(Video) Daily Current Affairs for UPSC, IAS, UPPSC/UPPCS, BPSC, MPSC, RPSC & All State PSC/PCS Exams - 20 August 2020


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मध्य प्रदेश में जन्मस्थान के आधार पर आरक्षण

  • प्रत्येक देश अपने यहाँ के लोगों के बीच समानता लाने का प्रयास करता है। समानता से तात्पर्य असमानता में कमी से है। यहां यह ध्यान रखना आवश्क है कि समानता का आशय सबकी आय समान होना नहीं है।
  • समानता तभी आ सकती है जब प्रत्येक व्यक्ति शिक्षित हो, क्षमतानुसार उसके पास रोजगार हो, समाज में उसकी कद्र हो, वह अपनी बात कहने और अपने अधिकार का उपभोग करने में सक्षम हो। कुलमिलाकर हर व्यक्ति का सर्वोत्तम विकास होना ही समानता की पहचान है।
  • इस समानता को सिर्फ व्यक्ति द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता है क्योंकि व्यक्ति कई प्रकार के अभावों और सीमाओं से बंधा होता है इसलिए सरकारों पर भी यह जिम्मेदारी होती है कि वह समानता प्रदान करने में सहयोग दे।
  • हमारे संविधान निर्माताओं ने भी समानता के महत्व को समझते हुए इसे मूल अधिकार के अंतर्गत रखा जिससे यह राज्यों के लिए बाध्यकारी सिद्ध हो सकें और इन्हें किसी सरकार द्वारा व्यक्ति से छीना न जा सके।
  • संविधान के भाग तीन में अनुच्छेद-14 में कहा गया है कि राज्य भारत के राज्य क्षेत्र में किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता से या विधियों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा।
  • अनुच्छेद-15 राज्य किसी नागरिक के प्रति केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान को लेकर विभेद नहीं करेगा।
  • अनुच्छेद-15 के तीन अपवाद है।
  1. राज्य को यह अनुमति है कि वह बच्चों एवं महिलाओं के लिए विशेष व्यवस्था करें।
  2. राज्य को इसकी अनुमति होती है कि वह सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछडे वर्गों या अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए विशेष उपबंध करें।
  3. राज्य सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े लोगों या अनुसूचित जाति या जनजाति के लोगों के उत्थान के लिए शैक्षणिक संस्थाओं में प्रवेश के लिए कोई नियम बना सकता है।
  • अनुच्छेद-16 राज्य के अधीन किसी पद पर नियोजन या नियुक्ति से संबंधित विषयों में सभी नागरिकों के लिए अवसर की क्षमता होगी।
  • इस नियम के भी सामान्यतः तीन अपवाद हैं- जिसमें दो का संबंध इस टॉपिक से है।
  1. संसद किसी विशेष रोजगार के लिए निवास की शर्त आरोपित कर सकती है।
  2. राज्य नियुक्ति में आरक्षण की व्यवस्था कर सकता है या किसी पद को पिछड़े वर्ग के पक्ष में बना सकता है जिनका की राज्य में समान प्रतिनिधित्व नहीं है।
  • सरकारी सेवाओं व संस्थानों में पर्याप्त भागीदारी नहीं रखने वाले SC/ST/OBC एवं EWS को कानून के सरकारी नौकरियों में वरीयता देना आरक्षण है।
  • मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री विशवराज सिंह चौहान ने कहा कि राज्य में सरकारी नौकरियाँ ‘‘मध्य प्रदेश के बच्चों’’ को ही मिलेंगी। उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश के संसाधन मध्य प्रदेश के बच्चों के है और वह इसके लिए आवश्यक कानूनी प्रावधान कर रहे है।
  • मध्य प्रदेश में पिछले साल जुलाई माह में उस समय के तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलनाथ ने कहा था कि 70 प्रतिशत फीसदी नौकरियाँ मध्य प्रदेश के युवाओं के लिए आरक्षित की जायेंगी।
  • वर्तमान समय में सामाजिक एवं शैक्षणिक पिछडेपन को आधार बनाते हुए 49.5 प्रतिशत आरक्षण विभिन्न जातियों को दिया गया है। इसमें जातिगत समीकरण को एक आधार माना जाता है। OBC के अंतर्गत आने वाली जातियों को 27 प्रतिशत आरक्षण, एससी को 15 प्रतिशत आरक्षण, एसटी को 7.5 प्रतिशत आरक्षण दिया गया है।
  • लंबे समय से आर्थिक आधार पर भी पिछडेपन के आधार पर सामान्य वर्ग के लिए आरक्षण की मांग की जा रही थी। इसी के तहत EWS को भी 10 प्रतिशत आरक्षण दिया गया है। इस तरह 59.5 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था संसद द्वारा की गई है।
  • समय-समय अनेक समूहों द्वारा उन्हें विशेष प्रतिनिधित्व (आरक्षण) की मांग की जाती रही है तो साथ ही राजनीतिक दलों के द्वारा भी वोट बैंक की राजनीति के तौर पर इसका उपयोग किया जाता है।
  • कई प्रदेश सरकारों ने यह घोषण समय-समय पर किया है कि वह अपने निवासियों को आरक्षण देंगे जैसा कि अभी मध्य प्रदेश की सरकार ने कहा है।
  • मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा की गई घोषण से कई प्रकार के विवाद उभरकर सामने आयेंगे क्योंकि जन्मस्थान (मूल निवास) के आधार पर आरक्षण एक संवेदनशील मामला है।
  • सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में स्पष्ट किया है कि शैक्षणिक संस्थाओं में मूल निवासियों को आरक्षण देने को संवैधानिक माना है लेकिन यह बात सार्वजनिक नौकरियों के संदर्भ में संवैधानिक नहीं है क्योंकि यह भेदभाव के खिलाफ नागरिकों के अधिकार की संवैधानिक गारंटी का उल्लंघन होगा।
  • डीपी जोशी बनाम मध्य भारत मामले (1955) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा- अधिवास या निवास स्थान एक प्रवाही अवधारणा है अर्थात यह परिवर्तित हो सकती है वहीं जन्म स्थान निश्चित होता है।
  • जन्म स्थान उन आधारों में से एक है जिसके आधार पर अधिवास का दर्जा दिया जाता है।
  • एक परिवार अपने बच्चों को लेकर दूसरे राज्य में प्रवास कर स्थायी निवासी बन सकता है लेकिन उनके बच्चे को जन्म स्थान के आरक्षण का फायदा नहीं मिलेगा यदि उस राज्य में जन्मस्थान के आधार पर आरक्षण का नियम है ।। कुल मिलाकर यहाँ पर अधिवास एवं जन्म स्थान को लेकर विवाद उत्पन्न हो सकता है।
  • यदि सभी राज्य जन्म स्थान/निवास के आधार पर आरक्षण देने लगे तो एकता और अखंडता की भावना कमजोर होगी तथा क्षेत्रीय की भावना मजबूत होगी।
  • अनुच्छेद-16 के आधार पर इसके पक्ष और विपक्ष के तर्क।
  • अनुच्छेद-16 सरकारी नौकरियों में अवसर की समता को संदर्भित करता है।
  • राज्य के अधीन किसी भी पद पर नियोजन या नियुक्ति संबंधित विषयों में सभी नागरिकों के लिए अवसर की समानता होगी।
  • 16 (2) राज्य के अधीन किसी नियोजन या पद के संबंध में केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, उद्भव, जन्मस्थान, निवास या इनमें से किसी के आधार पर न तो कोई नागरिक अपात्र होगा और न उससे विभेद किया जाएगा।
  • 16 (3) इस अनुच्छेद की कोई बात संसद को कोई ऐसी विधि बनाने से निवारित नहीं करेगी जो किसी राज्य या संघ राज्य क्षेत्र की सरकार के या उसमें के किसी स्थानीय या अन्य प्राधिकारी के अधीन वाले किसी वर्ग या वर्गों के पद पर नियोजन या नियुक्ति के संबंध में ऐसे नियोजन या नियुक्ति से पहले उस राज्य या संघ राज्य क्षेत्र के भीतर निवास विषयक कोई अपेक्षा विहित करती है।
  • 16 (4) इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को पिछड़े हुए नागरिकों के किसी वर्ग के पक्ष में, जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है, नियुक्तियों या पदों के आरक्षण के लिए उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी।
  • 16 (4क) इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के पक्ष में, जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है, राज्य के अधीन सेवाओं में किसी वर्ग या वर्गों के पदों पर अनुवर्ती (Consequential) वरिष्ठता सहित प्रोन्नति के मामलों में आरक्षण के लिए उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी।
  • उपरोक्त प्रावधानों में स्पष्टता का अभाव होने के कारण राज्य सरकारें मूल निवास या जन्म स्थान के आधार पर आरक्षण का प्रावधान करती है।
  • डीपी जोशी बनाम मध्य भारत मामले (1955) में ही सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर िदया था जन्म स्थान के आधार पर नौकरियों में आरक्षण नहीं दिया जा सकता है।
  • कैलाश चंद्र शर्मा बनाम राजस्थान राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया कि ‘निवास’ चाहे राज्य, जिले या किसी अन्य क्षेत्र में हो, अधिमान्य आरक्षण या उपचार का आधार नहीं हो सकता है।
  • वर्ष 2019 में उत्तर-प्रदेश के उच्च न्यायालय ने अधीनस्थ सेवा चयन आयोग द्वारा जारी एक भर्ती अधिसूचना पर रोक लगा दी थी जिसमें ‘मूल निवासी’ महिलाओं को वरीयता दिया जाना था।
  • इन उदाहरणों से यह स्पष्ट हो गया है कि सुप्रीम कोर्ट या हाइकोर्ट इस मामले में कठोर रहे हैं।
  • वर्तमान समय में कई राज्यों द्वारा निवास एवं उससे जुडे पहचान को आधार बनाकर निवासियों को प्राथमिकता दी जाती है।
  • महाराष्ट्र में सरकारी नौकरियों में मराठी भाषा में पारंगत स्थानीय निवासियों को वरीयता दी जाती है।
  • गुजरात राज्य के श्रम और रोजगार विभाग का 1995 का सरकारी प्रस्ताव कहता है कि राज्य सरकार के किसी उपक्रम उद्योग में कर्मचारियों, कारीगरों के चयन में कम से कम 85 प्रतिशत पद पर स्थानीय निवासी होंगे।
  • अनुच्छेद 370 में परिवर्तन होने से पूर्व जम्मू-कश्मीर की सरकारी नौकरियों में भी स्थानीय निवासियों को आरक्षण दिया गया था।
  • गृह मंत्रलय की तरफ से असम के लिए नियुक्त कमेटी ने असम समझौता की धारा-6 के तहत असम के लोगों के लिए 80 से 100 फीसदी आरक्षण की सिफारिश की गई है हालांकि अभी यह लागू नहीं किया गया है।
  • मेघालय में राज्य सरकार की नौकरियों में गारो, खासी, जयंतियाँ जनजातियों को मिलाकर 80 प्रतिश आरक्षण दिया जाता है।
  • अरुणाचल प्रदेश में यहां की जनजातियों को 80 प्रतिशत आरक्षण दिया जाता है।
  • कर्नाटक में जाति आधारित आरक्षण व्यवस्था को इस तरह बनाया गया है कि राज्य सरकार की नौकरियों में लगभग 95 प्रतिशत लोग स्थानीय हैं।
  • छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले के लिए तीसरी और चौथी श्रेणी की सरकारी नौकरियों के लिए इस जिले के लोगों को 100 प्रतिशत आरक्षण दिया जाता है।
  • पश्चिम बंगाल में कुछ पदों के लिए बांग्ला लिखना और पढ़ना अनिवार्य है।
  • झारखण्ड में स्थानीय लोगों के लिए 100 प्रतिशत आरक्षण का प्रयास किया जा रहा है। यहाँ के 13 जिले अधिसूचित क्षेत्र के अंतर्गत आते है। राज्य सरकार ने पिछले दिनों शिक्षक नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू की इन 13 जिलों में 100 फिीसदी आरक्षण का प्रावधान किया लेकिन कोर्ट ने माना कि 100 फीसदी आरक्षण ठीक नहीं हैं और कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी।
  • आंध्र प्रदेश ने आंध्र प्रदेश एंप्लायमेंट ऑफ लोकल केंडिडेट इन इंडस्ट्रीज/फैक्ट्रीज एक्ट 2019 के माध्यम से राज्य के लोगों को 75 प्रतिशत आरक्षण की बात कहा जिसे संबंधित हाइकोर्ट ने सही नहीं माना।