(Global मुद्दे) कश्मीर मुद्दे पर यूएनएससी बैठक के मायने (UNSC Meeting on Kashmir Issue)



(Global मुद्दे) कश्मीर मुद्दे पर यूएनएससी बैठक के मायने (UNSC Meeting on Kashmir Issue)


एंकर (Anchor): कुर्बान अली (पूर्व एडिटर, राज्य सभा टीवी)

अतिथि (Guest): राकेश सूद (पूर्व राजदूत), अजय बनर्जी (वरिष्ठ पत्रकार)

चर्चा में क्यों?

बीते दिनों संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद को 370 हटाए जाने पर एक अनौपचारिक बैठक हुई। शुक्रवार को हुई इस अनौपचारिक बैठक में दोनों देशों के बीच बढ़े तनाव पर चिंता ज़ाहिर की गई और संयम बरतने की भी अपील की गई है। बैठक में सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्य देशों और दस अस्थायी देशों के प्रतिनिधियों में से ज़यादातर देशों ने इस मसले को भारत का आंतरिक मामला बताते हुए इसमें दख़ल नहीं देने की बात कही।

ग़ौरतलब है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सदस्य देश नहीं होने के नाते पाकिस्तान और भारत इसमें शामिल नहीं हो सके हैं। ये अनौपचारिक बैठक पाकिस्तान द्वारा लिखे गए ख़त के बाद चीन द्वारा बुलाई गई आपात बैठक के बाद आयोजित की गई थी। इससे पहले UNSC अध्यक्ष ने पाकिस्तान को 1972 के शिमला समझौते का हवाला देते हुए इस मामले पर कोई भी प्रतिक्रिया देने से इंकार कर दिया था। था।

क्या है कश्मीर मसला?

भारत की आज़ादी के वक़्त शेख़ अब्दुल्ला के नेतृत्व में मुस्लिम कॉन्फ़्रेंस (बाद में नेशनल कॉन्फ्रेंस) कश्मीर की प्रमुख राजनैतिक पार्टी थी। कश्मीरी पंडित, शेख़ अब्दुल्ला और राज्य के ज़्यादातर मुसलमान कश्मीर का भारत में ही विलय चाहते थे क्योंकि भारत एक पंथनिरपेक्ष देश था। वहीं पाकिस्तान का मानना था कि कश्मीर एक मुसलमान बाहुल्य प्रांत है इसलिए उसे पाकिस्तान में शामिल होना चाहिए। इसके लिए पाकिस्तान इस हद तक चला गया कि साल 1947-48 में पाकिस्तानी सेना ने कबायलियों की भेष में कश्मीर पर आक्रमण कर दिया और क़ाफ़ी हिस्सा हथिया लिया। यहीं से भारत और पकिस्तान के बीच विवाद शुरू हो गया।

पाकिस्तान की इस हरकत के बाद जम्मू कश्मीर रियासत के महाराजा हरी सिंह ने भारत से मदद की गुहार लगाई और 26 अक्टूबर 1947 को जम्मू कश्मीर का विलय भारत में करने के लिए विलय पत्र यानी इंस्ट्रूमेंट ऑफ़ एक्सेशन पर दस्तख़त किए। इसके बाद साल 1950 में भारत के संविधान की पहली अनुसूची में भाग - ख राज्य में जम्मू कश्मीर को शामिल किया गया और जागे चल कर राष्ट्रपति के आदेश पर जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाला अनुच्छेद 370 लागू हुआ। कश्मीर में नब्बे के दशक में बढे चरमपंथ के बाद से ही पाकिस्तान ने इस मुद्दे का अंतरराष्ट्रीयकरण करना चाहा है। इसके लिए पाकिस्तान ने कई बार कश्मीर मसले पर को द्विपक्षीय के बजाय बहुपक्षीय क़रार दिया है।

क्या है अनुच्छेद 370?

अनुच्छेद 370 भारतीय संविधान का एक अस्थाई, संक्रमण कालीन और विशेष प्रावधान है। यह अनुच्छेद जम्मू और कश्मीर की स्वायत्तता से जुड़ा हुआ है। इस अनुच्छेद के मसौदे का उल्लेख संविधान के भाग XXI में किया गया है। अनुच्छेद 370 के प्रावधानों के मुताबिक भारतीय संसद को जम्मू कश्मीर के बारेमें केवल रक्षा, विदेश, संचार और वित्त के विषय में कानून बनाने का अधिकार प्राप्त है। इन विषयों के अलावा केंद्र सरकार द्वारा किसी अन्य विषय पर कानून बनाने और उसे जम्मू-कश्मीर में लागू करवाने के लिए राज्य सरकार का अनुमोदन जरूरी होता था।

क्या है शिमला समझौता?

1971 में हुए भारत - पाकिस्तान युद्ध के बाद शिमला समझौता हुआ था। ये समझौता 2 जुलाई 1972 को शिमला समझौता हुआ था। दरअसल 1971 के भारत - पाकिस्तान युद्ध के दौरान क़रीब 90 हज़ार सैनिकों को भारत ने बंदी बनाया था और पाकिस्तान के बड़े भू-भाग पर भारत ने कब्ज़ा भी कर लिया था। इस सब के परिणामस्वरूप तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पाकिस्तान के राष्ट्रपति ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो के बीच शिमला समझौता हुआ था।

  • शिमला समझौते के मुताबिक़ दोनों देशों के सम्बन्ध संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव के सिद्धांतों और उद्देश्यों के अनुरूप चलेंगे।
  •  दोनों देशों के बीच होने वाले सभी मतभेदों और आपसी विवाद को द्विपक्षीय बातचीत के ज़रिए हल किया जायेगा।
  • यदि दोनों देशों के बीच कोई मुद्दा लबित रह जाता है तो कोई देश उस मुद्दे को लेकर स्थिति में बदलाव करने की एकतरफा कोशिश नहीं करेगा।
  • दोनों देश किसी भी ऐसी गतिविधि में शामिल नहीं होंगे जो शांति और सुरक्षा के लिए ख़तरा हो।
  • समानता और आपसी लाभ के आधार पर शांति पूर्ण सहअस्तित्व बनाए रखेंगे।
  • एक दूसरे की राष्ट्रीय एकता, राजनीतिक स्वतंत्रता और क्षेत्रीय अखंडता व सम्प्रभुता का सम्मान करेंगे।
  • समानता और आपसी लाभ के आधार पर एक दूसरे के मामले में कोई हस्तक्षेप नहीं करेंगे।
  • 25 सालों से दोनों देशों के रिश्तों को प्रभावित करने वाले कारकों को शांति पूर्ण ढंग से हल किया जायेगा।
  • शिमला समझौते के तहत संचार, सीमाएं खोलने, अंतर्राष्ट्रीय उड़ानों को बहाल करने दोनों देशों के नागरिकों की यात्रा सुविधाओं को बढ़ाने की बात कही गई।
  • आर्थिक और दूसरे सहमति वाले क्षेत्रों में व्यापार और सहयोग को बढ़ावा देना का भी ज़िक्र किया गया।
  • विज्ञान और संस्कृति के क्षेत्र में सहयोग को बढ़ावा देना तय किया गया।
  • भारत और पाकिस्तान की सेनाओं को अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर वापस बुलाने का ऐलान हुआ।

संयुक्त राष्ट्र की बैठक में भारत का रुख

संयुक्त राष्ट्र में भारत के राजदूत सैयद अकबरुद्दीन ने कहा कि अनुच्छेद 370 का मुद्दा आंतरिक मामला है। जम्मू कश्मीर से हटाया गया अनुच्छेद 370 वहां के आर्थिक और सामाजिक विकास के लिए हटाया गया है। संयुक्त राष्ट्र में भारत के राजदूत सैयद अकबरुद्दीन ने ये भी कहा कि जम्मू-कश्मीर में हालात सामान्य करने के लिए आज कई फ़ैसले लिए गए हैं। इसके अलावा उन्होंने पाकिस्तान को भी निशाने पर लेते हुए कहा कि एक देश जिहाद और हिंसा की बात कर रहा है और हिंसा किसी मसले को नहीं सुलझा सकती है। अकबरुद्दीन ने कहा कि अगर पाकिस्तान को भारत से बात करनी है तो उसे हर हाल में पहले आतंकवाद को रोकना होगा तभी बातचीत संभव है।

अनुछेद -370 के हटने से नहीं है दुनिया को कोई ख़तरा

पाकिस्तान द्वारा अनुच्छेद 370 के मसले को सुरक्षा परिषद् में उठाए जाने के बाद भारत ने कहा है कि अनुछेद -370 के हटने से दुनिया में शांति और सुरक्षा का कोई ख़तरा नहीं है क्यूंकि अनुच्छेद 370 को हटाना भारत का संवैधानिक मामला है।

संयुक्त राष्ट्र की बैठक में पाकिस्तान का रुख

पाकिस्तान का कहना है कि उसने कश्मीर मसले का अंतरराष्ट्रीयकरण कर दिया है। पाकिस्तान की राजदूत मलीहा लोधी ने कहा कि कई दशकों के बाद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में यह मुद्दा उठा है और इस मंच पर उठने के बाद यह साबित हो गया है कि यह भारत का आंतरिक नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय मामला है। इसके अलावा पाकिस्तान ने चीन की बातों का हवाला देते हुए कहा कि जम्मू-कश्मीर में मानवाधिकारों की स्थिति बहुत ख़राब है।

पाकिस्तान चाहता था सुरक्षा परिषद में औपचारिक बैठक

पाकिस्तान सुरक्षा परिषद में कश्मीर मसले को लेकर एक औपचारिक बैठक चाहता था। लेकिन इस औपचारिक बैठक के लिए ज़रूरी सुरक्षा परिषद के सदस्यों का ज़रूरी समर्थन पाकिस्तान को नहीं मिला। दरअसल सुरक्षा परिषद में औपचारिक बैठक का प्रस्ताव रखने के लिए 15 सदस्य देशों में से कम से कम 9 सदस्य देशों का समर्थन ज़रूरी होता है जिसे पाकिस्तान हांसिल नहीं कर सका। इसके बाद चीन के हस्तक्षेप के बाद अनौपचारिक बैठक बुलाई गई।

अब आम सभा की बैठक में पाकिस्तान उठाएगा कश्मीर का मुद्दा

पाकिस्तान शुरू से ही कश्मीर मसले को वैश्विक स्तर पर लाना चाहता है। पाकिस्तान ने कई बार यूनाइटेड नेशन और जनरल असेम्ब्ली जैसे मंचो पर कश्मीर का राग अलापा है। जानकारों का कहना है कि 24 - 25 सितम्बर से शुरू होनी वाले आम सभा के सत्र में पाकिस्तान एक बार फिर से कश्मीर मसले को लेकर सामने आएगा।

संयुक्त राष्ट्र की बैठक में चीन का रुख

बैठक के बाद संयुक्त राष्ट्र में चीन के राजदूत झांग जुन ने कहा कि सदस्य देश कश्मीर में मानवाधिकारों की स्थिति को लेकर भी चिंतित हैं। साथ ही सदस्यों ने जम्मू-कश्मीर की ताज़ा स्थिति को लेकर गंभीर चिंताएं ज़ाहिर की हैं। संयुक्त राष्ट्र में चीन के राजदूत झांग जुन का कहना है कि जम्मू कश्मीर क्षेत्र में वहां तनाव पहले से ही बहुत ज़्यादा और काफी बहुत ख़तरनाक है। इस दौरान चीन ने लद्दाख का मुद्दा भी उठाया. उसने कहा कि अनुच्छेद 370 लद्दाख से भी हटी है और वह इसे अपनी संप्रभुता पर हमला मानता है।

अनुच्छेद 370 से मिला चीन को भारत पर दबाव बनाने का मौका

जानकारों के मुताबिक़ जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के बाद चीन को भारत पर दबाव बनाने का मौका मिल गया है जिसे वो आगे भी आज़माता रहेगा। कुछ जानकार चीन द्वारा सुरक्षा परिषद में बुलाई गई इस अनौपचारिक बैठक को आक्रामक कदम मान रहे हैं। साथ ही कह रहे हैं कि चीन पाकिस्तान का ये गठबंधन भारत को नकारात्मक सन्देश देने में सफल रहा है।

क्या होती है सुरक्षा परिषद् के बंद कमरे की बैठक?

इसमें सुरक्षा परिषद् के सभी स्थायी और अस्थायी सदस्य हिस्सा लेते हैं। मौजूदा वक़्त में सुरक्षा परिषद् में 5 स्थायी और 10 अस्थायी सदस्य हैं। इस तरह की बैठक का मक़सद ये होता है कि इसके सदस्य देश किसी मसले पर अनौपचारिक तरीके से अपनी राय रख पाते हैं। सुरक्षा परिषद् की बंद कमरे की बैठक से जुडी कोई भी जानकारी सार्वजनिक नहीं की जाती है। साथ ही इसका कोई रिकॉर्ड भी नहीं होता है। यहां तक की पत्रकारों को भी सुरक्षा परिषद् की बंद कमरे की बैठकों में हिस्सा लेने की इजाज़त नहीं होती है। जानकारों के मुताबिक़ बंद कमरे की बैठक सुरक्षा परिषद की पूर्ण बैठक नहीं होती है। इस तरह की लगभग तीन बैठकें हफ़्ते में सुरक्षा परिषद् में आयोजित हो जाती हैं। सदस्य देशों की सहमति के बगैर कोई औपचारिक बैठक संभव नहीं होती हैं। कश्मीर मसले पर इस तरह की बैठक 1964 -1965 में हुई थी। ये बैठक भारत पाकिस्तान के विवाद पर कश्मीर के एक क्षेत्र को लेकर हुई थी।

फ़्रांस ने की भारत को UNSC में शामिल किए जाने की बात

बीते दिनों फ्रांस ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत को शामिल किए जाने की बात कही थी। फ्रांस के मुताबिक़ भारत जर्मनी ब्राजील और जापान जैसे देशों को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनाए जाने की सख़्त ज़रूरत है। इसके अलावा भारत लम्बे समय से संयुक्त राष्ट्र में सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग कर रहा है। साथ ही दुनिया के कई देश भी भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में शामिल किए जाने का उचित हक़दार मानते हैं।

भारत - पाकिस्तान द्विपक्षीय सम्बन्ध

ब्रिटिश हुक़ूमत से आज़ादी मिलने के बाद पाकिस्तान भारत से द्विराष्ट्र सिद्धांत पर अलग हुआ था। भारत पाकिसान के साथ भाषाई, सांस्कृतिक, भौगोलिक, आर्थिक और जातीय सम्बन्ध साझा करता है लेकिन पाकिस्तान के साथ भारत के रिश्ते आपसी मतभेद, शत्रुता और संदेह के कारण पिछले 72 सालों से बेहतर नहीं हो पाए हैं। आज़ादी के बाद से अब तक भारत - पाकिस्तान के बीच चार युद्ध हो चुके हैं। रिश्तों को सुधारने के लिए दोनों देशों के बीच शिमला समझौता और लाहौर घोषणा पत्र जैसे कदम उठाए गए हैं लेकिन शुरू से ही नापाक हरकते करने वाले पाकिस्तान के लिए अब इसके कोई मायने नहीं रह गए हैं। भारत पाकिस्तान के बीच मौजूद समस्याओं में मुख्य रूप से कश्मीर मुद्दा, भारत पाकिस्तान सीमा विवाद और नदी जल बंटवारे जैसे मुद्दे शामिल हैं। इसके अलावा कुलभूषण जाधव को लेकर भी अंतराष्ट्रीय न्यायालय में चल रहा विवाद दोनों देशों के बीच अहम मुद्दा है।

भारत - पाकिस्तान द्विपक्षीय व्यापार

भारत - पाकिस्तान ट्रेड आर्गेनाईजेशन के मुताबिक़ 2018 - 19 में भारत पाकिस्तान के बीच कुल 2.05 बिलियन अमरीकी डॉलर का व्यापर था। मौजूदा समय में भारत पकिस्तान को सब्जियाँ, कपास, प्लास्टिक और लोहा व इस्पात जैसे सामानों का निर्यात करता है जबकि भारत पकिस्तान से मसाले, फल, और सीमेंट जैस सामानों को खरीदता है। पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के चलते भारत ने इस साल पाकिस्तान से मोस्ट फेवर्ड नेशन के भी दर्ज़ा वापस ले लिया। ग़ौरतलब है कि मोस्ट फेवर्ड नेशन दर्जा किसी देश के साथ द्विपक्षीय कारोबार को बढ़ावा दिए जाने के लिए दिया जाता है।

अनुच्छेद 370 पर संयुक्त राष्ट्र महासचिव की प्रतिक्रिया

अनुच्छेद 370 हटाने को लेकर पाकिस्तान ने भी काफी नाराज़गी जताई है। भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़ती तल्ख़ी को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने दोनों देशों से संयम बरतने की अपील की है। साथ ही महासचिव ने इस मुद्दे के समाधान के लिए साल 1972 में हुए शिमला समझौते का भी संदर्भ दिया है। साथ ही इस दौरान महासचिव ने कहा कि भारत और पाकिस्तान के बीच इस विवाद को लेकर कोई तीसरा मध्यस्थता नहीं कर सकता।

अमेरिका ने की थी कश्मीर मसले पर मध्यस्थता वकालत

बीते दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कश्मीर मुद्दे को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता का प्रस्ताव रखा था। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ये प्रस्ताव यह कहते हुए किया की दरअसल जापान में हुई G -20 शिखर बैठक के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कश्मीर मामले को सुलझाने में उनकी मदद मांगी थी। हालांकि राष्ट्रपति ट्रंप के इस बयान पर अमरीकी विदेश मंत्रालय ने सफाई देते हुए कहा था कि कश्मीर दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय मुद्दा है' लेकिन साथ ही यह भी जोड़ा की ट्रंप प्रशासन, पाकिस्तान और भारत के साथ इस मुद्दे पर सहयोग करने को तैयार है।

अमेरिका के कश्मीर मसले पर मध्यस्थता को भारत ने किया था ख़ारिज

भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने राष्ट्रपति ट्रम्प के इस बयान का तुरंत खंडन किया था और कहा था है कि प्रधानमंत्री द्वारा अमेरिकी राष्ट्रपति से ऐसा कोई अनुरोध नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि शिमला समझौता और लाहौर घोषणा पत्र जैसे समझौते भारत और पाकिस्तान के बीच सभी मुद्दों को द्विपक्षीय रूप से हल करने का आधार हैं ।

यूरोपीय यूनियन के प्रतिक्रिया

बीते दिनों अनुच्छेद 370 को हटाए जाने को लेकर यूरोपियन यूनियन ने अपने बयान में कहा था कि भारत-पाकिस्तान के बीच जो तनाव बढ़ा है, उसे कम करने के लिए दोनों देशों को बातचीत के लिए आगे आना चाहिए। क्यूंकि बातचीत के जरिए मामले को आसानी से सुलझाया जा सकता है।

अनुच्छेद 370 को लेकर आई कुछ अन्य अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाएं

  • मौजूदा मामले को लेकर चीन ने चिंता जाहिर की थी इस भारत में चीन को हिदायत दी कि 370 हटाया जाना भारत का आंतरिक मामला है और इसमें चीन की दखलअंदाजी ठीक नहीं।
  • अफगानिस्तानी संगठन तालिबान ने भी मामले को शांति से हल करने की अपील की थी साथ ही तालिबान ने कश्मीर मसले को अफगानिस्तान से न जोड़े जाने की भी सलाह दी है।
  • पाकिस्तानी सामाजिक कार्यकर्ता मलाला यूसुफजई ने भी पाकिस्तान को इस मामले में आईना दिखाते हुए कहा इससे कश्मीर में शांति बहाल हो सकती है लिहाजा पाकिस्तान फालतू के कदम उठाने से बचना चाहिए।
  • अनुच्छेद 370 के मामले पर बांग्लादेश के आवामी लीग के महासचिव अब्दुल कादर ने कहा कि 370 हटाए जाना भारत का आंतरिक मामला है। इसमें अंतरराष्ट्रीय समुदाय को हस्तक्षेप करने का कोई औचित्य नहीं बनता।