(Video) Daily Current Affairs for UPSC, IAS, UPPSC/UPPCS, BPSC, MPSC, RPSC & All State PSC/PCS Exams - 29 December 2020


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विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था कैसे बन रहा है चीन

  • वर्ष 2020 में लगाये गये अनुमान के अनुसार अमेरिकन अर्थव्यवस्था का आकार 21.4 ट्रिलियन है जबकि चीन की अर्थव्यवस्था का आकार 14.1 ट्रिलियन डॉलर है। चीन की अर्थव्यवस्था तेजी से आगे बढ़ रही है और हाल ही में आई एक रिपोर्ट में यह बताया गया है कि चीन वर्ष 2028 तक अमेरिका को पीछे छोड़ देगा। वहीं इस रिपोर्ट में यह कहा गया है कि वर्ष 2030 में चीन, अमेरिका के बाद भारत तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जायेगा।
  • यह अनुमान यूके के एक प्रतिष्ठित संस्थान द सेंटर फॉर इकॉनमिक्स एंड बिजनस रिसर्च द्वारा लगाया गया है। 
  • पहले यह अनुमान लगाया गया था कि चीन ऐसा वर्ष 2033 तक कर पायेगा लेकिन करोना महामारी में चीन की अर्थव्यवस्था ने जो तेजी दिखाई है और दूसरी तरफ अन्य अर्थव्यवस्था जहां सिकुडी हैं इसकी वजह से आने वाले समय में अर्थव्यवस्था की स्थिति व्यापक स्तर पर बदल सकती है।
  • इस समय विश्व का लगभग 80 प्रतिशत AC चीन द्वारा निर्मित किया जा रहा है। वहीं वर्तमान स्मार्टफोन के बाजार पर चीन का 70 प्रतिशत से अधिक कब्जा है। 
  • 73-74 प्रतिशत सोलर सेल/पैनल चीन द्वारा निर्मित किया जाता है। वहीं वैश्विक सीमेंट उत्पादन में चीन की हिस्सेदारी 60 प्रतिशत है।
  • विश्व का लगभग 50 प्रतिशत कोयला उत्पादन चीन द्वारा किया जाता है। 44-45 प्रतिशत पानी जहाज निर्माण कार्य में चीन की हिस्सेदारी है। लगभग 60 प्रतिशत जूते चीन में बनाये जाते हैं।
  • हैवी इंडस्ट्री को आधार देने के लिए स्टील की आवश्यकता होती है और चीन लगभग आधा स्टील का उत्पादन अकेले करता है। 
  • चीन न सिर्फ विनिर्माण से संबंधित उत्पादों का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा है बल्कि वैश्विक कृषि निर्यात में भी चीन सबसे आगे है। इस तरह प्राथमिक एवं द्वितीयक सेक्टर पर चीन का लगभग पूरा कब्जा बना हुआ है।
  • चीन प्रति वर्ष लगभग 2 हजार 560 अरब डॉलर का निर्यात करता है वहीं भारत का कुल निर्यात लगभग 430 अरब डॉलर से कम है।
  • चीन न सिर्फ अधिक निर्यात करता है बल्कि अधिक उत्पादन करने के लिए बच्चे सामान के रूप में प्रति साल लगभग 2 हजार 150 अरब डॉलर का आयात भी करता है। भारत के संदर्भ में यह आंकडा लगभग 515 अरब डॉलर का है। 
  • चीन ने अपना रेल नेटवर्क लगभग 1 लाख 21 हजार किलोमीटर में फैलाया है और विश्व की सबसे तेज रेलों का संचालन किया है जिससे वस्तुओं और सामानों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँचाना आसान हुआ है। भारत का रेल नेटवर्क अभी तीव्र गति की ट्रेन के अनुकूल नहीं हो पाया है।
  • चीन ने 130 बड़े बंदरगाह तथा 200 मध्यम आकार बंदरगाह का विशाल नेटवर्क खड़ा किया है। भारत में 13 बड़े बंदरगाह और 200 छोटे बंदरगाह हैं। इसी प्रकार का अंतर एविशन (हवाई-आवागमन) में भी है। 
  • भारत की अर्थव्यवस्था वित्तीय वर्ष 2020-21 में जहाँ -7.5 प्रतिशत की नकारात्मक वृद्धि दिखा सकती है वहीं चीन लगभग 3.4 प्रतिशत की सकारात्मक वृद्धि के साथ आगे बढ़ रहा है और आने वाले समय में यहां की ग्रोथ रेट और बढ़ सकती है।
  • भारतीय अर्थव्यवस्था में कम ग्रोथ रेट सिर्फ कोरोना की वजह से नहीं है। पिछले वर्ष 2019-20 में भी हमें 4.2 की ग्रोथ रेट प्राप्त हुई थी, जो 11 साल में सबसे कम थी।
  • नोटबंदी, GST जैसे परिवर्तनों का अल्पकालिक नकारात्मक प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था पर स्पष्ट रूप से देखा गया। 
  • 1978 में जब चीन ने आर्थिक सुधार किया तो वहां की प्रति व्यक्ति आय मात्र 155 अमेरिकी डॉलर थी, जो अब लगभग 50 गुना बढ़ चुकी है। 1978 में भारत की प्रति व्यक्ति आय 210 डालर था।
  • चीन के 800 मिलियन लोगों को चीन पिछले 25 वर्षों में गरीबी रेखा से ऊपर आये हैं।

चीन ऐसा कैसे कर पाया?

  • विश्व स्तरीय आधारभूत संरचना।
  • कम लागत वाली ऊर्जा की सतत आपूर्ति।
  • औद्योगिक क्लस्टर का निर्माण और एक नेटवर्क का विस्तार जो आंतरिक वाह्य व्यापार को बढ़ाता है। 
  • स्किल डेवलमेंट प्रोग्राम का कार्यक्रम और व्यायवसायिक तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा।
  • सरकार के स्थायित्व का भरोशा।
  • एक्सपीरिंएस और विशेषज्ञता पर बल
  • लागत प्रभावी श्रम की आपूर्ति
  • प्रतिस्पर्धात्मक लागत और रिवर्स मैन्युफेक्चरिंग की नीति (Competitive Pricing With Reverse Manufacturing)
  • बड़े स्तर पर किसी भी सामान का उत्पादन।
  • सरकार और कॉर्पोरेट का गठजोड़।

पाँच ट्रिलियन की भारतीय अर्थव्यवस्था और MSME

  • इस समय भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार लगभग 2.6 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर का है, जिसे भारत के नीति निर्माताओं ने वर्ष 2024 तक 5 ट्रिलियन तक पहुँचाने का लक्ष्य रखा है।
  • कोरोना महामारी ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर व्यापक नकारात्मक डाला है, इसीकारण नकारात्मक जीडीपी ग्रोथ देखी जा रही है, इसके बावजूद सरकार का मानना है कि वर्ष 2024 तक हम 5 ट्रिलियन के लक्ष्य को प्राप्त कर लेंगे। दूसरी और समीक्षकों का मानना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था अभी इस गति को हासिल नहीं कर पायेगी। इनका कहना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था ने 1 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था बनने में 55 साल का समय लिया था। इस समय तक हमने बहुत कुछ हासिल अवश्य कर लिया है लेकिन यह इतनी जल्दी संभव नहीं हो पायेगा। सरकार को यह भरोशा इस वजह से क्योंकि बहुत से क्षेत्र ऐसे हैं जिनमें विकास की प्रबल संभावना है, जिसमें से एमएसएमई (MSME) प्रमुख है। 
  • MSME जिसका मतलब माइक्रो, स्मॉल, मीडियम इंटरप्राइजेज है, भारतीय अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसे भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ माना जाता है। क्योंकि इसमें होने वाला विकास लगातार और समावेशी होता है।
  • MSME में 6.3 करोड़ यूनिट्स शामिल हैं, जिसमें 110 मिलियन से अधिक लोगों को रोजगार प्राप्त होता है। इस सेक्टर द्वारा 6000 से अधिक उत्पादों का उत्पादन किया जाता है, जिसका GDP में योगदान 29 फीसदी है यह भारत के निर्यात में 48 प्रतिशत का योगदान देता है।

एमएसएमई (MSME) की विशेषताएँ-

  1. बड़े पैमाने पर रोजगार का सृजन- भारत में प्रति साल 1.2 मिलियन युवा ग्रेजुएट होते हैं, जिन्हें यह क्षेत्र रोजगार दे सकता है।
  2. निर्यात एवं विकास अधिक सहायक एवं गतिशील।
  3. कम पूंजी में प्रारंभ और ग्रामीण-शहरी अंतराल में कमी।
  4. व्यवसाय के लिए सरल प्रबंधन संरचना।
  5. मेक इन इण्डिया एवं आत्मनिर्भर भारत अभियान में सहायक।
  • MSME क्षेत्र के महत्व को देखते हुए वर्ष 2019 में भारत सरकार द्वारा यह अनुमान लगाया गया कि अगले 5 साल (वर्ष 2019 तक) में यह क्षेत्र भारत की आधी GDP और लगभग 50 मिलियन नए रोजगार का सृजन कर पायेगा। 
  • MSME विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में हो सकती हैं, जिनका वर्गीकरण पहले अलग-अलग किया गया था। निवेश के आधार पर विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में इन्हें वर्गीकृत किया जाता था। सरकार ने मई 2020 में इसमें व्यापक बदलाव करते हुए विनिर्माण और सेवा क्षेत्र के अंतर को समाप्त कर दिया है। और वर्गीकरण का आधार निवेश और टर्न ओवर को बनाया गया है।
  1. सूक्ष्म उद्योग (Micro Industries)- इसमें ऐसे उद्योगों को शामिल किया जाएगा जिनका सम्मिलित निवेश 1 करोड़ से कम तथा टर्न ओवर 5 करोड़ से कम होगा।
  2. लघु उद्योग (Small Industries)- इसमें ऐसे उद्योगों को शामिल किया जायेगा जिनका सम्मिलित निवेश 10 करोड़ से कम तथा टर्न ओवर 50 करोड़ से कम होगा।
  3. मध्यम उद्योग (Medium Industries)- इसमें ऐसे उद्योगों को शामिल किया जायेगा जिसमें 20 करोड़ से कम तथा टर्न ओवर 100 करोड़ से कम होगा। 
  • भारत के MSME सेक्टर में भले ही कई संभावनायें है लेकिन यह सेक्टर अभी कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। जो निम्नलिखित है।
  • वित्तीय चुनौतियाँ- भारत का MSME सेक्टर ऋण आपूर्ति की कमी का सामना कर रहा है। इस क्षेत्र के विकास के लिए लगभग 36 ट्रिलियन रुपये की आवश्यकता है जबकि बाजार में औपचारिक ऋण की उपलब्धता मात्र 16 ट्रिलियन रुपये का है और 20 ट्रिलियन रुपये की कमी है, जो इसके विकास में बहुत बड़ी रूकावट है।
  • यहाँ यह भी ध्यान देना होगा कि बैंकिंग पहुँच कम होने के कारण भारत को MSMEs को अधिकांशतः वित्त NBFCs एवं सूक्ष्म वित्तीय संस्थानों (MFIs) से प्राप्त हो पाता है। इन क्षेत्रें में तरलता कम होने के कारण MSME को वित्तीय कठिनाई का सामना करना पड़ता है। 
  • MSME के औपचारीकरण की कमी- इस क्षेत्र के विकास एवं वित्तीय पहुँच में एक प्रमुख कारणइनका अनौपचारिक होना है या औपचारीकरण की कमी है। कुछ MSME के मात्र 14 प्रतिशत का पंजीकरण किया गया है।
  • कुल 6.3 करोड़ MSMEs में से 1.1 करोड़ ही GST व्यवस्था से जुड़े हैं। इनमें से आयकर दाखिल करने वालों की संख्यातो और भी कम है।
  • औपचारीकरण की कमी के कारण इन्हें अपना व्यापार बढ़ाने, ऋण की जरूरत को पूरा करने, सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने में कठिनाई महसूस होती है।
  • भारत का MSME क्षेत्र बड़े पैमाने पर पुरानी तथा अप्रचालित तकनीकी का प्रयोग करता है, जिससे उत्पादन कम होता है, लागत ज्यादा आती है। फलस्वरूप लाभ कम हो जाता है और MSMEs का विकास नहीं हो पाता है।
  • आर्टिफिशियल इंटेलीजेंसी, रोबोटिक्स, डेटा एनालिटिक्स, स्किल्ड लेबर का कम प्रयोग इस क्षेत्र के पीछडेपन का एक अन्य रूप हैं।
  • MSME के अधिकांश यूनिट सूक्ष्म (Micro) उद्योग की श्रेणी में आते हैं, जो घर के स्तर पर संचालित की जाती हैं इसके कारण इनके उत्पादन और व्यापार को बढ़ाना एक चुनौतीपूर्ण कार्य हो जाता है।
  • MSME के संचालन के लिए बहुत सी सरकारी अनुमतियों एवं सेवाओं की आवश्यकता होती है, जिसके कारण MSME स्थापित करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य बन जाता हैं स्थापित करने के बाद करों का भुगतान, अनुबंधों को लागू करना भी कठिन होता है। 

MSME के विकास के लिए आवश्यकता क्या करने की है?

  1. एक स्वतंत्र नियामकीय व्यवस्था की स्थापना जो स्थापना से लेकर कर भुगतान और अनुबंधों को लागू करने की प्रक्रिया में सहायक की भूमिका निभा सके।
  2. ऐसे श्रम कानूनों में सुधार करना, जिससे MSME का संचालन कठिन हो जाता है।
  3. वित्त प्राप्ति को सुगम एवं पारदर्शी बनाना और MSME के बॉण्ड बाजार को बढ़ावा देना
  4. सरकार के स्किल डेवलपमेंट प्रोग्रम को MSME प्रोग्राम के साथ जमीनी स्तर पर समायोजित करना।

MSME के विकास के लिए उठाए गये कदम-

  • सरकार ने MSMEs को वित्त की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए तीन लाख करोड़ रुपये का कोलेट्रल फ्री लोन देने की घोषणा की है। कोलेट्रल फ्री लोन का मतलब यह है कि अब बैंक उद्यमियों को अपने कारोबार के लिए कर्ज देते समय बदले में उनकी कोई दूसरी अचल संपत्ति गिरवी नहीं रखेंगे। सरकार अब इनके लोन की गारंटी लेगी ।इस तरह की लोन की अवधि चार साल की होगी। उद्यमियों को एक वर्ष तक मूलधन को चुकाने की जरूरत नही होगी। एमएसएमई सेक्टर को बैंकों ने करीब 15 लाख करोड़ का कर्ज पहले ही दे रखा है। यह लोन 4 साल के लिए होगा। यह राहत 20 लाख करोड़ रुपये के राहत पैकेज का हिस्सा है।
  • सरकार ने इन MSME के लिए फंड ऑफ फंड की भी घोषणा की। इस फंड ऑफ फंड का आकार 10000 करोड़ रुपये होगा। जो एमएसएमई विस्तार करना चाहते हैं उन्हें इस फंड ऑफ फंड से मदद मिलेगी।
  • MSME के व्यापार को बढ़ावा देने के लिए सभी एमएसएमई को 45 दिन में सभी बकाए का भुगतान सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम करेंगे। दरअसल, सरकार घरेलू उद्योगों बढ़ावा देने के लिए इन छोटे उद्योगों से सरकारी दफ्तरों की जरूरतों को पूरा करने के लिए काफी सामान खरीदती है। इसके अलावा सरकारी कंपनियों को भी इनके उत्पाद खरीदना अनिवार्य किया गया है.
  • सरकारी कंपनियाँ घरेलू MSME के साथ व्यापार करें इसके लिए यह नियम बनाया गया है कि सरकारी खरीद के लिए 200 करोड़ रुपये से कम के लिए ग्लोबल टेंडर नहीं होगा। इससे घरेलू एमएसएमई को टेंडर में भाग लेने का मौका मिलेगा। सभी एमएसएमई के लिए ई-मार्केट लिंकेज शुरू होगा। उन्हें प्रदर्शनी में शामिल होने के उपाय किए जाएंगे।
  • सरकार ने इन उद्योगों की परिभाषा भी बदली है। इससे उद्यमों को अपना आकार बढ़ाने में मदद मिलेगी।