Daily Current Affairs for UPSC, IAS, State PCS, SSC, Bank, SBI, Railway, & All Competitive Exams - 29 June 2020


Daily Current Affairs for UPSC, IAS, State PCS, SSC, Bank, SBI, Railway, & All Competitive Exams - 29 June 2020



OBOR चर्चा में क्यों ?

  • चीन का मानना है कि आज से 2000 साल पहले चीन के शाही राजदूत झांगकियान (Zhang Qian) ने व्यापार मार्गों का एक नेटवर्क स्थापित करने में मदद की थी। यह व्यापार मार्ग चीन को मध्य एशिया और अरब से जोड़ता था।
  • इस मार्ग से उस समय का चीन का सबसे महत्वपूर्ण सामान रेशम(SILK) का निर्यात किया जाता था इस कारण इसे सिल्क रोड के नाम से जाना जाता था।
  • हालांकि चीन के इस दावे पर कई विद्वानों को संदेह है और उनका मानना है कि Silk Road शब्द का पहली बार उपयोग 1877 में जर्मन भूगोलविद फार्डेनेड वॉन रेक्थोफन (Ferdinend Von Rekthofan) द्वारा किया गया था।
  • वर्ष 2013 में चीन के राष्ट्रपति शी-जिनपिंग ने प्राचीन सिल्क रूट के तर्ज पर एक आधुनिक नेटवर्क स्थापित करने की पहल की, जिसमें रेलवे, सड़कों, पाइप लाइनों और अन्य उपयोगी ग्रिड निर्माण का प्रस्ताव है। इसे One Belt One Road Initiative नाम दिया गया है।
  • यह नेटवर्क चीन को मध्य एशिया, पश्चिमी एशिया, अफ्रीका, यूरोप एवं दक्षिण पूर्व एशिया को जोड़ेगा।
  • चीन का उद्देश्य इस मार्ग के माध्यम से व्यापार, वित्तीय भागीदारी, नीतिगत समन्वय और सामाजिक सांस्कृतिक सहयोग का दुनिया का सबसे बड़ा मंच स्थापित करना है।
  • इसके लिए कई देशों में रेल नेटवर्क, सड़क नेटवर्क, जलमार्ग, बंदरगाह, पाइपलाइन आदि का विकास किया जा रहा है।
  • OBOR के वित्त पोषण के लिए वर्ष 2014 में 40 अरब डॉलर के सिल्क रोड फंड की स्थापना की।
  • OBOR एक्शन प्लान के 2 मुख्य भाग हैं। पहला है Silk Road Economic Belt और 21st Century Maritime Silk Road
  • सिल्क रोड इकोनामिक बेल्ट के माध्यम से सड़कों एवं रेल लाइनों का विकास प्रस्तावित है वही Maritime Silk Road के माध्यम से समुद्री मार्गों को दुरुस्त किया जाएगा।
  • 60 से अधिक देशों द्वारा OBOR में शामिल होने की रुचि 2017 में ही दिखा दी गई थी।
  • इसी प्रकार की एक रुचि केन्या के द्वारा भी दिखाई गई थी। केन्या में OBOR के तहत एक रेलवे ट्रेक निर्माण केन्या के पूर्वी भाग में स्थित MOMBASA से MALABA तक किया जा रहा था।
  • इसे बनाने के लिए वर्ष 2014 में केन्या की रेलवे मिनिस्ट्री और चीन की एक कंपनी चाइनारोडएंड ब्रिज कॉरपोरेशन के बीच लगभग 3.2 बिलियन डॉलर का करार हुआ था।
  • वर्ष 2017 में इस पर काम प्रारंभ हुआ और इसका लगभग अधिकांश भाग पूरा हो चुका है।
  • काम शुरू होने के साथ ही इस पर विरोध प्रारंभ हो गया था।
  • ओकिया नामक एक एक्टिविस्ट और कुछ वकीलों ने कोर्ट में इसे चुनौती दी।
  • इनका मानना था कि रेलवे सीधे तौर पर जनता से जुड़ी है इसलिए इसके किसी भी करार में पारदर्शिता आवश्यक है। जबकि इस करार के लिए तो कोई टेंडर भी जारी नहीं हुआ।
  • इनका कहना है कि बिना टेंडर के सीधे चीनी कंपनी को यह टेंडर सौपना गलत फैसला है।
  • मामले की सुनवाई में अदालत ने यह पाया कि केन्या रेलवे ने कॉन्ट्रैक्ट देते समय कानून का ध्यान नहीं रखा इसलिए यह प्रोजेक्ट गैरकानूनी है।
  • अब सरकार इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी में है।
  • सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इस प्रोजेक्ट के लिए चीन की बैंक से ही कर्ज लिया गया है।
  • केन्या की वित्तीय स्थिति पहले से ही बहुत अच्छी नहीं है ऐसे में यह ऋण इसे और विषम बना सकती है।
  • केन्या के साथ-साथ चीन के लिए भी यह फैसला विषम स्थिति उत्पन्न कर सकता है क्योंकि चीन का केन्या के माध्यम से केन्या के पश्चिम में स्थितअफ़्रीकी देशों तक पहुंचने का सपना और प्लान टूट सकता है।
  • दरअसल चीन इस प्रोजेक्ट के माध्यम से अफ्रीका होते हुए यूरोप तक पहुंचने का मार्ग बनाना चाहता है जिससे उसके प्रभुत्व के साथ-साथ व्यापार में बढ़ोतरी हो सके।
  • यह कोई पहली बार नहीं है कि किसी देश में चीन के OBOR को रोका गया हो या विरोध किया गया हो।
  • श्रीलंका इसका सबसे बड़ा उदाहरण हो सकता है। हंबनटोटा बंदरगाह और इसी तरह के कई निवेशो में श्रीलंका फसकर ऋण के संकट से गुजर रहा है। इसी कारण श्रीलंका में चीन को लेकर काफी आक्रोश भी है।
  • नेपाल, बांग्लादेश, पाकिस्तान, श्रीलंका आदि देश पहले ही OBOR के जाल में फस चुके हैं।
  • चीन पाकिस्तान इकोनामिक कॉरिडोर पर भारत अपनी चिंता प्रकट कर चुका है। यह POK के गिलगिटबालटिस्तान से गुजर रहा है।
  • इस समय नेपाल जिस तरह चीन की तरफ जा रहा है वह भी चिंताजनक है। यहां OBOR के माध्यम से चीन ने भारी निवेश किया है। जिसके कारण नेपाल पर चीन का प्रभाव बढ़ा है और भारत से दूरी बढ़ी है।

तेल की कीमत इस समय ज्यादा क्यों है ?

  • इस समय तेल के मूल्यों को लेकर पूरे देश में अलग-अलग प्लेटफार्म और अलग अलग तौर तरीके से विरोध प्रदर्शन किया जा रहा है।
  • विरोध प्रदर्शन करने वालों का तर्क यह है कि आखिर अंतरराष्ट्रीय बाजार में जब कच्चे तेल की कीमतें बहुत कम है और कुछ दिन पहले तो और भी ज्यादा कम थी तो भारत में इस समय तेल का मूल्य इतना ज्यादा क्यों है।
  • इसके लिए हमें तेल के मूल्य के गणित को समझना होगा। तेल की कीमतें ग्राहकों से वसूला जाता है इसलिए इससे पहले के निम्न चरणों को समझना होगा।
  • कच्चा तेल अंतरराष्ट्रीय मार्केट से खरीदा जाता है इसलिए इस बाजार में तेल की कीमत जितनी कम होगी ग्राहक को उतना ही फायदा होगा।
  • अंतरराष्ट्रीय बाजार के बाद तेल रिफाइनरी में जाता है यहां पेट्रोल, डीजल अन्य उत्पाद प्राप्त होते हैं । उत्पादन लागत जितनी कम होगी ग्राहक तक उतने कम कीमत में पहुँच पायेगा।।
  • तेल कंपनियां अपना मुनाफा जोड़कर पेट्रोल पंप पर पहुंचाती है। मुनाफा की दर कम होना ग्राहक के लिए अच्छा होता है।
  • पेट्रोल पंप पर मालिक अपना कमिशन तय करता है । कमिशन कम होने पर ग्राहक को फाइदा होगा !
  • ग्राहक पेट्रोल पंप पर एक्साइजड्यूटी और वैट देकर तेल प्राप्त करता है !
  • एक्साइज ड्यूटी एक प्रकार का टैक्स है। इसे वस्तु के निर्माण के समय लगाया जाता है।
  • यह एक प्रकार का अप्रत्यक्ष (Indirect) कर होता है जिसका भुगतान उपभोक्ता को करना होता है।
  • अर्थात सरकार इसे कंपनियों से प्राप्त करती है लेकिन कंपनियां उपभोक्ताओं से इसे वसूलती है।
  • इसी प्रकार VAT राज्यों के द्वारा लगाया जाता है।
  • इन 5 चरणों में तेल की घरेलू कीमत के निर्धारण में अंतिम चरण अर्थात एक्साइज ड्यूटी और वैट की दर का योगदान सबसे ज्यादा होता है।
  • सामान्यतः हम जिस कीमत पर तेल खरीदते हैं कई बार उसमें 50% टेक्स होता है।
  • टेक्स ज्यादा होने पर बाकी चरणों में की गई कटौती निष्प्रभावी हो जातीहैं।
  • वर्ष 2010 से पहले तेल की कीमतों के निर्धारण में सरकार की भूमिका ज्यादा होती थी। इससे कंपनियों को कई बार बहुत घाटा हो जाता था।
  • जून 2010 में पेट्रोल और अक्टूबर 2014 में डीजल की कीमतों को सरकारी नियंत्रण से बाहर कर तेल कंपनियों को तेल कीमतों को कम या ज्यादा करने की इजाजत दे दी गई ।
  • इसका मतलब है अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के मूल्यों के अनुसार यहां की कंपनियां खुद कीमत को समायोजित कर सकती थी।
  • प्रारंभ में मांह में दो बार(1 तारीख व 16 तारीख)कीमतों का निर्धारण होता था। इससे प्रतिदिन के उतार-चढ़ाव का समायोजन नहीं हो पाता था।
  • इससे 15 दिन के बाद कई बार मूल्य में 1.5 रुपए से 2 रुपए प्रति लीटर तक बढ़ोतरी हो जाती थी।
  • वर्ष 2017 में भारत में एक नया तरीका अपनाया गया वह था प्रतिदिन तेल की कीमत का निर्धारण।
  • प्रतिदिन सुबह 6:00 बजे यह निर्धारित होता है।
  • 1 मई 2017 से 5 शहरों उदयपुर, जमशेदपुर, पुडुचेरी एवं वाई-जेग से इसका प्रारंभ हुआ। जून 2017 से यह पूरे देश में लागू हो गया।
  • इससे प्रतिदिन मूल्यों में उतार चढ़ाव कम मात्रा में होती है।
  • मार्च के माह में COVID-19 के वैश्विक प्रसार के कारण तेल कीमतों में बहुत ज्यादा उतार-चढ़ाव आ रहा था।
  • इसी कारण 15 मार्च को कुछ समय के लिए तेल की कीमतों की रोजाना समीक्षा को रोक दिया गया।
  • इस समय NCR में तेल की कीमत लगभग पेट्रोल के संदर्भ में 69.5 रुपए/लीटर एवं 62.2 रुपए/लीटर डीजल के संदर्भ में था।
  • जबकि वर्तमानसमय में पेट्रोल की कीमत 80.43 रुपये प्रति लीटर और डीजल 80.53 रुपये प्रति लीटर हो गया है ।
  • इसी के साथ जून माह में तेल की कीमत में लगातार 21 दिन से वृद्धि हो रही है।
  • सरकार ने मार्च में 3 रुपए/लीटर एक्साइज ड्यूटी को बढ़ा दिया था।
  • इससे वैश्विक तेल की कीमतों का जो फायदा मिलना चाहिए था वह नहीं मिला।
  • 6 मई को सरकार ने पुनः एक बार एक्साइज ड्यूटी बढ़ा दी।
  • इस समय एडिशनल ड्यूटी और एक्साइज ड्यूटी को मिलाकर कुल टैक्स डीजल पर 13 रुपए लीटर तथा पेट्रोल पर लगभग 10 रुपए प्रति लीटर बढ़ाया गया।
  • इस टैक्स वृद्धि के बाद भारत तेल पर सबसे ज्यादा टैक्स वसूलने वाला देश बन गया।
  • इस समय सरकार पेट्रोल पर लगभग 33 रुपए व डीजल पर लगभग 32 रुपए एक्साइज ड्यूटी ले रही है।
  • एक्साइज के अलावा वेट और एडिशनल टैक्स का बोझ अलग है।
  • तेल की कीमत को इस समय एक और कारक प्रभावित कर रहा है। यह रुपए का कमजोर होना है। इस समय एक डॉलर लगभग 76-77 रुपए के बराबर है।
  • चूंकि अंतरराष्ट्रीय भुगतान डॉलर में होता है इसलिए रुपए की स्थिति कीमत को प्रभावित करती है।
कच्चा तेल डॉलर
1 लीटर = $1 = 50 रुपए
1 लीटर = $1 = 60 रुपए
1 लीटर = $1 = 70 रुपए - रुपया कमजोर- ज्यादा भुगतान
  • COVID-19 के समय सरकारी खर्चे जहां बढ़ गए हैं वहीं सरकारी राजस्व में बहुत ज्यादा गिरावट आई है।
  • समीक्षकों का मानना है कि प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष के बाकी स्त्रोत ठप्प होने के कारण सरकार एक्साइज ड्यूटी के माध्यम से कुछ राजस्व प्राप्त करने का प्रयास कर रही है।
  • हालांकि कीमतों में वृद्धि से आजमन के साथ ट्रांसपोर्ट और औद्योगिक क्षेत्र भी प्रभावित हो रहा है।