(Video) Daily Current Affairs for UPSC, IAS, UPPSC/UPPCS, BPSC, MPSC, RPSC & All State PSC/PCS Exams - 19 December 2020


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राष्ट्रीय जल विज्ञान परियोजना

  • राष्ट्रीय जल विज्ञान परियोजना (NHP) की शुरूआत वर्ष 2016 में एक केंद्रीय योजना के रूप में की गई थी। इसमें 100 प्रतिशत धन केंद्र सरकार द्वारा खर्च किया जाना है।
  • इस परियोजना पर 8 साल में 3680 करोड़ रुपये खर्च किये जाने है। जिसमें विश्व बैंक भी सहायता प्रदान करता है। NHP को राष्ट्रीय महत्व की परियोजना घोषित किया गया है क्योंकि यह जल संसाधन के संबंध में एक नोडल परियोजना है।
  • इसका उद्देश्य-जल संसाधन के विषय में सूचना उपलब्ध करवाना, जल संसाधन प्रबंधन को प्रभावी बनाना, संबंधित सूचना उपलब्ध करवाना तथा सूचना की विश्वसनियता कायम करना है।
  • NHP के तहत जल संसाधन डेटा के लिए एक राष्ट्रव्यापी नेटवर्क-राष्ट्रीय जल सूचना विज्ञान केंद्र (NWIC) की स्थापना की गई है।
  • NHP के तहत पूरे इंडिया के संदर्भ में जल संसाधन से संबंधित रियल टाइम डेटा अधिग्रहण किया जा रहा है। इसके लिए अब तक 1900 स्टेशन स्थापित कर लिए गये हैं जो केंद्रीय डेटाबेस को डेटा उपलब्ध करवायेंगे।
  • NHP से उन सभी संस्थाओं/संगठनों/निगमों/हितधारकों को फायदा मिलेगा जिन्हें जल संरक्षण/उपलब्धता संबंधी आंकड़ों/विधियों की आवश्यकता होती है।

NHP के प्रमुख घटक-

  1. जलसंसाधन सूचना प्रणाली (WRIS)- राष्ट्रीय और उपराष्ट्रीय जलसूचना केंद्रों को मजबूत करना।
  2. जल संसाधन निगरानी प्रणाली (WRMS)- जल संसाधन के आकड़ों की समयबद्धता और विश्वसनियता में सुधार
  3. जल संसाधन संचालन और नियोजना प्रणाली (WROPS)- जल संसाधन के प्रबंधन, संचालन और नियाजन के संदर्भ में समन्वय करना।
  4. जल संसाधन संस्थान क्षमता संवर्द्धन (WRICE)
  • हाल ही में वर्ष 2016 से चल रही इस परियोजना की मध्यावधि समीक्षा की गई। मध्यावधि समीक्षा में यह सामने आया है कि NHP के सभी घटकों में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है।
  • समीक्षा में यह भी सामने आया है कि अब डेटा का संग्रहण NHP के जरिये बढ़ा है जिसके कारण भविष्य में बेहतर उपयोग और प्रबंधन हो सकेगा।

करेंसी मैनिपुलेशन का खेल

  • मुद्रा के संदर्भ में विनिमय दर का अर्थ दो अलग-अलग मुद्राओं की सापेक्षा कीमत है, अर्थात एक मुद्रा के सापेक्ष दूसरी का मूल्य।
  • उदाहरण- टिंकू (भारतीय) का 50 रु. = टोनी (अमेरिकी) के 1 डॉलर के बराबर
  • जिस प्रकार सामानों का आदान-प्रदान होता है उसी प्रकार मुद्राओं का भी आदान-प्रदान होता है। यह इसलिए किया जाता है ताकि आयात-निर्यात किया जा सके क्योंकि एक ही मुद्रा विश्व के सभी देशों में नहीं चलती हैं। मुद्राओं का आदान-प्रदान (विनिमय - Exchange) जिस बाजार में होता हैं उसे विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार कहते हैं।
  • उदाहरण- (1) टिंकू सुपर कंप्युटर खरीदना चाहता है जिसके लिए उसे डॉलर में भुगतान करना होगा। वह विदेशी मुद्रा बाजार में जायेगा और रुपया देकर डॉलर प्राप्त करेगा और सुपर कंप्यूटर का भुगतान कर देगा।
  • उदाहरण- (2) टोनी को कश्मीरी शॉल खरीदना है वह डॉलर का विनिमय रुपये से कर के भुगतान करेगा।
  • नोट- इसी तरह टिंकु और टोनी विश्व के किसी भी देश का सामान अपनी मुद्रा का विनिमय कर खरीद सकते हैं।

विनिमय दर के प्रकार- मुद्रा विनिमय के सामान्यः तीन प्रकार हमें देखने को मिलते हैं।

  • स्थिर विनिमय दर (Fixed Exchange Rate)- यह विनिमय की वह दर है जिसे सरकार (केंद्रीय बैंक) निर्धारित कर देती है। इसमें विनिमय दर हमेशा एक ही रहता है। इसे Pegged Exchange Rate भी कहते हैं।
  • उदाहरण- टिंकू 50 रुपया लेकर जायेगा और मुद्रा बाजार से 1 डॉलर लेकर आयेगा। टिंकू हमेशा 50 रुपया भुगतान कर के 1 डॉलर प्राप्त करता रहेगा।
  • इससे मुद्रा बाजार (विनिमय बाजार) में स्थिरता रहती है फलस्वरूप व्यापार और निवेश में स्थिरता रहती है।
  • इसका नुकसान यह है कि फिक्स की गई मुद्रा, बाजार की अपनी क्रय क्षमता को सही से प्रदर्शित नहीं करती है। फलस्वरूप बाहरी लोग (टोनी) विनिमय से बचते हैं।

टिंकू 50 रुपया = 1 डॉलर टोनी
1 किलोग्राम अमेरिकी संतरा = 1 किलोग्राम मसाला
कुछ समय बाद (1-2 साल)
50 रुपया = 1 डॉलर
1 डॉलर से टोनी 2 किलोग्राम मसाला इंडोनेशिया से खरीद सकता हैं क्योंकि डॉलर मजबूत हो गया है।
डॉलर मजबूत हो गया है इसलिए अमेरिका के संतरा उत्पादक टिंकू को संतरा न बेचकर ऐसे देश को बेचेंगे जहां वह 1 डॉलर से ज्यादा सामान खरीद सकें।
इस तरह फिक्सड रेट रहने पर व्यापार प्रभावित हो सकता है।

  • अस्थायी विनिमय दर (Floating Exchange Rate)- यह मुद्रा की वह विनिमय दर है जिसमें एक मुद्रा के मूल्य को स्वतंत्र रूप से निर्धारित होने की शक्ति होती है जिस प्रकार बाजार में अन्य सामानों का मूल्य मांग और आपूर्ति से निर्धारित होता है उसी तरह मुद्राओं की मांग और आपूर्ति से उसकी कीमत तय होती है।
  • उदाहरण- टिंकू को बहुत अधिक डॉलर की आवश्यकता है लेकिन बाजार में डॉलर पहले जितना ही है तो डॉलर की मांग ज्यादा होगी और मूल्य भी ज्यादा हो। क्योंकि टिंकू के साथ-साथ सोनू-मोनू आदि भी डॉलर प्राप्त करना चाहते है।

आज टिंकू का 50 रुपया = टोनी के 1 डॉलर के
कुछ समय बाद - 70 रुपया = 1 डॉलर
या
40 रुपया = 1 डॉलर

  • इस विनिमय दर में मुद्रा की वास्तविक क्रय शक्ति क्षमता का पता चलता है और व्यापार मांग और आपूर्ति के अनुसार प्रवाहित होता रहता है। इसका नुकसान यह है कि व्यापार ओर निवेश में अस्थिरता रहती है।
  • प्रबंधित विनिमय दर (Managed Exchange Rate)- यह विनिमय दर की वह प्रणाली है जिसमें सरकार द्वारा विनिमय दर को 1 से 3 प्रतिशत के उतार-चढ़ाव की अनुमति दी जाती है। प्रणाली में विनिमय दर न तो स्थिर होता है और न ही स्वतंत्र होता है। इस विनिमय के निर्धारण में IMF का पूरा दखल होता है।
  • वर्तमान समय में पूरे विश्व में Flaoating Exchange Rate और Fixed Exchange Rate के मिले जुले रूप को अपनाया जाता है।

मुद्रा के मूल्य में उतार-चढ़ाव-

  • मुद्रा के मूल्य में कमी आना- जब किसी देश की मुद्रा का मूल्य किसी दूसरे देश के मुद्रा के मूल्य के सापेक्ष कम होता है तो इसे मुद्रा के मूल्य में कमी आना कहा जाता है
  • मुद्रा के मूल्य में कमी जब मांग और आपूर्ति की वजह से (बाजार की वजह से) होती है तो इसे Depriciation कहते हैं।

50 रुपया = 1 डॉलर
डॉलर की मांग ज्यादा
60 रुपया =1 डॉलर

  • मुद्रा के मूल्य में कमी जब केंद्रीय बैंक या सरकार के द्वारा किया जाता है तो इसे Devaluation कहते हैं।

50 रुपया = 1 डॉलर
RBI ने घोषण किया कि अब 60 रुपया 1 डॉलर के बराबर होगा तो इसे Devaluation कहते हैं।

  • मुद्रा के मूल्य में मजबूती- जब किसी देश की मुद्रा मूल्य दूसरे देश की मुद्रा के सापेक्ष अधिक होता है तो वह मुद्रा मजबूत होती है।

पहले - 50 रुपया = 1 डॉलर
अब - 30 रुपया = 1 डॉलर
यहाँ रुपये की क्रय शक्ति क्षमता बढ़ी है।

  • जब मुद्रा के मूल्य में मजबूती बाजार के कारकों के आधार पर होती है तो इसे Appreciation कहते हैं वहीं जब यह सरकार द्वारा किया जाता है तो इसे Revaluation कहते हैं।
  • भारत की आजादी के समय 1 रुपया 1 डॉलर के बराबर था लेकिन RBI इसे समय-समय पर अवमूल्यित (Devaluate) करती रही। 1990 में LPG मॉडल अपनाने के बाद सरकार/RBI ने फ्लोटिंग एक्सचेंज रेट को अपनाया। आज 1 डॉलर की कीमत 73.61 रुपये के बराबर है।
  • अवमूल्यन का व्यापार (निर्यात) पर प्रभाव- मुद्रा के अवमूल्यन से निर्यात बढ़ता है।

उदाहरण- टिंकू - कश्मीरी शॉल बेचता है। 1 शॉल = 100 रुपया
अभी 50 रुपया = 1 डॉलर = टोनी 2 डॉलर में 1 शॉल प्राप्त करेगा।

  • बाद में - 70 रुपया = 1 डॉलर

इस स्थिति में टोनी अब 3 डॉलर में 2 शॉल खरीद सकता है जबकि पहले उसे इसके लिए 4 डॉलर देना पड़ता।

  • टिंकू को यह फायदा होगा कि उसकी लागत पहले उतना ही है। माना = 80 रुपये है। जिसे वह 100 रुपये (2 डॉलर) में बेचकर 20 रुपये मुनाफा प्राप्त कर रहा था।

जबकि मुद्रा अवमूल्यित हो गई तब भी लागत उसकी 80 रुपये ही है लेकिन अब टोनी उसे 2 शॉल के लिए लगभग 3 डॉलर का भुगतान करेगा, जिससे रुपये में बदलने पर टिंकू को अधिक फायदा होगा।

  • टिंकू की तरह यदि भारत के अधिक लोग अधिक उत्पादन कर अवमूल्यन की स्थिति में निर्यात करें तो भारत को फायदा होंगा। इसी कारण यह देखा गया है कि जो देश अधिक उत्पादन करते हैं, जैसे कि चीन, वह अपने निर्यात को बढ़ाने के लिए मुद्रा का अवमूल्यन करते रहते हैं।
  • अवमूल्यन से जहाँ निर्यात बढ़ता है वहीं आयात घटता है अर्थात इस पर नकारात्मक प्रभव पड़ता है।

उदाहरण- टिंकू पहले 1 kg संतरा 1 डॉलर में प्राप्त करता था और उसको इसके लिए 50 रुपये का भुगतान करना पड़ता था।
टिंकू अब भी 1 kg संतरा 1 डॉलर में खरीदेगा लेकिन इसके लिए अब उसे 70 रुपये का भुगतान करना होगा।
इसी तरह देश के संदर्भ में में भी आयात कम होगा या उसके लिए अधिक भुगतान करना होगा।

  • रुपये के मजबूत होने पर निर्यात पर नकारात्मक तथा आयात पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

उदाहरण- पहले 50 रुपया = 1 डॉलर
अब 40 रुपया = 1 डॉलर

टोनी जो शॉल पहले 2 डॉलर (100 रुपये) में खरीदता अब नहीं खरीद पायेगा, फलस्वरूप मांग कम करेगा। निर्यात कम होगा।
टिंकू पहले 1 kg संतरा 50 (डॉलर) रुपये में प्राप्त करता था, अब वह 1.25 kg संतरा प्राप्त करेगा क्योंकि 50 रुपये भुगतान करने पर वह 1.25 डॉलर की कीमत धारित कर रहा है।

  • अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के नियमों के मुताबिक देशों को अपनी मुद्रा के मूल्य में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए और बाजार के नियमों के अनुसार उसकी कीमत तय होनी चाहिए।
  • जब कोई देश अपनी मुद्रा का अवमूल्यन करता है, जिससे उसका निर्यात बढ़ता है और दूसरे देश के साथ उसका व्यापार सरप्लस हो जाता है तो इसे करेंसी मेनिपुलेशन (Currency Manipulation) कहते हैं।

उदाहरण- यदि RBI विदेशी मुद्रा बाजार से अधिक मात्र में डॉलर खरीद ले तो डॉलर की आपूर्ति की कमी होगी, फलस्वरूप कीमत बढ़ जायेगी। इससे डॉलर की कीमत बढ़ेगी और रुपया कमजोर होगा। इस तरह यह अवमूल्यन हुआ। इस स्थिति में भारत का निर्यात बढ़ेगा और आयात कम होगा। इससे जिस देश से हम आयात कर रहे थे उसको नुकसान होगा। यह करेंसी मेनीपुलेशन है।

  • अमेरिका का वित्त विभाग (ट्रेजरी डिपॉर्टमेंट) अमेरिका के साथ व्यापार कर रहे देशों की गतिवधियों पर नजर रखता है और यह सुनिश्चित करने का प्रयास करता है कि कोई देश अपनी मुद्रा को मैनिपुलेट करके अमेरिका के साथ व्यापार तो नहीं कर रहा है। यदि किसी देश के संदर्भ में उसे संदेह होता है तो वह उसे करेंसी मेनुपुलेटर वॉचलिस्ट में डाल देता है। यदि यह देश ऐसा करते रहते हैं, अर्थात उनकी मुद्रा कमजोर होती रहती है तो उसे करेंसी मेनुपुलेटर देश घोषित कर दिया जाता है।
  • वर्ष 2018 के अक्टूबर माह में भारत को इस वॉचलिस्ट में शामिल कर दिया गया था। हालांकि अमेरिका ने मई 2019 में भारत को वॉचलिस्ट से बाहर कर दिया था।
  • हाल ही में अमेरिका ने पुनः भारत को इस वॉचलिस्ट में शामिल कर दिया है। अमेरिका की इस निगरानी सूची में भारत के अलावा चीन, ताइवान, जापान, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर, थाइलैण्ड, मलेशिया, इटली और जर्मनी शामिल हैं।

वॉचलिस्ट का आधार-

  1. उस देश का ट्रेड सरप्लस 20 बिलियन डॉलर से ज्यादा हो।
  2. उस देश ने कोई फॉरेन करेंसी इंटरवेंशन किया हो जो उसकी GDP के 2 प्रतिशत से ज्यादा हो
  3. उस देश ने विदेशी मुद्रा खरीदा हो जिसका आकार उसकी GDP के 2 प्रतिशत से ज्यादा हो
  • यदि दो आधार किसी देश के संदर्भ में सही हैं तो वह वॉच लिस्ट और तीनों सही पाये जाने पर मेनीपुलेटर्स देश घोषित कर दिया जाता है। वियतनाम और स्विट्जरलैण्ड मेनीपुलेटर्स देश घोषित किये गये हैं।
  • यहां अमेरिका अपने ट्रेड डेफिसिट को एक सीमा तक नियंत्रित करने के लिए ऐसा करता है।