Daily Current Affairs for UPSC, IAS, State PCS, SSC, Bank, SBI, Railway, & All Competitive Exams - 30 January 2020


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दल बदल विरोधी कानून

चर्चा में क्यों ?

  • हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने मणिपुर से सम्बन्धित एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि दल बदल विरोधी कानून के अनुसार किसी सदन के सदस्य की योग्यता के निर्धारण की अंतिम शक्ति उस सदन के पीठासीन अधिकारी के पास होता है, किन्तु कई मामलों में वह निस्पक्ष नहीं भी हो सकता है, इसलिए सदस्यों की योग्यता के निर्धारण के लिए एक अलग से अधिकरण (ट्रिव्यूनल) बनाया जा सकता है, यद्यपि यह सहाकारी सुझाव है, निर्देश नहीं।
  • दरअसल मणिपुर विधानसभा के सदस्य श्यामकुमार अपनी पार्टी छोड़कर सत्ताधारी दल (BJP) में शामिल हो गये ऐसे में नियमतः तो उनकी सदस्या रद्द होनी चाहिए किन्तु कानून में फैसला सुनाने की समय सीना का प्रावधान न होने के कारण मणिपुर विधानसभा अध्यक्ष (सत्ताधारी दल से है।) फैसला नहीं सुना रहे हैं कई बार तो ऐसा देखा गया है कि सदस्य की कार्यकाल समाप्त होने के बाद फैसला आया है।

क्या है, दल बदल विरोधी कानून

  • दरअसल 1980 के दौरान सदन के सदस्य भौतिक लाभ के कारण दल बदल बहुत करते थे जिससे राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न होती थी, ऐसे में इस हाॅर्स ट्रेडिंग या आया राम गया राम की राजनीति समाप्त करने के लिए संसद ने 1985 में 52वें संविधान संशोधन के माध्यम से संविधान में दसवीं अनुसूची जोड़ी जिसमें निम्न आधारों पर सदस्यों के अयोग्यता का प्रावधान किया।
  • यदि कोई सदस्य अपनी पार्टी को छोड़कर अन्य पार्टी में शामिल हो जाता है।
  • यदि कोई सदस्य पार्टी के व्हीप के विरूद्ध मतदान करता है या सदन में अनुपस्थित रहता है।
  • यदि कोई मानोनीत सदस्या, सदस्यता प्राप्त के 6 माह बाद किसी दल में शामिल हो जाता है।
  • हालांकि दल टूटने के बाद दूसरे दल में शामिल होने, तथा एक तिहाई सदस्यों का एक साथ पार्टी छोड़ना, या किसी सदस्य का पीठासीन अधिकारी के रूप में चुने जाने पर इस कानून से छूट प्राप्त हैं।

दल बदल विरोधी कानून से संबंधित अन्य मुद्दे-

  • इस कानून पर विशेषज्ञ समय समय पर प्रश्न उठाते रहते हैं जो इस प्रकार है-
  • सदस्यों की अयोग्यता के संदर्भ में पीठासीन अधिकारी द्वारा निर्णय लेने हेतु कोई समय सीमा नहीं है, जिसका फायदा राजनीतिक हित हेतु उठाया जा सकता है, क्योंकि पीठासीन अधिकारी भी किसी दल से संबंधित होता है ऐसे में उसकी निस्पक्षता पर सवाल उठ सकता है।
  • यह कानून सदस्यों की वाक् एवं अभिव्यक्ति एवं सहमतिध् असहमति की स्वतंत्रता को बाधित करता है क्योंकि कोई भी सदस्य पार्टीलाइन के बाहर मतदान नहीं कर सकता है, जबकि अमेरिका, आस्ट्रेलिया जैसे देशों में सदस्य पार्टीलाइन से बाहर मतदान कर सकता है।
  • सदस्यों का कार्य किसी दल को पोषित करना नहीं है, बल्कि नागरिकों के अपेक्षानूरूप नीति बनाना एवं विकासात्मक कार्य करना है, किन्तु इस कानून के कारण मंत्रीमण्डल बिना किसी सदस्य से चर्चा किए किसी को सदन में ले आती है, और व्हिप जारी करके मतदान का निर्देश देती है, जिससे जन भावनाओं की उपेक्षा होती है।

दल बदल विरोधी कानून से संबंधित कुछ अन्य हालिया घटनाक्रम

  • July- 2019 में कर्नाटक विधानसभा अध्यक्ष के. आर. रमेंश कुमार ने 17 विधानसभा सदस्यों को आयोग्य (इस कानून के तहत) घोषित कर दिया, इसमें 14 कान्ग्रेसी तथा 3 JDS के सदस्य थे, इसी संदर्भ में बाम्बे उच्च न्यायालय ने कहा था कि एक बार आयोग्य घोषित हो जाने पर वर्तमान विधान सभा के कार्यकाल तक चुनाव लड़ने पर रोक लगाना चाहिए, किन्तु कर्नाटक इस मामले को उच्चतम न्यायालय में चुनौती देने पर SC ने आयोग्य सदस्यों को उसी कार्यकाल में चुनाव लड़ने की छूट प्रदान की जिससे वे पुनः निर्वाचित हो सके हैं, जिससे वे पुनः निर्वाचित हो सके हैं, इस घटना से समीक्षकों का मानना है कि इस कानून की मूल भावना के विरूद्ध यह प्रकरण कानून में मौजूद कमियों के कारण सामने आया है।
  • ऐसी ही स्थिति 2016 में उत्तराखण्ड में देखने को मिलि थी, जिसमें विधानसभा उध्यक्ष ने 9 विधायकों को अयोग्य करार दिया था।
  • 2002 में वेंकट चेल्लया की अध्यक्षता वाली संविधान समीक्षा आयोग ने भी कहा था कि योग्यता का निर्धारण विधानसभा के मामले में राज्यपाल एवं संसद के मामले में राष्ट्रपति चुनाव आयोग के सुझाव पर करें।
  • Kihoto Hollohon बाद समेत कई मामलों में उच्चतम न्यायालय ने समय समय पर इस पर अपना वक्तव्य दिया है, जिससे स्पष्ट किया है, कि स्वेच्छा से पार्टी छोड़ना स्तीफे का पर्याय नहीं है। इसके अलावा पीठासीन अधिकारी का निर्णय न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर नहीं है।

आगे की राह

  • सदस्यों की अयोग्यता के सन्दर्भ में दिनेश गोस्वामी समिति ने कहा था कि सदस्यों की योग्यता का निर्धारण पीठासीन अधिकारी के बजाय राष्ट्रपति सा राज्यपाल चुनाव आयोग की परामर्श पर करें।
  • विधिआयोग की 170 वीं रिपोर्ट ने कहा था कि यदि चुनाव से पहले कोई गटब-धन होता है तो चुनाव के बाद उसे एक राजनीतिक दल माना जाये जिससे सदस्यों की योग्यता का निर्धारण आसान हो ।
  • जनवरी 2019 के उच्चतम न्यायालय के सुझाव के अनुसार सदस्यों की योग्यता का निर्धारण पीठासीन अधिकारी के बजाय एक स्वायत्त अधिकरण के द्वारा भी किया जा सकता है।
  • एक विकल्प यह भी हो सकता है कि इस कानून में संशोधन करके ऐसा प्रावधान किया जा सकता है कि पीठासीन अधिकारी एक समय. सीमा के भीतर अपनी निर्णय दे।
  • अतः इस प्रकार उपरोक्त में से कौन सा विकल्प चुना जाये यह विवाद का मुद्दा हो सकता है किन्तु यह निर्विवाद है कि लोकतंत्र में जनभावनाओं की उपेक्षा न हों।

राजनीति का अपराधीकरण

  • राजनीति का अर्थ राज्य चलाने की नीति से है और राजय का अध्ययन राजनीति विज्ञान कहलाता है- डॉ. गार्नर
  • राजनीति में अपराधियों की बढ़ती संख्या, प्रभाव और गिरते राजनीतिक सुचिता को राजनीति का अपराधीकरण कहते हैं।
  • अपराधियों का राजनीति में प्रवेश करना, चुनाव लड़ना और जीतकर विधायिका तक पहुँचना राजनीति का अपराधीकरण कहलाता है।
  • इसमें उत्पन्न होने वाली समस्याएं
  1. लोकतंत्र की छवि और भावना कमजोर होती है।
  2. विधायिका अपराध पर नियंत्रण रखने में असफल सिद्ध होगी।
  3. भ्रष्टाचार और अपराध को बढ़ावा मिलेगा।
  4. प्रशासन और कानून व्यवस्था में व्यवधान उत्पन्न होगा।
  5. लोगों और चुने गये प्रतिनिधियों के बीच दूरी बढ़ेगी।
  • इन लोगों का प्रवेश सम्भव कैसे होता है।
  1. भारत के अभी बहुत से क्षेत्रों में व्यक्ति अपने अधिकारों के लिए संघर्ष नहीं करता है तो साथ ही प्रशासन उनकी सुनता भी नहीं है। ऐसे में यह मददगार के रूप में सामने आये हैं।
  2. धनबल और बाहुबल के कारण ऐसे लोगों के जीतने की संभावना ज्यादा होती है, इसलिए राजनीतिक पार्टियाँ इन्हें ज्यादा टिकट देती है।
  3. राजनीतिक पार्टियों को भी धनबल और बाहुबल की आवश्यकता होती है।
  • रोकने के लिए प्रयास
  1. 2002 में सुप्रमीकोर्ट ने यह आदेश दिया कि वह सभी लोग जो चुनाव लड़ना चाहते हैं उन्हें एक एफिडेविट देना होगा जिसमें उनके अपराधिक इतिहास की जानकारी हो।
  2. NOTA का विकल्प रखा गया।
  3. 2013 से पहले यदि किसी व्यक्ति को 2 साल या उससे ज्यादा समय की सजा होती थी तो वह बड़ी कोर्ट में अपील कर अपनी सदस्यता बचा लेता था लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अब यह आदेश दिया कि यदि अब किसी को 2 साल या इससे अधिक समय की सजा होती है तो उसी समय से MP या MLA की उसकी सदस्यता समाप्त हो जायेगी।
  4. 2014 में कोर्ट का यह आदेश आया कि जिनके ऊपर केस का ट्रायल चल रहा है बह ट्रायल एक साल के भीतर पूरा किया जाये।
  5. 2017 में कोर्ट ने कहा कि ऐसे लोगों के ऊपर लगे आरोपों के ट्रायल के लिए Special Courts बनाया जाये।
  6. 2018 में कोर्ट ने आदेश दिया कि यदि राजनीतिक दल ऐसे किसी व्यक्ति को वोट देते हैं तो इसकी सूचना मीडिया और न्यूज चैनल में प्रसारित और प्रकाशित की जानी चाहिए।
  • वर्तमान समय में इसी प्रावधान को लेकर एक PIL सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई है जिसमें कहा गया है कि राजनीतिक दल इस आदेश का सही से पालन नहीं करते हैं।
  • PIL में यह भी कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट के इसक आदेश चुनाव आयोग द्वारा माडल कोड आफ कंडक्ट का हिस्सा नहीं बनाया गया है और न ही Election Symbol Order 1968 में संशोधन कर इसमें शामिल किया गया है।
  • यह PIL इसलिए और अधिक चर्चा में है क्योंकि हाल ही में आई एक रिपोर्ट में कहा गया है कि 46% MP का क्रिमिनल रिकार्ड है।
  • इसमें से 29% सदस्य ऐसे हैं जिनके ऊपर गंभीर श्रेणी के अपराध है।
  • इस PIL के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने 1 सप्ताह के भीतर चुनाव आयोग से अपना पक्ष रखने और सुझाव प्रस्तुत करने के लिए कहा है।
  • सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिये इन महत्वपूर्ण निर्णयों के बावजूद अपराधीकरण की प्रवृत्ति रूक नहीं रही है, इसके पीछे एक प्रमुख कारण लोगोे में जागरूकता का अभाव है।
  • जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 में संशोधन करने की आवश्यकता है। इसमें गंभीर अपराध के आरोपी को चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध होना चाहिए।
  • जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 8 दोषी को चुनाव लड़ने पर तो प्रतिबंध लगाती है लेकिन आरोपी को नहीं, भले ही आरोप कितना भी गंभीर हो।