(Video) Daily Current Affairs for UPSC, IAS, State PCS, SSC, Bank, SBI, Railway, & All Competitive Exams - 19 July 2020


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GI टैग चर्चा में क्यों है?

  • विश्व में हर देश अपनी कुछ विशिष्टता रखता है। यह विशिष्टता भौगोलिक हो सकती है, सामाजिक हो सकती है, व्यापारिक हो सकती है।
  • हर क्षेत्र में प्राकृतिक रूप से या मानवीय प्रयासों से ऐसे अनेक वस्तुओं का उत्पादन होता है जो उस क्षेत्र की पहचान का हिस्सा बन जाती है।
  • क्षेत्र विशेष के उत्पाद इतने अलग पहचान रखने वाले होते है कि उत्पाद से वह क्षेत्र अपना एक अलग महत्व विकसित कर लेता है।
  • हम चाय का जब भी टीवी पर कोई प्रचार देखते है तो उसमें दार्जिलिंग का नाम आता है। ऐसा क्यों होता है? क्योंकि यहां की चाय एक विशिष्ट स्वाद रखती है जिसका उत्पादन उसी क्षेत्र विशेष में होता है।
  • बनारसी साड़ी, तिरूपति के लड्डू, महाबलेश्वर स्ट्रॉबेरी आदि ऐसे ही कुछ विशिष्ट उत्पाद हैं ।
  • क्षेत्र विशेष में उत्पादित होने वाले उत्पादों की अलग वैश्विक पहचान एवं महत्व को बनाये रखने के लिए भौगोलिक संकेतक (Geographical Indication) अर्थात GI टैग प्रदान किया जाता है।
  • GI टैग ऐसे प्राकृतिक, कृषि उत्पाद या निर्मित उत्पाद को प्रदान किया जाता है जिनकी गुणवत्ता एवं विशेषता अद्वितीय होती है।
  • यदि किसी उत्पाद को GI टैग प्राप्त है तो इसका अर्थ है वह विशिष्ट है , अलग है और कोई दूसरा उत्पाद उस तरह का नहीं है। इसी आधार पर GI टैग उसे वैश्विक पहचान प्रदान करता है।
  • अंतर्राष्ट्रीय समुदाय इसके लिए WTO (विश्व व्यापार संगठन) के बौद्धिक संपदा अधिकारों के व्यापार संबंधी पहलू (Trade Related Aspects of Intellectual Property Rights - TRIPS) के तहत GI टैग प्रदान करते है तथा एक दूसरे के GI टैग उत्पादों को महत्व प्रदान करते है।
  • इसी कारण किसी उत्पाद को एक ही स्थान/भौगोलिक क्षेत्र से GI टैग प्रदान किया जाता है।
  • GI टैग को अंतर्राष्ट्रीय बाजार में एक ट्रेडमार्क की तरह देखा जाता हैं
  • GI टैग बौद्धिक संपदा अधिकारों का हिस्सा हैं जो औद्योगिक संपदा के संरक्षण के लिए पेरिस अभिसमय के तहत आते है।
  • भारत में भौगोलिक संकेतक के पंजीकरण को माल के भौगोलिक संकेतक (पंजीकरण और संरक्षण) अधिनियम, 1999 [Geographical Indications of Goods (Registration and Protection) Act, 1999] द्वारा प्रदान किया जाता है तथा विनियमित किया जाता है।
  • 1 सितंबर, 2003 को यह अधिनियम प्रभावी हुआ।
  • विनियम की जिम्मेदारी भौगोलिक पंजीयक रजिस्ट्रार (Registrar of Geographical Indications) द्वारा किया जाता है जिसका मुख्यालय चेन्नई में स्थित है।
  • वर्ष 2004 में पहला GI टैग दार्जिलिंग चाय को प्राप्त हुआ था।
  • एक बार में GI टैग पंजीकरण 10 वर्ष के लिए मान्य होता है।
  • भारत में अब तक 350 से अधिक उत्पादों को GI टैग प्रदान किया जा चुका है।
  • भारत के सिंधु-गंगा मैदानी क्षेत्र में चावल की एक विशेष प्रजाति का उत्पादन बहुत लंबे समय से होता आया है जिसे बासमती के नाम से जाना जाता है। यह चावल भारत के सात राज्यों और पाकिस्तान के मात्र 18 जिलों को छोड़कर किसी दूसरे स्थान पर नहीं उपजाया जाता है।
  • पूरे विश्व में इस चावल की मांग इसके सुगंध एवं स्वाद के कारण यूरोप, अमेरिका महाद्वीप, खाड़ी क्षेत्र में यह बहुत है।
  • वर्ष 2010 में सिंधु गंगा मैदानी क्षेत्र में उत्पादित बासमती चावल को GI टैग प्रदान किया गया था।
  • इसके तहत जम्मू-कश्मीर, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड, दिल्ली एवं उत्तर प्रदेश (पश्चिमी यूपी के 26 जिले) के बासमती चावल को ही GI टैग दिया जा सकता है।
  • इन क्षेत्रें में उत्पादित चावल की पहचान प्राचीन लोककथाओं, पाक साहित्यों एवं ऐतिहासिक अभिलेखों से है।
  • भारत ने इस चावल के GI टैग के लिए 50 से अधिक देशों से 1000 से अधिक कानूनी कार्रवाई जीता है अर्थात इसके महत्व को संरक्षित रखा है।
  • इस चावल से मिलते जुलते चावल को कई देशों द्वारा GI टैग लगाकर बेचा जाता है जिसका भारत न सिर्फ विरोध करता है बल्कि जीत भी हासिल करता है।
  • मध्य प्रदेश के एक बड़े क्षेत्र में बासमती चावल का उत्पादन होता है। इसी कारण राज्य की मांग रही है कि यहां के बासमती चावल को भी GI टैग दिया जाये।
  • मध्य प्रदेश लगभग एक दशक से APEDA (Agricultural and Processed Food Products Export Development से कानूनी लड़ाई लड़ रहा है।
  • अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँच गया है जिसमें एक तरफ 7 राज्यों का समूह है जिसे GI टैग मिला है वहीं दूसरी तरफ मध्य प्रदेश सरकार है।
  • कुछ दिन पहले मुख्यमंत्री विशवराज सिंह चौहान ने केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर से भी मुलाकात कर इस मुद्दे को उठाया था।
  • मध्य प्रदेश का दावा है कि राज्य में उत्पादित बासमती चावल में Indo-Gangetic Plains (IGP) में उत्पादित चावल जैसे ही है।
  • मध्य प्रदेश सरकार के अनुसार राज्य के 13 जिलों में लगभग 80 हजार किसान बासमती चावल की खेती करते है और प्रतिवर्ष 3000 करोड़ रूपये के बासमती चावल का निर्यात किया जाता है।
  • मध्य प्रदेश इसकीकारण कई मंचों से यह बात उठाते रहा है कि उसे GI टैग प्रदान किया जाये।
  • सरकार का मानना है कि इससे लोगों की आय बढ़ेगी और चावल के उत्पादन में भी वृद्धि होगी।
  • प्रश्न यह है कि मध्य प्रदेश के चावल को GI टैग प्रदान करने में समस्या क्या है?
  • GI टैग प्रदान करने के लिए केवल भौतिक विशेषतओं का होना अनिवार्य नहीं है बल्कि इसका भौगोलिक प्रतिष्ठा से जुड़ा होना भी अनिवार्य है।
  • इसका ऐतिहासिक पक्ष/आधार कमजोर है क्योंकि यहाँ बासमती चावल के उत्पादन का प्रारंभ इस सदी के पहले दशक से माना जाता है जबकि IGP बासमती का पर्याप्त ऐतिहासिक आधार उसे विशिष्ट बना देते है।
  • यदि यहाँ के चावल को GI टैग दिया जाता है तो पहले से GI टैग धारित चावल की गुणवत्ता और अलग पहचान पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
  • मध्य प्रदेश को GI टैग देते ही पाकिस्तान भी पूरे देश में बासमती के उत्पादन को बढ़ाकर उन्हें GI टैग में शामिल करने की मांग करेगा।
  • 50 से अधिक देशों पर भारत ने जो कार्रवाई कर के इस टैग को सुरक्षित रखा है वह भी इसका दुरूपयोग करेंगे।
  • 7 राज्यों के लगभग 20 लाख किसान जो इस पर निर्भर है उनकी आय प्रभावित होगी।
  • हालांकि मध्य प्रदेश सरकार अपने तरफ से पूरा प्रयास कर रही है कि उसे यह टैग हासिल हो जाये लेकिन इस मुद्दे को राज्य हित तथा देश हित में समन्वय स्थापित करने वाले प्रयास के रूप में आगे बढ़ाना चाहिए।
  • उपरोक्त चुनौतियों को देखते हुए अखिल भारतीय निर्यातक संघ (All India Rice Exporters Association) ने केंद्र सरकार से बासमती चावल की महत्ता को संरक्षित एवं सुरक्षित करने की मांग की है।

काजीरंगा नेशनल पार्क चर्चा में क्यों है

  • काजीरंगा नेशनल पार्क भारत के असम राज्य के गोलाघाट और नगाँव जिले में स्थित है।
  • यह भारत के सर्वाधिक जैवविविधता वाले नेशनल पार्क में शामिल है।
  • 430 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैले इस पार्क की पहचान पूरी दूनिया में मुख्य रूझप से एक सींग वाले गैंदे के निवास स्थान के रूप में है।
  • यह राष्ट्रीय उद्यान उबड़-खाबड़ मैदान, दलदल से धिरा क्षेत्र है जहां पर नदियों के पानी द्वारा जलापूर्ति होने कारण घास एवं वन क्षेत्र का विकास हो पाया हैं वर्ष 1985 में इसे विश्व विरासत स्थल के रूप में घोषित किया गया है।
  • मार्च 2015 की जनगणना के अनुसार इस नेशनल पार्क में लगभग 2401 गैंडे थे।
  • गंडा के अलावा यहाँ हाथी, भारतीय भैंसा, हिरण, सांभर, भालू, बाघ, चीता, सुअर, जंगली बिल्ली, लंगूर, हुलॉक गिब्वन, भेडिया, साही जैसे जानवर एवं पेलीकन, वत्तख, हार्नबिल, आइबिस, काली गर्दन वाले स्टॉर्क आदि पक्षी की प्रजातियाँ पाई जाती है।
  • इस पार्क को भारतीय बाघों का धर कहा जाता है।
  • हाल के वर्षों में यह राष्ट्रीय उद्यान बाढ़ की समस्या का सामना कर रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार पहले इस तरह की भयानक बाढ़ 10 वर्ष में एक बार आती थी, जबकि अब प्रत्येक, 2 साल में भयानक बाढ़ आती है।
  • कई बार बाढ़ से इसका 60% से अधिक हिस्सा जलमग्न हो जाता है। जिससे सैकड़ों जानवरों की मृत्यु हो जाती है।
  • यहाँ से जानवर पहले कार्षी आंगलोंग पहाड़ियों पर चले किंतु अब राष्ट्रीय राजमार्ग 37 (NH-37) के कारण कई जानवर दुर्घटना ग्रस्त हो जाते है जिससे आवाजाही बाधित हुई है।
  • वर्तमान समय में असम फिर से बाढ़ की चपेट में है फ्रलस्वरूप इस राष्ट्रीय उद्यान का लगभग 85% हिस्सा जलमग्न हो गया है। जिससे कई जीवों की मृत्यु की खबर है।
  • यहाँ यह भी ध्यान देना आवश्यक है कि कई पारिस्थितिकी विशेषज्ञ बाढ़ को लाभदायक मानते है क्योंकि इससे पारिस्थितिकी में सुधार आता है लेकिन बाढ़ की तीव्रता ज्यादा होने पर यह घातक साबित होती है।
  • दरअसल यह एक नदी आधारित पारिस्थितिक तंत्र का उदाहरण है। जिसके लिए जल आवश्यक है।
  • बाढ़ द्वारा जल निकायों में पानी आता है, दलदल का विकास होता है, घास एवं अर्द्ध सदाबहार वनों का विकास होता है जिससे जलीय जीवों, मछालियों, जलकुंभी आदि की संख्या बढ़ती है।
  • यहां एक सींगी गेंदे का जो विकास हो पाया है उसके पीछे प्रमुख कारण यहां का दलदली और घास क्षेत्र ही है।
  • समय की मांग यह है कि यहां जलापूर्ति होती रहे लेकिन बाढ़ जैसी समस्या यहां विपदा का रूप धारण न कर ले।