(Global मुद्दे) भारत-मलेशिया संबंध - तनाव का दौर (India-Malaysia Relations: Mounting Tensions)



(Global मुद्दे) भारत-मलेशिया संबंध - तनाव का दौर (India-Malaysia Relations: Mounting Tensions)


एंकर (Anchor): कुर्बान अली (पूर्व एडिटर, राज्य सभा टीवी)

अतिथि (Guest): शशांक (पूर्व विदेश सचिव), के. वी. प्रसाद (वरिष्ठ पत्रकार)

चर्चा में क्यों?

बीते दिनों, मलेशिया के प्रधानमंत्री महाथिर मोहम्मद ने जम्मू-कश्मीर और नागरिकता कानून को लेकर विवादित टिप्पणी कर दिया था। जिसके बाद भारत ने उनके इस बयानबाज़ी पर कड़ा एतराज़ जताया था और मलेशियाई नेतृत्व को स्पष्ट किया कि उसे भारत के आंतरिक मामलों पर टिप्पणी नहीं करनी चाहिए, खासकर उन मामलों पर जिनके बारे में उसे तथ्यों की सही समझ न हो। इस घटना के बाद से दोनों देशों के बीच तल्खी बढ़ गई है। भारत ने मलेशिया से पाम आयल के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया है।

परिचय

मलेशिया भारत सरकार की ‘एक्ट ईस्ट नीति’ के केंद्र में है। भारत की मलेशिया से 2010 से रणनीतिक साझेदारी है। राजनीतिक-सुरक्षा, आर्थिक और सामाजिक-सांस्कृतिक स्तंभों पर मलेशिया और भारत का आपस में सहयोग काफी महत्वपूर्ण है। ग़ौरतलब है कि मलेशिया आसियान समूह का एक अत्यंत महत्वपूर्ण सदस्य है और आसियान दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था वाले देशों का एक समूह है। आसियान भारत का चौथा सबसे बड़ा कारोबारी साझेदार और इस दस सदस्यों के समूह में भारत छठा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। इसके अलावा, मलेशिया में भारतीय मूल के करीब 24 लाख लोग हैं जो वहां की कुल जनसंख्या का आठ प्रतिशत हैं।

बता दें कि भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के निमंत्रण पर, मलेशिया के तत्कालीन प्रधानमंत्री दत्तो श्री मोहम्मद नजीब तुन अब्दुल रजाक ने अप्रैल 2017 में भारत की यात्रा की थी। दोनों देशों ने बहुसंस्कृतिवाद, लोकतंत्र और बहुलवाद के प्रति अपनी मजबूत प्रतिबद्धता को जाहिर किया था। दोनों देशों ने सुरक्षा और रक्षा के क्षेत्रों के साथ-साथ सामाजिक-आर्थिक क्षेत्रों, खासकर स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्र में मजबूत सहयोग का स्वागत भी किया था। साथ ही, दोनों देश पर्यटन और सांस्कृतिक संबंधों को बढ़ावा देने के लिए सहमत हुए थे।

इतिहास पर नजर डालें तो पायेंगे कि 1962 के भारत-चीन युद्ध में मलेशिया अकेला ऐसा दक्षिण-पूर्वी देश था जिसने न सिर्फ खुलकर भारत का साथ दिया था, बल्कि भारत को युद्ध में सहायता के लिए एक आर्थिक कोष की भी स्थापना की थी। वहीं, भारत ने भी 1965 में इंडोनेशिया-मलेशिया विवाद में मलेशिया का साथ दिया था। इसके चलते भारत और इंडोनेशिया के संबंधों में खासी गिरावट आ गई थी। शीत युद्ध के दौरान दोनों ही देश निर्गुट देशों के दल के साथ रहे और इन्होने पारस्परिक संबंधों को मजबूत बनाए रखा। एक मुस्लिम बहुल देश होने और पाकिस्तान की तमाम कोशिशों के बावजूद मलेशिया और भारत के संबंध मधुर बने रहे। भारत सरकार के 1992 में ‘लुक ईस्ट नीति’ के अनावरण ने संबंधों को नए आयाम दिए। पिछले कई सालों के दौरान, भारत और मलेशिया ने द्विपक्षीय सहयोग के कई समझौतों को अंजाम दिया जिनमें मलेशिया-इंडिया कोम्प्रेहेंसिवे इकनोमिक को-ऑपरेशन एग्रीमेंट (2011) और इनहेंस्ड स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप (2016) प्रमुख हैं।

संबंधों में खटास की शुरूआत

हालिया समय में ऐसा क्या हुआ जिससे दोनों देशों के बीच निकटता में कमी आई है, दरअसल जानकार मानते हैं कि संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर पर बयान देकर मलेशिया ने पाकिस्तान से बढ़ती क़रीबी और भारत से संबंधों पर पड़ते इसके असर को उजागर कर दिया है। महातिर ने संयुक्त राष्ट्र संघ की बैठक में अप्रत्याशित रूप से कश्मीर मुद्दे को उठाते हुए कहा कि ‘भारत ने कश्मीर पर आक्रमण कर उसे (कश्मीर को) कब्जे में कर रखा है, जो संयुक्त राष्ट्र के सिद्धांतों के उलट है।’ तुर्की और पाकिस्तान ने भी इसी तरह के बयान दिए जिसके लिए शायद भारत तैयार भी था। किंतु मलेशियाई प्रधानमंत्री का बयान भारत को नागवार गुजरा, खासकर ये देखते हुए कि दोनों ही देशों का एक-दूसरे के इतिहास में अहम योगदान रहा है।

भारत में टेरर फाइनेंस के आरोपी जाकिर नाइक के मलेशिया भाग जाने और भारत सरकार की तमाम कोशिशों और दोनों देशों के बीच प्रत्यर्पण संधि होने के बावजूद मलेशियाई सरकार का उसे भारत नहीं भेजने के निर्णय ने राजनयिक स्तर पर पिछले कुछ सालों से एक तनाव की स्थिति पैदा कर दी है। 2018 में महातिर मोहम्मद के सत्ता पर काबिज़ होने के बाद से भारत के लिए परिस्थितियां खासतौर पर कठिन हुई हैं। मिसाल के तौर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भारतीय विदेश मंत्रालय की गुज़ारिश के बावजूद महातिर ने जाकिर नाइक को यह कहकर भारत भेजने से मना कर दिया था कि वहाँ उसकी जान को खतरा हो सकता है। ग़ौरतलब है कि 2011 में दोनों देशों के बीच प्रत्यर्पण संधि और 2012 में आपराधिक मामलों में एक-दूसरे की कानूनी सहायता संबंधी समझौता होने के बावजूद मलेशिया जाकिर नाइक को भारत को सौंपने के लिए तैयार नहीं है।

जानकारों का मानना है कि पिछले कुछ समय से मलेशिया के पीएम महातिर मोहम्मद और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की दोस्ती की खूब चर्चा है। पाँच अगस्त को जब भारत ने जम्मू-कश्मीर को मिले विशेष दर्जे को खत्म करने की घोषणा की तो महातिर उन राष्ट्र प्रमुखों में शामिल थे, जिन्हें इमरान खान ने फोन कर समर्थन मांगा और समर्थन मिला भी। जब कश्मीर का मामला संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में गया तब भी मलेशिया पाकिस्तान के साथ था। यहाँ तक संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में भी मलेशियाई प्रधानमंत्री ने कश्मीर का मुद्दा उठाया और भारत को घेरा।

पाम तेल और भारत

मलेशिया की अर्थव्यवस्था काफी हद तक पाम आयल के कारोबार पर निर्भर है। विश्लेषकों का मानना है कि भारत में खाने में इस्तेमाल किए जाने वाले तेलों में पाम तेल का हिस्सा दो-तिहाई है। भारत खाने के तेल के मामले में आत्मनिर्भर नहीं हुआ है। भारत को खाने के तेल की अपनी जरूरत को पूरा करने के लिए आयात पर निर्भर रहना पड़ता है। देश में खपत होने वाले कुल खाने के तेल का लगभग 60-70 फ़ीसदी तेल विदेशों से आयात होता है। भारत हर साल लगभग 90 लाख टन पाम तेल आयात करता है और यह मुख्य रूप से मलेशिया और इंडोनेशिया से आयातित होता है। वर्ष 2018-19 (नवंबर-अक्टूबर) के शुरूआती 11 महीने यानी नवंबर 2018 से सितंबर 2019 के दौरान देश में कुल 135.81 लाख टन खाने के तेल का आयात हुआ है जिसमें 86.30 लाख टन पाम आयल है और 49.51 लाख टन सोयाबीन, सरसों और सूरजमुखी का तेल है।

मलेशिया ने भारत को क्या प्रस्ताव दिया है?

इस बीच कश्मीर के मुद्दे पर भारत की नाराज़गी के बाद मलेशिया भारत को नया प्रस्ताव दे रहा है। देश में तेल और तिलहन उद्योग के संगठन साल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन (SEA) के मुताबिक मलेशिया ने भारत सरकार के सामने प्रस्ताव रखा है कि वह भारत से ज्यादा मात्रा में चीनी और भैंस का माँस खरीदेगा। हालांकि, भारत सरकार ने मलेशिया के इस प्रस्ताव पर अभी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। वहीं भारतीय व्यापारियों ने देश के खाने के तेल की जरूरत को पूरा करने के लिए मलेशिया की जगह इंडोनेशिया से पाम आयल की खरीद बढ़ा दी है।

भारत और मलेशिया के बीच सहयोग के क्षेत्र

मलेशिया उच्च गुणवत्ता वाले चिकित्सा दस्तानों का दुनिया का सबसे बड़ा विनिर्माता और निर्यातक देश है, जिसका आयात भारत काफी मात्रा में करता है। मलेशिया ने 2018 में भारत को 8.08 करोड़ डॉलर का रबर निर्यात किया था।

  • भारत मलेशिया के पाम आयल का सबसे बड़ा खरीददार देश है। भारत और मलेशिया के बीच कुल 17.2 बिलियन डॉलर का व्यापार है, जिसमें से भारत 10.8 बिलियन डॉलर का आयात करता है।
  • हाल के वर्षों में मलेशियाई कंपनियों और निवेशकों द्वारा भारत में कई परियोजनाओं, विशेष रूप से बुनियादी ढाँचे और निर्माण क्षेत्रों में निवेश किया गया है। साथ ही निवेश के नए क्षेत्रों का पता भी लगाया गया है।
  • मलेशियाई कंपनियां भारत के विभिन्न राज्यों में कई बुनियादी ढाँचागत परियोजनाओं में काम कर रही हैं। भारतीय कंपनियों ने भी बड़े पैमाने पर मलेशिया की अर्थव्यवस्था में योगदान दिया है।
  • रॉयल मलेशियाई वायु सेना (RMAF) और भारतीय वायु सेना (IAF) प्रशिक्षण, रख-रखाव, तकनीकी सहायता और सुरक्षा संबंधी मुद्दों में सहयोग के लिए विमान सुरक्षा और रखरखाव मंच की स्थापना के संदर्भ में काम कर रहे हैं।
  • दोनों देश आतंकवाद और अंतरराष्ट्रीय अपराध का मुकाबला करने में सहयोग कर रहे हैं। साथ ही, विज्ञान और प्रौद्योगिकी पर मलेशियाई और भारतीय वैज्ञानिक अनुसंधान, विकास और तकनीकी जानकारी और दस्तावेज़ों के पारस्परिक आदान-प्रदान में सहयोग कर रहे हैं।
  • मलेशिया में भारतीय मूल के समुदाय के योगदान का उत्सव मनाने के लिए कुआलालंपुर में भारतीय सांस्कृतिक केंद्र का नाम ‘नेताजी सुभाष चंद्र बोस भारतीय सांस्कृतिक केंद्र’ के रूप में नामित किया गया है।
  • नेताजी सुभाष चंद्र बोस भारतीय सांस्कृतिक केंद्र, भारत और मलेशिया के बीच सांस्कृतिक कार्यक्रमों, सांस्कृतिक संगोष्ठियों, कार्यशालाओं का आयोजन करके भारतीय शास्त्राीय संगीत और भारतीय नृत्य जैसे कि कत्थक और मणिपुरी के लिए भारतीय गुरु-पेशेवरों और प्रशिक्षकों को नियुक्त करके द्विपक्षीय सांस्कृतिक संबंधों को बढ़ावा देता है।
  • इसके अलावा, खिलाड़ियों, प्रशिक्षकों, खेल के नियम व प्रशिक्षण पाठ्यक्रम के आदान-प्रदान के जरिए खेल के क्षेत्र में सहयोग को लेकर भी एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए हैं। इंटरप्रेन्योरशिप डवलपमेंट इंस्टीट्यूट अहमदाबाद तथा मलेशियन ह्यूमन रिसोर्स फंड के बीच एक समझौता हुआ, जिसके मुताबिक, ईडीआईआई प्रशिक्षण तथा अन्य क्षमता निर्माण कार्यक्रमों को अंजाम देगा।
  • पाम आयल के क्षेत्र में प्रौद्योगिकी विकास में सहयोग को लेकर मलेशियन पाम आयल बोर्ड तथा भारत के इंस्टीट्यूट ऑफ केमिकल टेक्नोलॉजी के बीच एक समझौता हुआ है।
  • मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्मार्ट सिटीज और कौशल विकास जैसे भारत द्वारा उठाए गए नये विकास और व्यापारिक पहलों में मलेशियाई व्यापारियों के लिए निवेश के महत्वपूर्ण अवसर उपलब्ध कराये गए हैं।
  • भारत ने मलेशियाई निवेशकों के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान करने के लिए सरकार द्वारा उठाए जा रहे कदमों के बारे में बताया है और दोनों देशों के आपसी लाभ के लिए भारत ने मलेशियाई निवेशकों को आर्थिक गतिविधियों में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया है।
  • आयुर्वेद एवं भारतीय परम्परा की अन्य पारंपरिक चिकित्साओं में दोनों देशों के बीच बेहतर सहयोग को बढ़ावा देने की जरूरत को स्वीकार करते हुए मलेशिया ने भारतीय तकनीकी एवं आर्थिक सहयोग कार्यक्रम के तहत भारत से एक आयुर्वेद के चिकित्सक और दो थेरेपिस्ट की प्रतिनियुक्ति की है।
  • टिकाऊ ऊर्जा विकास, भविष्य में ऊर्जा सुरक्षा अर्जित करने की दिशा में एक प्रमुख तत्व रहा है और भारत तथा मलेशिया दोनों ही देश बेहतर ऊर्जा सुविधाओं के साथ अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के उद्देश्य से नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को बढ़ाने पर सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं। दोनों ही पक्षों ने जल्द से जल्द नवीन तथा नवीकरणीय ऊर्जा पर एक संयुक्त कार्य समूह के गठन पर सहमति जताई है।
  • संसदीय लोकतंत्र और दोनों देशों के संसदों के बीच सहयोग को और बढ़ावा देने के लिए दोनों देशों ने प्रतिबद्धता दोहराई है तथा भारत और मलेशिया के सांसदों का एक दूसरे के देश में नियमित आने-जाने को बढ़ावा देने के महत्व को रेखांकित भी किया गया है।

आसियान देशों से भारत का संबंध

दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ भारत का संबंध 2000 वर्ष से भी पुराना है। भारत के कंबोडिया, मलेशिया एवं थाइलैंड जैसे देशों के बीच प्राचीन व्यापार का पूरा दस्तावेज़ मौजूद है। दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों की संस्कृतियों, परंपराओं एवं भाषाओं पर इन शुरुआती संपर्कों का पूरा प्रभाव पड़ा है। कंबोडिया में सीएमरीप के निकट अंगकोर मंदिर परिसर, इं‍डोनेशिया में योग्याकर्ता के निकट बोरोबुदूर एवं प्रमबन मंदिर एवं मलेशिया में केडाह में प्राचीन कैंडिस जैसे ऐतिहासिक स्थलों पर भारतीय हिन्दू-बौद्ध प्रभाव दिखते हैं। रामायण इं‍डोनेशिया, म्यांमार, थाइलैंड सहित दक्षिण-पूर्व एशिया की कई संस्कृतियों से जुड़ा है।

इसके अलावा भारत सरकार की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति एवं आसियान के साथ संबंधों को मजबूत बनाने के लिए 3-सी (कॉमर्स, कनेक्टिविटी और कल्चर) हमारे व्यापक सहयोग के ज्वलंत उदाहरण हैं। सामाजिक सांस्कृतिक मोर्चे पर, आसियान-भारत छात्र विनिमय कार्यक्रम एवं वार्षिक दिल्ली संवाद जैसे कार्यक्रम लोगों के बीच आपसी संबंधों को और मजबूत बनाते हैं। इन मंचों के जरिए आसियान देशों व भारत के युवा, शिक्षाविद एवं उद्योगपति आपस में मिलते हैं, एक दूसरे से सीखते हैं तथा रिश्तों को प्रगाढ़ बनाते हैं। भारत हिंद महासागर से लेकर प्रशांत महासागर तक बड़े समुद्री लेनों के साथ रणनीतिक रूप से अवस्थित है। ये समुद्री लेन आसियान के कई सदस्य देशों के लिए महत्वपूर्ण व्यापार रास्ते भी हैं।

आगे क्या किया जाना चाहिए?

आसियान और भारत आपसी व्यापार एवं निवेश को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयासरत हैं। इस व्यापार और निवेश में मलेशिया अहम सहयोगी हो सकता है। जानकारों का मानना है कि भारत को मलेशिया के साथ व्यापार युद्ध में पड़ जाने के नुकसान भी उठाने पड़ सकते हैं। दरअसल, मलेशिया उसी आसियान संगठन का हिस्सा है जिससे भारत ने 2009-10 के दौरान ही मुक्त व्यापार संधि पर सहमति जताई थी। अब भारत के सामने मुश्किल ये है कि अगर वह मलेशिया को कूटनीतिक सबक सिखाता है तो आसियान के अन्य देशों को भारत के प्रतिबद्धता पर संदेह होने लगेगा। ऐसे में, भारत को यह कोशिश करनी होगी कि मलेशिया को पाठ पढ़ाने के क्रम में उसे कोई राजनयिक नुकसान न हो। इसके अलावा भारत-मलेशिया संबंधों में जो दरार बढ़ी है उसे पाटने के लिए दोनों ही देशों को व्यापक और बड़े कदम उठाने होंगे। ग़ौरतलब है कि भारत के साथ विस्तृत सामरिक भागीदारी स्थापित करने में मलेशिया की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। ऐसे में, भारत सरकार को चाहिए कि वह ऐसे नीतिगत एवं ठोस कदम उठाये जिससे दोनों देशों के बीच संबंधों में मधुरता बढ़े। साथ ही, देश की स्थिरता, शांति एवं आर्थिक समृद्धि के समक्ष खतरा पैदा करने वाले कारकों से निपटने के लिए दोनों देशों को साथ मिलकर काम करने की जरूरत है। इसके अलावा एशिया प्रशांत क्षेत्र में आर्थिक संवृद्धि, नेविगेशन की आज़ादी और स्थिरता को बढ़ावा देने में मलेशिया की भूमिका भी भारत के लिए अहम है।