(Global मुद्दे) इस्टर्न इकोनोमिक फोरम : भारत-रूस संबंध (Eastern Economic Forum : India-Russia Relations)



(Global मुद्दे) इस्टर्न इकोनोमिक फोरम : भारत-रूस संबंध (Eastern Economic Forum : India-Russia Relations)


एंकर (Anchor): कुर्बान अली (पूर्व एडिटर, राज्य सभा टीवी)

अतिथि (Guest): शशांक (पूर्व विदेश सचिव), स्मिता शर्मा (वरिष्ठ पत्रकार)

चर्चा में क्यों?

हाल ही में, भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी रूस की दो दिवसीय यात्रा पर रहे। प्रधानमंत्री रूस के व्लादिवोस्तोक शहर में आयोजित इस्टर्न इकोनोमिक फोरम की पांचवी सालाना बैठक में हिस्सा लेने पहुंचे थे। ग़ौरतलब है कि श्री मोदी को इस आयोजन में बतौर मुख्य अतिथि आमंत्रित किया गया था। इस दौरान उन्होंने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ 20वें भारत-रूस वार्षिक सम्मेलन में भी भाग लिया। यह पहला मौका था जब किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने इस इस्टर्न इकोनोमिक फोरम की वार्षिक बैठक में भाग लिया। इस यात्रा के दौरान उन्होंने जापान के प्रधानमंत्री शिंजो अबे से भी मुलाकात की और दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय वार्ता हुई।

क्या है ईस्टर्न इकोनोमिक फोरम?

पूर्वी आर्थिक मंच की शुरुआत साल 2015 में रूस के राष्ट्रपति ब्लादमिर पुतिन की पहल पर किया गया। इस मंच को रूस के सुदूर पूर्व में विदेशी निवेश को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से बनाया गया था। इस फोरम का लक्ष्य रूस के सुदूर पूर्व क्षेत्र में प्राकृतिक संसाधनों की बहुलता के मद्देनज़र आर्थिक विकास को बढ़ावा देना और एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग का विस्तार करना है। इसका आयोजन हर साल रूस के व्लादिवोस्तोक शहर में किया जाता है।

राष्ट्रपति पुतिन ने अपने भाषण में क्या कहा?

राष्ट्रपति पुतिन ने इस क्षेत्र के विकास को 21वीं सदी की प्राथमिकता के तौर पर पेश किया। रूस के राष्ट्रपति ने इस फोरम में पिछले पांच वर्षों के उपलब्धियों का आकलन किया। इस आकलन में उन्होनें इस बात को दुहराया कि पिछले पांच सालों के लक्ष्य को प्राप्त करना चुनौतीपूर्ण है। लेकिन विकास के लिए नई आर्थिक व्यवस्था बनाकर, निवेश बढ़ाकर, क़ानूनी और सामाजिक ढाँचे में सुधार के जरिए हम अपने मकसद में कामयाब हो सकते हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में क्या कहा?

इस क्षेत्र में अपने भू-रणनीतिक महत्व को देखते हुए भारत ने वर्ष 1992 में व्लादिवोस्तोक में एक वाणिज्यिक दूतावास खोला था। उस वक्त ऐसा करने वाला भारत पहला देश था, जिसने व्लादिवोस्तोक में अपने दूतावास को स्थापित किया।

प्रधानमन्त्री ने कहा कि ईस्टर्न इकोनॉमी फोरम के साथ भारत को नज़दीक से जोड़ने की जितनी भी तारीफ़ की जाए वो कम है। भारत और रूस के बीच रक्षा, कृषि, पर्यटन, व्यापार के साथ अंतरिक्ष कार्यक्रम में भी सहयोग लगातार आगे बढ़ रहा है। कोयला, हीरा, खनन, कृषि, रेयर अर्थ, टिम्बर, पल्प ऐंड पेपर और पर्यटन में नई संभावनाएं उजागर हुई हैं। इन दोनों क्षेत्रों के बीच कनेक्टिविटी को बढ़ाने के लिए चेन्नई और व्लादिवस्तोक के बीच मेरिटाइम रूट का प्रस्ताव भी किया गया है।

श्री मोदी ने बताया कि अगले साल भारत और रूस के बीच बाघों के संरक्षण पर उच्च स्तरीय फोरम का आयोजन करने पर सहमति बनी है। इस दौरान मोदी ने इस फोरम में रूस को 1 बिलियन ‘लाइन ऑफ क्रेडिट’ देने का भी ऐलान किया।

‘लाइन ऑफ क्रेडिट’ क्या होता है?

लाइन ऑफ़ क्रेडिट एक प्रकार का सॉफ्ट लोन होता है। यह कर्ज आम तौर पर बैंको या वित्तीय संस्थानों द्वारा कंपनियों या सरकारी संस्थानों को दिया जाता है। इस कर्ज को वित्तीय संस्था द्वारा निर्धारित दरों और तय समय-सीमा में ही चुकाना होता है। लाइन ऑफ़ क्रेडिट खास गतिविधियों के लिए ही दिया जाता है।

रूस का फार ईस्ट क्षेत्र

रूस का यह सुदूर-पूर्व क्षेत्र बैकाल झील और प्रशांत महासागर के बीच स्थित एक बड़ा भू-भाग है। इस क्षेत्र की दक्षिणी सीमा मंगोलिया, पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना और डेमोक्रेटिक पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ कोरिया से मिलती है। उत्तर-पूर्व में इसकी समुद्री सीमा जापान और संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ लगती है। साइबेरिया क्षेत्र में होने कारण यहाँ की जलवायु काफी ठंडी है जिसके कारण यहाँ पर जीवन-यापन की जरुरी सुविधाओं का अभाव है। इसलिए यहाँ बेहद कम आबादी पायी जाती है।

कम आबादी के बावजूद यह क्षेत्र प्राकृतिक संसाधन जैसे खनिज, तेल, गैस के मामले में सम्पन्न है। इसके अलावा रूस के लगभग 30% जंगल भी इसी क्षेत्र में आते हैं। रूस की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर यह क्षेत्र निर्णायक हो सकता है। इसलिए रूस ने इस क्षेत्र के महत्व को समझते हुए यहाँ विदेशी निवेश को आकर्षित करने का फैसला किया। साथ ही, रूस का लक्ष्य इस क्षेत्र में मौजूद प्राकृतिक संसाधन का पता लगाकर विदेशी निवेश के ज़रिए इनका दोहन कर इसे अन्तराष्ट्रीय बाज़ार में उतारा जाए।

इस क्षेत्र में भारत द्वारा निवेश किस प्रकार फायदेमंद है?

दरअसल रूस के इस सुदूर पूर्वी क्षेत्र में चीन सबसे बड़ा निवेशक है। इस संबंध में रूस और चीन के बीच बढ़ती सक्रियता के बीच यह तथ्य गौर करने लायक है कि यहां हुए कुल विदेशी निवेश का 71 फ़ीसदी हिस्सा चीन का ही है।

अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद से वैश्विक पटल पर रूस की भूमिका जहाँ सीमित होती जा रही है, वहीं चीन द्वारा इस क्षेत्र में निवेश से रुस का रुझान चीन की तरफ बढ़ा है, ऐसी स्थिति में भारत की इस क्षेत्र में मौजूदगी से एक संतुलन बनेगा। साथ ही भारत के आर्थिक, सामरिक हित में भी है।

भारत-रूस वार्षिक सम्मेलन

इस सम्मेलन की शुरूआत पुतिन के भारत आगमन पर साल 2000 में हुई थी। रूस-भारत द्विपक्षीय संबंधों में वार्षिक शिखर बैठक अब एक स्थापित परंपरा बन गई है। इस बैठक से द्विपक्षीय लक्ष्यों को पूरा करने के लिये किये गए प्रयासों पर समयबद्ध तरीके से चर्चा का मौका मिलता है और साथ ही दोनों देशों को दीर्घकालिक लक्ष्यों को तय करने में आसानी होती है।

इस बार दोनों देशों के बीच होने वाली यह 20वीं सालाना शीर्ष बैठक थी। इस बैठक में रक्षा, उर्जा, पेट्रोलियम और संचार समेत भारत और रूस के मध्य 15 बड़े समझौतों पर हस्ताक्षर किये गए। दोनों देशों ने हाइड्रोकार्बन के क्षेत्र में अगले पांच सालों का एजेंडा तय किया। इस बैठक में व्लादिवोस्तोक बंदरगाह से चेन्नई तक समुद्री मार्ग खोलने का भी फैसला लिया गया है।

‘एक्ट फार ईस्ट पॉलिसी’

अपनी रूस यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने रूस के सुदूर पूर्वी क्षेत्र में विकास कार्यों को गति देने के लिए अपनी एक नई नीति का ऐलान किया। दरअसल रूस से रिश्तों को और अधिक मज़बूत करने के लिये ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ की तर्ज पर प्रधानमंत्री द्वारा ‘एक्ट फार ईस्ट पॉलिसी’ (Act Far East policy) की शुरुआत की गई।

भारत-रूस संबंध

आज़ादी के बाद से ही भारत और रूस का संबंध काफ़ी बेहतर स्थिति में रहे हैं।

वैश्विक भू-राजनीति: अगस्त, 1971 में भारत-रूस के बीच 20 वर्षीय सहयोग संधि पर दस्तखत किया गया था। इस संधि में एक दूसरे की संप्रभुता के प्रति सम्मान, एक-दूसरे के हितों का ध्यान रखना और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व कायम करने की बात कही गई थी। इन्हीं बुनियाद ओं के आधार पर दोनों देशों ने साल 1993 में शांति, मैत्री और सहयोग के क्षेत्र में एक और नई संधि की थी। दिसंबर 2010 में भारत और रूस के बीच की सामरिक साझेदारी विशेष और विशेषाधिकार प्राप्‍त सामरिक साझेदारी के स्तर तक पहुंच गई। इसके अलावा रूस ने संयुक्त राष्ट्र में हमेशा ही भारत का साथ दिया। रूस इस बात का पुरजोर समर्थक रहा है कि भारत को सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता मिले। ग़ौरतलब है कि आतंकवाद, अफग़ानिस्तान और मध्य-पूर्व के संघर्ष समेत तमाम ऐसे मुद्दे हैं जिन पर भारत और रूस एक समान विचार रखते हैं।

रक्षा क्षेत्र: आजादी के बाद से ही रूस भारत के लिए सबसे बड़े हथियार निर्यातक के तौर पर रहा है। उस समय की भू राजनीतिक परिस्थितियां ऐसी रही हैं कि हथियारों के मामले में भारत पूरी तरीके से रूस पर निर्भर था। मौजूदा वक्त में भी हथियार खरीद के मामले में भारत रूस पर काफी हद तक निर्भर है। हालांकि आज भारत को हथियार निर्यात करने वालों में कई और देशों का नाम जुड़ गया है। सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस का निर्माण दोनों देशों के बीच सैन्य संबंधों की ऊंचाई को दिखाता है।

अंतरिक्ष: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन और रूसी स्पेस एजेंसी ‘फेडेरल स्पेस एजेंसी ऑफ रूस’ के बीच की महत्वाकांक्षी परियोजना ‘गगनयान’ पर सहयोग के लिये ‘समझौता ज्ञापन’ पर दस्तख़त किया गया है।

परमाणु ऊर्जा: ‘स्ट्रैटेजिक विजन’ समझौता के जरिए रूस तमिलनाडु में कुडनकुलम परमाणु रिएक्टर की छह इकाइयों का निर्माण कर रहा है।

भारत-रूस संबंधों में चुनौतियां

इन क्षेत्रों के अलावा भारत और रूस के बीच तमाम अन्य क्षेत्रों मसलन रेलवे ब्लॉकचेन तकनीक उर्वरक उद्योग और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में सहयोग हो रहा है। लेकिन फिर भी भारत और रूस के बीच ज्यादातर रक्षा व्यापार ही होता है इसलिये दूसरे क्षेत्र उपेक्षित है। इससे इन दोनों देशों के बीच के संबंधों में थोड़ा असंतुलन पैदा हो रहा है। भारत की अमेरिका से बढाती नजदीकी भी रूस के लिए चिंता का सबब है।

निष्कर्ष

जहां भारत और रूस हमेशा से एक दूसरे के अभिन्न सहयोगी और मित्र रहे हैं वहीं बदलते वैश्विक परिस्थितियों में दोनों देशों के बीच कुछ चिंताएं भी उभर कर सामने आई हैं। ऐसे में इन तमाम फोरम पर दोनों देशों के बीच चल रही वार्ताएं सकारात्मक उम्मीद जताती हैं।