(Global मुद्दे) भारत-चीन : दूसरी अनौपचारिक वार्ता (India-China 2nd Informal Summit)



(Global मुद्दे) भारत-चीन : दूसरी अनौपचारिक वार्ता (India-China 2nd Informal Summit)


एंकर (Anchor): कुर्बान अली (पूर्व एडिटर, राज्य सभा टीवी)

अतिथि (Guest): शशांक (पूर्व विदेश सचिव), प्रो. बी. आर. दीपक (भारत-चीन मामलों के जानकार, JNU)

चर्चा में क्यों?

बीते 10 - 11 अक्टूबर को चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग दो दिवसीय भारत दौरे पर थे। इस दौरान तमिलनाडु के मामल्लापुरम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच अनौपचारिक शिखर वार्ता हुई। दो दिवसीय इस बैठक में भारत और चीन के बीच द्विपक्षीय और व्यापारिक रिश्तों को लेकर चर्चा हुई। इसके अलावा इस दौरान दोनों देशों की प्राचीन सांस्कृति को और मज़बूत बनाने की भी कोशिश की गई। प्रधानमंत्री मोदी ने इस मौके पर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ ऐतिहासिक स्थल समुद्र के किनारे बने मंदिर, अर्जुन की तपस्या भूमि और पंच रथ का भी दौरा किया। ग़ौरतलब है कि ये भारत और चीन के बीच दूसरी अनौपचारिक वार्ता है। इससे पहले भारत और चीन के बीच पिछले साल वुहान में पहली अनौपचारिक वार्ता हुई थी।

महाबलीपुरम में ही क्यों मिले मोदी-जिनपिंग

महाबलीपुरम चेन्नई से क़रीब 62 किलोमीटर की दूरी पर मौजूद है। ये जगह यूनेस्को की सूची में शामिल ऐतिहासिक धरोहरों में से भी एक है। जानकारों का मानना है कि भारत सार्क देशों की तुलना में बंगाल की खाड़ी के आसपास के देशों पर अधिक ध्यान केंद्रित करना चाहता है। वह बंगाल की खाड़ी में भी अपना दबदबा दिखाना चाहता है, इसीलिए भारत ने बंगाल की खाड़ी के पास के क्षेत्र को चुना है।

हालाँकि कुछ लोग इसे बीजेपी की राजनीती क़रार दे रहे हैं। उनका कहना है कि तमिलनाडु में होने वाली इस बैठक के लिए कोई राजनयिक कारण नहीं है।बीजेपी तमिलनाडु के लोगों को आकर्षित करना चाहती है इसलिए ये बैठक तमिलनाडु के महाबलीपुरम में आयोजित हुई है।

चीन के साथ व्यापरिक घाटे में है भारत

साल 2000 में भारत चीन के बीच सिर्फ 3 अरब डॉलर का कारोबार था। 2008 में ये 51.8 डॉलर का हो गया। 2018 में दोनों देशों के बीच 95. 54 अरब डॉलर का कारोबार हुआ। भारत के की ओर से जून 2019 में ये दावा किया था कि इस साल भारत और चीन का व्यापार 100 अरब डॉलर से आगे बढ़ जायेगा।

विदेश मंत्रालय की वेबसाइट पर मौजूद आंकड़ों के मुताबिक़ साल 2018 में दोनों देशों के बीच 95. 54 अरब डॉलर का कारोबार हुआ। हालाँकि इस कारोबार में भारत ने सिर्फ 18.84 अरब डॉलर का सामान चीन में निर्यात किया। इसका मतलब ये है कि एक तरीके से चीन ने भारत के मुक़ाबले 5 गुना अधिक सामान का निर्यात किया जिससे भारत को 2018 में चीन से 57.86 अरब डॉलर का व्यापारिक घाटा हुआ। इससे पहले साल 2017 में ये घाटा 61.72 अरब डॉलर का था। भारत इस व्यापारिक असंतुलन को कम करना चाहता है लेकिन दोनों देशों के बीच तेज़ी से बढ़ता व्यापरिक असंतुलन कम नहीं हो रहा है।

भारत चीन को क्या निर्यात करता है?

  • कपास
  • कॉपर (ताम्बा)
  • हीरे और प्राकृतिक रत्न

चीन भारत को क्या निर्यात करता है?

  • मशीनरी सामान
  • टेलीकॉम
  • बिजली से जुड़े उपकरण
  • जैविक रासायन
  • खाद

व्यापारिक असंतुलन को पाटने के लिए क्या कर सकता है भारत

  • भारत में दवा निर्माता के रूप में दुनिया भर में मशहूर है। ऐसे में भारत चीन के बाज़ार में दवाएं बेंच सकता है।
  • चीन के बाज़ार में IT सुविधा प्रदान कर सकता है।
  • इसके अलावा भारत चीन के बाज़ार में चावल, चीनी, सब्जियां और कपड़ों का भी निर्यात कर सकता है।

2014 में भारत आए शी जिनपिंग की यात्रा के दौरान एक कारोबारी सहयोग को बढ़ाने के लिए 5 साल का डेवलपमेंट कार्यक्रम बना था। इसमें ये तय हुआ कि कैसे भारत चीन के बाज़ार में और सामान मुहैया कराए। इस सन्दर्भ में साल 2018 में मीट, मछली का भोजन और मछली के तेल को चीन में निर्यात की बात कही गई। 2019 में भी ये तय हुआ कि भारत अब मिर्च और तम्बाकू के पत्ते भी चीन में निर्यात करेगा।

चीन का भारत में निवेश

चीन के वाणिज्य मंत्रालय के मुताबिक़ दिसम्बर 2017 के आखिर तक चीन ने भारत में 4.74 अरब डॉलर का निवेश किया है। चीन भारत के स्टार्टअप्स में काफी निवेश करता है।

भारत का चीन में निवेश

चीन के मुकाबले भारत का चीन में निवेश कम है। 2017 के आकंड़ों के मुताबिक भारत का चीन में सिर्फ 851. 91 मिलियन का ही निवेश है।

वुहान समिट

27-28 अप्रैल, 2018 को चीन के वुहान में हुई पहली अनौपचारिक शिखर सम्मेलन में भारत और चीन शामिल हुए थे। इस मुलाकात ने साल 2017 में डोकलाम को लेकर उपजे कुछ गतिरोधों को कम करने में भूमिका अदा की थी। इस दौरान कुछ और महत्वपूर्ण बातों को लेकर चर्चा हुई थी जोकि निम्न हैं -

  • भारत-चीन संबंधों में प्रगति की समीक्षा
  • भारत-चीन सीमा क्षेत्र
  • द्विपक्षीय व्यापार एवं निवेश
  • क्षेत्रीय और वैश्विक हित
  • विदेशी नीति
  • आतंकवाद
  • अफगानिस्तान में एक संयुक्त आर्थिक परियोजना
  • और पूर्वोत्तर भारत में सुरक्षा को लेकर पहली अनौपचारिक वार्ता केंद्रित रही थी

भारत चीन सम्बन्ध

भारत और चीन एशिया के दो प्राचीन सभ्यताओं और एशिया की दो बड़ी महाशक्तियों में से एक हैं। भारत और चीन के बीच 1950 से ही राजनयिक सम्बन्ध हैं। हालाँकि 1962 में हुए भारत चीन युद्ध ने दोनों देशों के रिश्तों में तल्खी पैदा कर दी जिससे पंचशील जैसे समझौते नाक़ाम हो गए। 1988 में चीन गए प्रधानमंत्री राजीव गांधी के दौरे के बाद संबंधों में प्रगति ज़रुर हुई, लेकिन दोनों देशों के बीच आज भी आपसी विश्वास की कमी है। देखा जाए तो भारत चीन संबंध का कोई स्वर्णिम युग नहीं रहा है। आज भी दोनों देशों के बीच कई विवाद मौजूद हैं।

सीमा विवाद: भारत और चीन के बीच करीब 4000 किलोमीटर की सीमा लगती है। चीन के साथ इस सीमा विवाद में भारत और भूटान दो ऐसे मुल्क हैं, जो उलझे हुए हैं। भूटान में डोकलाम क्षेत्र को लेकर विवाद है तो वहीं भारत में लद्दाख से सटे अक्साई चिन और अरुणाचल प्रदेश को लेकर विवाद जारी है।

दलाई लामा और तिब्बत: ड्रैगन देश को इस बात से भी चिढ़ है कि भारत तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा को शरण दिए हुए है।

स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स: ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’भारत को घेरने के लिहाज से चीन द्वारा अपनाई गई एक अघोषित नीति है। इसमें चीन द्वारा भारत के समुद्री पहुंच के आसपास के बंदरगाहों और नौसेना ठिकानों का निर्माण किया जाना शामिल है।

नदी जल विवाद: ब्रह्मपुत्र नदी के जल के बँटवारे को लेकर भी भारत और चीन के बीच में विवाद है। चीन द्वारा ब्रह्मपुत्र नदी के ऊपरी इलाके में कई बांधों का निर्माण किया गया है। हालांकि जल बंटवारे को लेकर भारत और चीन के बीच में कोई औपचारिक संधि नहीं हुई है।

भारत को एनएसजी का सदस्य बनने से रोकना: परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह का सदस्य बनने में भी चीन भारत की मंसूबों पर पानी फेर रहा है। नई दिल्ली ने जून 2016 में इस मामले को जोरदार तरीके से उठाया था। तत्कालीन विदेश सचिव रहे एस जयशंकर ने एनएसजी के प्रमुख सदस्य देशों के समर्थन के लिए उस समय सियोल की यात्रा भी की थी।

भारत के खिलाफ आतंकवाद का समर्थन: एशिया में, चीन भारत को अपना सबसे बड़ा प्रतिद्वंदी मानता है और साथ ही OBOR प्रॉजेक्ट में चीन को पाक की जरूरत है। पाकिस्तान में चीन ने बड़े पैमाने पर निवेश कर रखा है। चीन-पाक आर्थिक गलियारा और वन बेल्ट वन रोड जैसे उसके मेगा प्रॉजेक्ट एक स्तर पर आतंकी संगठनों की दया पर निर्भर हैं। ऐसे में चीन कहीं ना कहीं भारत के खिलाफ आतंकवाद का पोषक बना हुआ है। मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित कराने में चीन की रोड़ेबाजी इसी का एक मिसाल कही जा सकती है। हालंकि बाद में भारत को इस मामले में सफलता मिल गई थी। भारत के उत्तर-पूर्व में भी चीन पहले कई आतंकवादी संगठनों की मदद करता रहा है। बीबीसी फीचर्स की एक ख़बर के मुताबिक कुछ अर्से पहले पूर्वोत्तर भारत में नगा विद्रोही गुट एनएससीएन (यू) के अध्यक्ष खोले कोनयाक ने ये दावा किया था। बक़ौल खोले “यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम यानी उल्फा प्रमुख परेशबरुआ पूर्वोत्तर राज्यों में सक्रिय चरमपंथी संगठनों को चीनी हथियार और ट्रेनिंग मुहैया करा रहें है।

व्यापार असंतुलन: वैसे तो चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है, लेकिन दोनों देशों के बीच एक बड़ा व्यापारिक असंतुलन भी है, और भारत इस व्यापारिक घाटे का बुरी तरह शिकार है। पिछले साल चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा 57.86 अरब डॉलर का था, जबकि साल 2017 में यह घाटा 61.72 अरब डॉलर का था।

BRI परियोजना भी विवाद का एक अहम बिंदु

BRI - बेल्ट एंड रोड इनिसिएटिव परियोजना चीन की सालों पुरानी सिल्क रोड' से जुड़ा हुआ है। इसी कारण इसे न्यू सिल्क रोड और One Belt One Road (OBOR) नाम से भी जाना जाता है। BRI परियोजना की शुरुआत चीन ने साल 2013 में की थी। इस परियोजना में एशिया, अफ्रीका और यूरोप के कई देश बड़े देश शामिल हैं।

इसका उद्देश्य दक्षिण पूर्व एशिया, मध्य एशिया, गल्फ कंट्रीज़, अफ्रीका और यूरोप के देशों को सड़क और समुद्री रास्ते से जोड़ना है। भारत चीन की इस परियोजना का शुरू से ही विरोध करता है। साल 2017 में हुए पहले BRI सम्मेलन में भी भारत ने भाग नहीं लिया था। भारत के BRI परियोजना का विरोध के चलते चीन ने 2019 के BRI सम्मेलन’ में BCIM यानी बांग्लादेश - चीन - भारत - म्यांमार गलियारे को अपनी अहम परियोजनाओं से हटा दिया है। चीन अब दक्षिण एशिया में CMEC - चीन - म्यांमार आर्थिक गलियारे, नेपाल - चीन गलियारे (Nepal-China Trans Himalayan Multi-Dimensional Connectivity) और चीन पकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर पर ही काम करेगा।

भारत और चीन के बीच आपसी सहयोग

  • भारत और चीन दोनों ही देश उभरती अर्थव्यवस्थाओं के समूह ब्रिक्स (BRICS) के सदस्य हैं। ब्रिक्स द्वारा औपचारिक रूप से कर्ज देने वाली संस्था ‘न्यू डेवलपमेंट बैंक’ की स्थापना की गई है।
  • भारत एशिया इन्फ्राट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक (AIIB) का एक संस्थापक सदस्य है। गौरतलब है कि चीन भी इस बैंक का एक समर्थक देश है। भारत और चीन दोनों ही देश शंघाई सहयोग संगठन के तहत एक दूसरे के साथ कई क्षेत्रों में सहयोग कर रहे हैं। चीन ने शंघाई सहयोग संगठन में भारत की पूर्ण सदस्यता का स्वागत भी किया था।
  • दोनों ही देश विश्व बैंक, संयुक्त राष्ट्र और आईएमएफ जैसी संस्थाओं के सुधार और उसमें लोकतांत्रिक प्रणाली के समर्थक हैं। संयुक्त राष्ट्र के मामलों और उसके प्रशासनिक ढांचे में विकासशील देशों की भागीदारी में बढ़ोत्तरी बहुत जरूरी है। इस मामले में दोनों देशों का ऐसा मानना है कि इससे संयुक्त राष्ट्र की कार्यप्रणाली में और बेहतरी आएगी।
  • डब्ल्यूटीओ वार्ताओं के दौरान भारत और चीन ने कई मामलों पर एक जैसा रुख अपनाया है जिसमें डब्ल्यूटीओ की दोहा वार्ता भी शामिल है।भारत और चीन दोनों ही देश जी-20 समूह के सदस्य हैं।
  • पर्यावरण को लेकर अमेरिका और उसके मित्र देशों द्वारा भारत और चीन दोनों की आलोचना की जाती है। इसके बावजूद दोनों ही देशों ने पर्यावरणीय शिखर सम्मेलनों में अपनी नीतियों का बेहतर समन्वयन (coordination) किया है।

दूसरे भारत-चीन अनौपचारिक शिखर सम्मेलन का हासिल

वैश्विक एवं क्षेत्रीय महत्व: दोनों देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने वैश्विक एवं क्षेत्रीय महत्व के सामरिक, दीर्घकालिक और महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की । साथ ही राष्ट्रीय विकास के मुद्दे पर भी अपने दृष्टिकोण को साझा किया।

द्विपक्षीय संबंध: सकारात्मक तरीके से द्विपक्षीय संबंधों की दिशा का मूल्यांकन किया गया। साथ ही इस बात का भी ज़िक्र रहा कि वैश्विक मंच पर दोनों देशों की बढ़ती भूमिका को दर्शाने के लिए भारत-चीन द्विपक्षीय बातचीत को किस प्रकार मज़बूती प्रदान की जा सकती है। दोनों नेताओं ने का मानना था कि भारत और चीन एक शांतिपूर्ण, सुरक्षित और समृद्ध दुनिया के लिए काम करने के साझा उद्देश्य को पूरा करते हैं जिसमें सभी देश कानून-आधारित एक अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के तहत अपने विकास को आगे बढ़ा सकते हैं।

वुहान शिखर सम्मेलन: दोनों नेताओं ने अप्रैल 2018 में चीन के वुहान में आयोजित पहले अनौपचारिक शिखर सम्मेलन के दौरान हुई सहमति ज़िक्र करते हुए कहा कि मौजूदा अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में भारत और चीन स्थिरता के कारक हैं और दोनों पक्ष अपने मतभेदों का विवेकपूर्ण प्रबंधन करेंगे और किसी भी मुद्दे पर मतभेद को विवाद नहीं बनने देंगे।

जलवायु परिवर्तन और सतत विकास लक्ष्य: दोनों नेताओं ने जलवायु परिवर्तन और सतत विकास लक्ष्य सहित वैश्विक विकासात्मक चुनौतियों से निपटने के लिए अपने-अपने देशों में किए जा रहे महत्वपूर्ण कामों का ज़िक्र किया।

आतंकवाद: दोनों नेताओं ने चिंता जताई कि आतंकवाद एक आम खतरा बना हुआ है। दो बड़े और विविधतापूर्ण देशों के तौर पर भारत और चीन ने माना कि आतंकवाद पर लगाम लगाने के लिए दुनिया भर में आतंकवादी समूहों के प्रशिक्षण, वित्त पोषण और समर्थन के खिलाफ ढांचे को मज़बूत करने के लिए संयुक्त प्रयासों को जारी रखना बेहद ही ज़रूरी है।

क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी RCEP: दोनों नेताओं ने एशिया में समृद्ध और स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए एक खुला, समावेशी और स्थिर वातावरण का होने को महत्वपूर्ण बताया है और पारस्परिक रूप से लाभप्रद और संतुलित क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी RCEP के लिए बातचीत के महत्व को भी माना।