके अधिकार, कर्त्तव्य एवं सेवा शर्तों का निर्धारण भी मंत्रिस्तरीय सम्मेलन द्वारा ही किया जाता है।

फैसले कैसे होते हैं डब्ल्यूटीओ में?

डब्ल्यूटीओ में फैसले तीन स्तरों पर होते हैं। पहले चरण में वादी और प्रतिवादी देशों को बातचीत और आपसी सहमति का मौका दिया जाता है। ऐसा नहीं होने पर एक पैनल का गठन होता है, जो फैसले देता है। इसका फैसला मान्य नहीं होने पर अपीलीय निकाय में अपील की जा सकती है। अब तक डब्ल्यूटीओ में आए 592 व्यापार विवादों में से 118 आपसी सहमति से ख़त्म हो गए, जबकि 137 मुद्दों पर अपील किए गए। फिलहाल WTO में सभी स्तरों पर भारत के 30 मामले लंबित हैं, जिनमें 12 में वह याची और 18 में प्रतिवादी है। लेकिन अपीलीय निकाय में लंबित कुल 14 अपीलों में सिर्फ दो भारत की हैं।

डब्ल्यूटीओ और अमेरिका

विश्व व्यापार संगठन के प्रावधान में यह स्पष्ट रूप से कहा गया कि सभी सदस्य देशों को अपने व्यापारिक या संबंधित नियमों को विश्व व्यापार संगठन के प्रावधान के अनुसार परिवर्तन करने की अनिवार्यता है, वह भी एक निर्धारित अवधि में ही। लेकिन गंभीरता से विचार करने पर यह स्पष्ट होता है कि यह अनिवार्यता अमेरिका के लिए नहीं है।

ज़ाहिर है कि विश्व व्यापार संगठन के कानूनी समझौते के प्रावधान अमेरिका पर बाध्यकारी नहीं है। विश्व व्यापार संगठन के तहत व्यापार शब्द का प्रयोग व्यापक अर्थ में किया गया है, इसके अंतर्गत लगभग पूरी अर्थव्यवस्था आ जाती है, मसलन- कृषि, बौद्धिक सम्पदा एवं सेवा क्षेत्र आदि इन नए क्षेत्रों के व्यापार में शामिल होने का लाभ मुख्य रूप से अमेरिका के साथ अन्य विकसित देशों को मिलने की संभावना अधिक है, क्योंकि उनकी प्रतिस्पर्द्धा शक्ति विकासशील देशों के मुकाबले ज़्यादा है। साथ ही, यह भी विचारणीय है कि जिन क्षेत्रों में विकसित देशों की प्रतिस्पर्द्धा शक्ति सशक्त नहीं रहती थी, उन क्षेत्रों को गैट अथवा विश्व व्यापार संगठन से नहीं जोड़ा गया।

पुनः जब अमेरिका समेत अन्य विकसित देशों की प्रतिस्पर्द्धा शक्ति जिन क्षेत्रों में विकसित हुई, उन क्षेत्रों को विश्व व्यापार संगठन के क्षेत्र में शामिल किया गया, मिसाल के तौर पर बौद्धिक सम्पदा एवं सेवा क्षेत्र को लिया जा सकता है। इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि विश्व व्यापार संगठन के क्षेत्र के फैलाव एवं व्यापार शब्द की व्यापकता का प्रभाव विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल रूप से ही पड़ेगा।

विश्लेषण

विश्व व्यापार संगठन के उद्देश्य बहुत ही व्यापक, आकर्षक एवं विकासशील तथा अल्प विकसित देशों के हित में हैं और यह विश्व के आर्थिक संसाधनों का आदर्शात्मक उपयोग इस तरह से करना चाहता है जिससे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मुक्त एवं भेद-भाव रहित व्यापार के माध्यम से सभी सदस्य देशों को फायदा हो सके तथा विकासशील देशों को विशेष रूप से लाभ मिल सके। लेकिन गहराई से विचार करने पर यह स्पष्ट होता है कि ये उद्देश्य सुनने में आकर्षक एवं सर्वकल्याणकारी भले ही लगे मगर सच्चाई ये है कि ये अस्पष्ट एवं भ्रामक हैं। ये ऐसी मान्यताओं पर आधारित हैं जिन्हें आर्थिक विशेषज्ञों ने विश्व के संदर्भ में गलत माना है।

यह भी ध्यान में रखना ज़रूरी है कि अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का महत्त्व सभी देशों में समान रूप से नहीं है और व्यापार के ज़रिए सभी देशों का न तो विकास हो सकता है और न ही पूर्ण रोज़गार की स्थिति प्राप्त की जा सकती है। मसलन, भारत की मुख्य आर्थिक समस्या गरीबी एवं बेरोज़गारी की है और इसके समाधान के लिए विशेष प्रकार के कार्यक्रमों को चलाना आवश्यक है।

विश्व व्यापार संगठन के उद्देश्यों की धुरी उदारीकरण एवं भूमंडलीकरण है और मुक्त एवं भेद-भावरहित अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के माध्यम से विकसित देशों का अन्तर्निहित उद्देश्य अपने हित को बढ़ाना है और केवल दिखावे के लिए विकासशील एवं अति अल्पविकसित देशों को कुछ छोटी-छोटी रियायतें देने के प्रावधान किए गए हैं।

अपीलीय निकाय एवं भारत

लगभग 25 साल तक दुनिया के व्यापार नियमों का संचालन और निगरानी करता आ रहा विश्व व्यापार संगठन (WTO) अब सिर्फ नाम का रह गया है। जहां WTO भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए वैश्विक मंच पर फरियाद और सुनवाई का एकमात्र लोकतांत्रिक मंच है, वहीं अमेरिका जैसे विकसित देश इससे मनमाफिक फ़ैसलों की उम्मीद करने लगे हैं। अमेरिका ने तो जजों की नियुक्ति को यह कहकर मंजूरी नहीं दी कि अपीलीय निकाय अपने अधिकार क्षेत्र से बढ़कर फैसले लेने लगी है।

  • अपीलीय निकाय का ठप होना भारत को अल्प अवधि में राहत दे सकता है, क्योंकि निर्यात (एक्सपोर्ट) सब्सिडी स्कीमों के खिलाफ अमेरिकी शिकायत पर डब्ल्यूटीओ पैनल ने 31 अक्टूबर 2019 को भारत के खिलाफ फैसला सुनाया था और मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट्स फ्रॉम इंडिया स्कीम (MEIS) जैसी योजनाओं को छः महीने के भीतर बंद करने का आदेश दिया था। इसके खिलाफ भारत ने अपीलीय निकाय में अपील कर रही है और जब तक यह ठप है, वह स्कीमें बंद करने के लिए क़ानूनन बाध्य नहीं है। यही वजह है कि भारत अपनी तरफ से हाल में बंद की गई कई एक्सपोर्ट स्कीमें फिर शुरू कर रहा है।
  • अपीलीय निकाय के ठप होने को लेकर भारत इसलिए भी बहुत परेशान नहीं है, क्योंकि हाल के वर्षों में ‘अमेरिका फ़र्स्ट’के बैनर तले शुरू हुआ संरक्षणवाद और चीन सहित कई देशों के साथ टैरिफ-वॉर रोकने में डब्ल्यूटीओ नाकाम रहा है। भारतीय स्टील, एल्युमीनियम सहित कई उत्पादों पर अमेरिकी शुल्क बढ़ाए जाने का मुकाबला भारत को खुद ही जवाबी टैरिफ से देना पड़ा है।
  • इसके अलावा भारतीय कृषि उत्पादों को लेकर जिस तरह विकसित देश भारत के खिलाफ लामबंद हुए थे और किसानों को किफायती बिजली, पानी, खाद से लेकर गरीबों को सस्ता राशन तक रोकने की बात करने लगे थे ताकि भारत उनके प्रोसेस्ड फूड का बड़ा बाजार बन सके, ऐसे में भारत में डब्ल्यूटीओ का जबर्दस्त विरोध होने लगा था। भारतीय छात्रों और प्रोफेशनल्स को रोकने के लिए अमेरिका ही नहीं, ब्रिटेन, न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया तक ने डब्ल्यूटीओ नियमों को ताख पर रखते हुए वीज़ा नियम कड़े किए हैं, जो भारत के लिए बड़ी चुनौती है।
  • भारत को ग्लोबल ट्रेड में हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए पड़ोसी देशों खासकर आसियान से ही प्रतिस्पर्द्धा करना पड़ता है और इनमें से कई देशों के साथ उसके मुक्त व्यापार समझौते हैं। ग़ौरतलब है कि जितने ज्यादा एफटीए होंगे, उसके लिए डब्ल्यूटीओ की जरूरत घटती जाएगी।
  • विशेषज्ञों का मानना है कि भारत जैसे कई विकासशील देशों के लिए वैश्विक बाजार में की गई अब तक की तरक्की में डब्ल्यूटीओ का बड़ा योगदान रहा है। खुद भारत बीते दो दशकों में करीब एक दर्जन बड़े मामलों में इस मंच के जरिए ही अमेरिका और चीन जैसे दिग्गजों से अपनी बात मनवाने में सफल रहा है। साथ ही उसने अपनी कई इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टीज की भी रक्षा की है।

चुनौतियाँ

विश्व व्यापार संगठन (WTO) के अंतर्गत की गई विवाद-निपटान की व्यवस्था काफी जटिल एवं ख़र्चीला है।

  • मुद्दों के समाधान की प्रक्रिया का जटिल होना।
  • अधिकारों एंव दायित्व का उचित बँटवारा न होना।
  • इतना महत्वपूर्ण संगठन होने के पश्चात भी इसमें सूचना अथवा डाटा बेस (Database of Bank) का न होना।
  • विश्व की प्रमुख भाषाओं को स्थान न मिलना (केवल अंग्रेजी)।
  • समितियों का समय से निर्णय न ले पाना तथा व्यावहारिकता का अभाव होना।
  • विवाद निपटान निकाय का जटिल होना।
  • विकास व्यापार संगठन की स्थिति ‘टू वर्ल्ड’ (Two World) जैसी है।
  • अमेरिका का इस संगठन पर वर्चस्व होना।
  • शीघ्र निर्णयन का अभाव होना।

आगे क्या किया जाना चाहिए?

कुल मिलाकर विश्व व्यापार संगठन के ज़रिए व्यवस्थित मुक्त-व्यापार की जो पद्धति विकसित की गई है और उसके जो उद्देश्य हैं, वे तभी पूरे हो सकते हैं जब डब्ल्यूटीओ को विकास की समस्याओं से जोड़ा जाए और अति-अल्पविकसित एवं विकासशील देशों के लिए ठोस, अल्प एवं दीर्घकालीन कार्यक्रमों के लिए स्पष्ट एवं पारदर्शी प्रावधान किए जाने चाहिए।

  • यदि विश्व व्यापार संगठन की प्रासंगिकता खत्म होती है, तो जापान, चीन और यूरोपीय संघ जैसे बड़े देश बगैर किसी कानूनी अड़चन के मनमानी करेंगे।
  • छोटे-छोटे देश संरक्षणवाद का सहारा लेंगे जिससे आय और व्यापार के विस्तार में कमी आएगी।
  • इसलिए विश्व व्यापार संगठन को स्वयं में सुधार करने के लिए पहल करनी चाहिए, साथ ही, विकासशील देशों के लिए व्यापार के निष्पक्ष नियम हैं जो उनकी घरेलू नीतियों में हस्तक्षेप नहीं करते हैं।
  • यद्यपि डब्ल्यूटीओ अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में अपेक्षानुरूप सफल नहीं रहा है फिर भी इसे एक नियम आधारित वैश्विक व्यापार के लिए श्रेय दिया जा सकता है। इसलिए विश्व व्यापार संगठन के विवाद निपटान तंत्र को बचाना सभी सदस्य देशों की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
  • यह महत्वपूर्ण है कि सभी सदस्य देशों की आकांक्षाओं को ध्यान में रखते हुए हमें समावेशी, पारदर्शी और विकासोन्मुखी एजेंडों के लिए अपने प्रयासों को दुहराते रहना चाहिए।
  • विश्व व्यापार संगठन का संगठनात्मक ढाँचा एवं कार्य प्रणाली में मतदान द्वारा बहुमत के आधार पर निर्णय लेने का जो प्रावधान है वह बड़ा ही विवादित एवं सदस्य देशों को दो वर्गों में विभाजित कर देता है अर्थात विकसित देश एक समूह में और विकासशील देश एक समूह में। इस प्रकार विकसित एवं विकासशील देश दोनों के हित अलग-अलग होने के कारण दोनों अपने हितों को ध्यान में रखते हुए नियम कानून चाहते हैं। इसलिए, आवश्यकता है कि डब्ल्यूटीओ के सभी सदस्य देश परस्पर सहमति से कोई भी नीति निर्धारित करें जिससे अल्प विकसित और विकासशील देशों के हितों का टकराव न हो।