(Video) Daily Current Affairs for UPSC, IAS, UPPSC/UPPCS, BPSC, MPSC, RPSC & All State PSC/PCS Exams - 22 October 2020


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न्यू स्टार्ट संधि चर्चा में क्यों है?

  • द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान USA, ब्रिटेन, रूस ने एक साथ मिलकर धूरी राष्ट्रों- जर्मनी, इटली और जापान के खिलाफ युद्ध लड़ा और जीत हांसिल की।
  • युद्ध समाप्त होते ही अमेरिका और उसके समर्थित देशों एवं सोवियत संघ के बीच मतभेद उत्पन्न होने लगा, जो बहुत जल्द ही तनाव में तब्दील हो गया।
  • द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत रूस के बीच उत्पन्न हुए तनावपूर्ण स्थिति/माहौल को शीतयुद्ध के नाम से जाना जाता है।
  • इस दौरान दोनों पक्षों में आपसी टकराव आमने-आमने कभी नहीं हुई, पर दोनों गुट इस प्रकार का वातावरण बनाते रहे कि युद्ध का खतरा हमेशा सामने दिखाई देता था।
  • इस शीतयुद्ध के उत्पन्न होने के कई कारण थे।
  1. परस्पर विरोधी प्रचार
  2. लैंड-लीज समझौते का समापन
  3. फासीवादी ताकतों को अमेरिकी सहयोग
  4. बर्लिन विवाद
  5. सोवियत संघ द्वारा वीटो पावर का बार-बार प्रयोग किया जाना
  6. पूंजीवादी और साम्यवादी विचारधारा का प्रसार
  7. सोवियत संघ द्वारा याल्टा समझौते का पालन न किया जाना
  8. संकीर्ण राष्ट्रवाद पर आधारित संकीर्ण राष्ट्रीय हित
  9. ईरान में सोवियत हस्तक्षेप
  10. टर्की में सोवियत हस्तक्षेप
  11. सोवियत संघ और अमेरिका के वैचारिक मतभेद
  12. सोवियत संघ का एक शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में उभरना
  13. यूनान में साम्यवादी प्रसार
  14. द्वितीय मोर्चे सम्बन्धी विवाद
  15. तुष्टिकरण की नीति
  16. सोवियत संघ द्वारा बाल्कान समझौते की उपेक्षा
  17. अमेरिका का परमाणु कार्यक्रम
  • बर्लिन संकट सोवियत रूस द्वारा आणविक परीक्षण, सैनिक संगठनों को निर्माण, हिंद चीन की समस्या, कोरिया युद्ध, क्यूबा मिसाइल संकट आदि घटनाओं ने शीतयुद्ध की परिस्थिति और उससे उत्पन्न तनाव को बनाये रखा।
  • शीतयुद्ध के दौरान आतंक और भय में वृद्धि हुई तथा आणविक युद्ध की संभावना बढ़ने लगी, जिसके कारण परमाणु हथियारों के साथ-साथ अन्य परंपरागत हथयारों की मात्र तेजी से बढ़ायी जाने लगी।
  • इससे नाटो, सीटो, सेण्टो तथा वारसा पैक्ट जैसे सैनिक संगठनों का जन्म हुआ जिससे निशस्त्रीकरण के प्रयासों को गहरा धक्का लगा।
  • शस्त्रीकरण की होड़ ने हथियारों के विकास के लिए पैसे को पानी की तरह बहाने को प्रवृत्ति विकसित की जिससे आर्थिक विकास की प्रक्रिया अवरूद्ध हुई।
  • इसने संयुक्त राष्ट्र की भूमिका में कमी कर दी। अब अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं के मुद्दे संयुक्त राष्ट्र इन दोनों महाशक्तियों के निर्णय पर ही निर्भर रहने लगा।
  • दोनों महाशक्तियों द्वारा शक्ति की राजनीति में विश्वास रखने के कारण समस्याओं के प्रति उपेक्षापूर्ण रवैया अपनाती रहीं।
  • इससे शक्ति संतुलन के स्थान पर ‘आतक के संतुलन’ की स्थिति को जन्म मिला।
  • द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद उत्पन्न हुआ यह माहौल अनेक प्रकार की चुनौती और समस्या उत्पन्न कर रहा था इसलिए दोनों के ऊपर यह दबाव बना कि वह इस तनावपूर्ण स्थिति को कम करने का प्रयास करें। इसके लिए अनेक प्रयास किये गये, जिसमें एक महत्वपूर्ण प्रयास यह था कि हथियारों के भय और प्रसार को कम किया जाये।
  • इसी प्रयास के तहत दो संधियाँ की गई।
  1. मध्यम दूरी परमाणु शक्ति संधि (Intermediate-Range Nuclear Force Treaty- INF Treaty) एवं
  2. सामरिक शस्त्र न्यूंनीकरण संधि (Strategic Arms Reduction Treaty- START)

INF- Treaty

  • इस संधि पर हस्ताक्षर वर्ष 1987 में अमेरिका के राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन एवं उनके तत्कालीन सोवियत संघ समकक्ष मिसाइल गोर्बाचेव के द्वारा की गई।
  • इसमें यह प्रावधान किया गया कि मध्यम और छोटी दूरी की मारक क्षमता वाली मिसाइलों का निर्माण नहीं किया जायेगा। साथ ही यह संधि परमाणु हथियारों एवं गैर परमाणु मिसाइलों की लांचिग को रोकती है।
  • यह संधि अमेरिका तथा रूस की 500 से 5500 किमी- दूर तक मार करने वाली जमीन से छोड़ी जाने वाली क्रूज मिसाइल के निर्माण को प्रतिबंधित करती है।
  • यह संधि अमेरिका, पश्चिमी एवं पूर्वी यूरोप तथा साम्यवादी देशों पर किसी प्रकार के हमले की संभावना को खत्म करने तथा उन्हें अपनी सुरक्षा के लिए हथियार विकसित करने की मानसिकता से बाहर निकालने के लिए महत्वपूर्ण थी।
  • इस संधि के तहत वर्ष 1991 तक लगभग 2700 मिसाइलों को नष्ट कर दिया गया।
  • इस संधि के तहत यह भी प्रावधान था कि दोनों देश एक दूसरे के मिसाइलों के परीक्षण और तैनाती पर नजर रखत सकते हैं ।
  • इस संधि के माध्यम से यूरोप में रूसी SS-20 (इसे रूस में RSD- 10 के नाम से जाना जाता है) और अमेरिका के M26 पर्शिंग टैंकों की तैनाती पर रोक लगाई गई थी।
  • अमेरिका ने रूस पर इस संधि का उल्लंघन करने का आरोप लगाया तथा SS-20 की यूरोप में तैनाती पर अपनी चिंता व्यक्त की । नाटो ने भी अमेरिका का समर्थन किया और कहा कि रूस इस संधि का उल्लंघन करता है। इसकी (SS-20) की रेंज 500 से 5500 किमी- है।
  • इस संधि के तहत संधि से हटने के लिए 6 माह पूर्व सूचना देना अनिवार्य है, इसलिए अमेरिका ने फरवरी 2019 में रूस पर आरोप लगाते हुए इससे बाहर निकलने की सूचना दी तथा 2 अगस्त 2019 को इससे बाहर आ गया।
  • अमेरिका के इस फैसले पर वैश्विक समुदाय ने अपनी चिंता प्रकट की थी क्योंकि इस फैसले से परमाणु हथियारों और बैलीस्टिक मिसाइलों की वैश्विक होड़ बढ़ेगी और परमाणु निशस्त्रीकरण का लक्ष्य प्राप्त नहीं होगा।

START- Strategic Arms Reduction Treaty

  • यह अमेरिका और रूस के बीच सामरीक हथियारों में कमी लाने एवं उन्हें सीमित करने से जुड़ी हुई संधि है।
  • इस संधि पर हस्ताक्षर 1991 में हुए थे। यह संधि दोनों पक्षों के लिए रणनीतिक परमाणु वितरण की संख्या को 1600 और वारहडे्स की संख्या को 6000 तक सीमित करती है।
  • इसी से मिलती-जुलती एक संधि- सामरिक आक्रामक कटौती संधि (Strategic Offensive Reductions Treaty- SORT) वर्ष 2002 में की गई।
  • इन दोनों संधियों को समाप्त करते हुए 5 फरवरी 2021 को नई सामरिक शस्त्र न्यूनीकरण संधि (न्यू स्टार्ट संधि) को लागू किया गया।
  • यह नई संधि 700 रणनीति लॉचर और 1500 ऑपरेशनल वारहेडस की मात्र को दोनों पक्षों के लिए सीमित कर रूस और अमेरिकी परमाणु शस्त्रागार को कम करने की द्विपक्षीय प्रक्रिया को प्रारंभ किया ।
  • यह संधि फरवरी 2021 में समाप्त हो रही है। इसी को देखते हुए रूस के राष्ट्रपति ने इस संधि को एक वर्ष का विस्तार देने का प्रस्ताव अमेरिका को दिया है।
  • रूस ने यह प्रस्ताव अमेरिका के निष्क्रिय व्यवहार के कारण उत्पन्न चिंता की वजह से रखा है।
  • अमेरिका यह चाहता है कि इसे आगे की किसी भी परमाणु अप्रसार और हथियार कटौती संधि में चीन को शामिल किया जाये।
  • चीन इस प्रकार के किसी भी समझौते का हिस्सा नहीं बनना चाहता है।
  • अमेरिका का एक विचार यह भी है कि अब किसी भी संधि में रूस के न सिर्फ स्ट्रेटजिक हथियारों (जिन्हें न्यू स्टार्ट संधि में शामिल किया गया था) को शामिल किया जाये बल्कि रूस के छोटे टैक्निकल परमाणु हथियारों को भी शामिल किया जाना चाहिए। रूस ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया है।
  • अमेरिका ने इस के प्रस्ताव पर बात चीत की सहमति व्यक्त की है।
  • समीक्षाकों का मानना है कि यदि इस संधि को विस्तारित या प्रतिस्थापित नहीं किया गया तो फिर से शीतयुद्ध जैसा तनाव उत्पन्न होगा, गुटबाजी होगी तथा हथियारों की बरोकटोक दौड़ प्रारंभ होगी जो वैश्विक शांति के लिए चिंताजनक होंगी।

सागरीय घास चर्चा में क्यों हैं?

  • वर्तमान समय में पूरे विश्व में लगभग 37 प्रतिशत जमीन ही कृषि भूमि है। इसका भी लगभग एक तिहाई से थोड़ा अधिक ही भाग खाद्य फसलें उगाने में प्रयोग किया जाता है।
  • बढ़ती जनसंख्या की वजह से कृषि योग्य भूमि कम होगी और खाद्यान्नों की मांग बढ़ेगी। अनुमान है कि अगले 25-30 साल में विश्व की जनसंख्या 9.7 अरब हो जायेगी।
  • खाद्यान्न सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अधिक उत्पादन की आवश्यकता होगी इसके लिए उत्तम किस्म के बीजों का उत्पादन करने, जैनेटिक इंजीनियरिंग द्वारा अधिक उत्पादन वाली किस्मों को बनाने तथा समुद्री संसाधनों (विशेषकर वनस्पति के अंतर्गत आने वाले) के उपयोग को बढ़ावा देने की बात की जाती है।
  • समुद्री वनस्पतियों में एक प्रमुख विकल्प शैवालों को भोजन के रूप में करना बताया जाता है। इसमें खासतौर पर हरे, लाल और कत्थई रंग के शैवालों को खाया जा सकता है। यह शैवाल पोषक तत्वों से भरपूर और उच्च कैलोरी वाले होते हैं। दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देशों जैसे फिलीपींस, मलेशिया, वियतनाम, इंडोनेशिया, चीन, कोरिया, जापान और अटलांटिक सागर के तटवर्ती देशों में इन्हे खाया जाता है।
  • इन समुद्री शैवालों में प्रचुर मात्रा में विटामिन ए, सी और कई खनिज जैसे कैल्सियम, मैग्निशियम, जिंक, आयरन एवं अन्य तत्व होते हैं। इसके साथ इसमें प्रोटीन, आमेगा 3 और 6 फैटी एसिड होते हैं।
  • शैवालों का प्रयोग सिर्फ खाने तक सीमित नहीं है इसका प्रयोग पशुचारा के रूप में बड़ी मात्र में किया जाता है।
  • इसके अर्क (रस) का प्रयोग टूथपेस्ट बनाने, कॉस्मेटिक प्रोडक्ट बनाने, दवाई बनाने तथा पालतू जानवरों का खाना बनाने में किया जाता है।
  • इसके अलावा इसका प्रयोग देश एवं टेक्सटाइल बनाने एवं प्लास्टिक के विकल्प के तौर पर किया जाता है।
  • वर्ष 2005 से 2015 के बीच इसका उत्पादन और प्रयोग लगभग दो गुना हो गया है। अब हर साल सालाना 30 मिलियन टन शैवाल का उत्पादन किया जाता है।
  • दुनियाभर में इसका व्यापार 6 अरब डॉलर से अधिक का है।
  • समुद्री घासों में नाइट्रोजन एवं फारस्फोरस जैसे पोषक तत्वों की भरमार होती है, इसीकारण यह फाइटोप्लैंकटन के लिए पोषक तत्व का कार्य करते है। इसमें मिलने वाले पोषक तत्व उर्वरक का महत्वपूर्ण भाग हैं इसलिए यह रेतीली मृदा के लिए उर्वरक का कार्य करते है।
  • यह प्रकाश संश्लेषण के लिए कार्बनडाईऑक्साइड का उपयोग करती है करती हैं, इसलिए ग्लोबल वार्मिंग एवं जलवायु परिवर्तन को रोकने में इनकी भूमिका महत्वपूर्ण होती है। एक अनुमान के अनुसार उष्णकटिबंधीय वनों की तुलना में समुद्री घास वातावरण से 35 गुना अधिक तेजी से कार्बन का प्रथक्करण कर सकती है।
  • बहुत से लुप्तप्राय समुद्री जीव जैसे डुगोंग, ग्रीन टर्टल आदि प्रत्यक्षतः भोजन के लिए समुद्री घास पर निर्भर रहते हैं। साथ ही कुछ जीव इन घासों में निवास करने वाले जीवों पर निर्भर रहते हैं।
  • यह घास के मैदान शैवाल की विस्तृत पट्टियाँ तेज सागरीय धाराओं से न सिर्फ समुद्री जीवों को बचाती है बल्कि तटों को भी सुरक्षित रखते है।
  • प्रवाल भित्तियाँ जहां दुनिया की सर्वाधिक जैविविधता पाई जाती है उनके विकास और अस्तित्व के लिए इन शैवालों का महत्व बहुत ज्यादा है क्योंकि यह प्रवाल अपने भोजन के लिए इन शैवालों पर ही निर्भर रहते हैं।
  • यह शैवालों तटों एवं समुदों को प्रदूषण मुक्त करने में भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। दरअसल यह तलछटों और निलंबित कणों को न सिर्फ अलग करते है बल्कि घास एवं उसमें रहने वाले सूक्ष्म जीव अपघटन की क्रिया के माध्यम से प्रदूषित जल को फिल्टर करते है।
  • इन शैवालों का प्रयोग बड़े पैमाने पर ऊर्जा उत्पादन, ईंधन एवं बायोमास के लिए किया जा सकता है।
  • हाल ही में सोसायटी फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (SCON), त्रिची (तमिलनाडु) के अध्यक्ष द्वारा समुद्री घास के महत्व को उजागर किया गया हैं इसके बाद से समुद्री घासों के महत्व एवं प्रयोग पर चर्चा तेज हो गई है।
  • SCON एक गैर लाभकारी एवं गैर सरकारी संगठन है।
  • समुद्री घास सूक्ष्म आकार के जलीय पादप/पौधे हैं जो उथले सागरीय क्षेत्रें, तटों, जलमग्न खाड़ियों, लैगूनों, डेल्टा समीपवर्ती क्षेत्रें द्विपीय भागों में मुख्यतः विकसित होते हैं।
  • उष्णकटिबंधीय एवं समशीतोषण घास के सागरीय क्षेत्रें में इनका विस्तार अधिक पाया जाता है।
  • सारगेसो घास का मैदान समुद्री घास का सबसे अच्छा उदाहरण है।
  • कई संस्थाओं एवं लोगों का मानना है कि भारत को भी अपने समुद्री क्षेत्र में पाये जाने वाले इन समुद्री घासों के वाणिज्यिक एवं खाद्य उपयोगिता को बढ़ाना चाहिए।
  • भारत की तटरेखा लगभग 7500 किमी- लंबी है यहां लगभग 840 घास की प्रजातियाँ पाई जाती हैं। जिनमें से कई का वाणिज्यिक प्रयोग किया जा सकता है।
  • एक रिपोर्ट के अनुसार की खाड़ी में पाई जाने वाली 306 प्रजातियों में से 252 खाने योग्य है।
  • यह समुद्री घास समुद्री जल के अम्लीकरण को कम करते हैं। यह समुद्री अम्लीयता समुद्री जीवों के लिए घातक मानी जाती है।
  • लगभग 90 प्रतिशत मत्स्य पालन तटीय पारिस्थितिकी में होता है जो समुद्र की बढ़ती अम्लीयता से प्रभावित हो सकते है। मछलियों के अलावा अन्य समुद्री जीवों पर भी अम्लीयता नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।