(Video) Daily Current Affairs for UPSC, IAS, UPPSC/UPPCS, BPSC, MPSC, RPSC & All State PSC/PCS Exams - 19 August 2020


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जनजातीय अधिकार और संविधान

  • संविधान नियमों और उपनियमों का एक ऐसा लिखित दस्तावेज है जिसके आधार पर किसी देश/राज्य की सरकार का संचालन होता।
  • इसे देश का सर्वोच्च विधि (सुप्रीम लॉ) के रूप में जाना जाता है और कोई भी विधि/कानून/नियम/रीति-रिवाज इससे बढ़कर नहीं हो सकता हैं।
  • यह एक जीवंत एवं गतिशील दस्तावेज के रूप में होता है अर्थात इसकी प्रासंगिकता हमेशा बनी रहती है तथा समय के अनुसार परिवर्तन इसमें होता रहता है।
  • संविधान एक किताब के रूप में है जिसे कुछ भागों, अनुसूचियों में विभाजित कर अनुच्छेदों के माध्यम से क्रमबद्ध किया गया हैं
  • मूल संविधान में 22 भाग एवं 8 अनुसूचियाँ थीं जिनकी संख्या वर्तमान समय में बढ़कर क्रमशः 25 एवं 12 हो गई है।
  • 9वीं अनुसूची प्रथम संविधान संशोधन 1951 द्वारा, 10वीं अनुसूची 52वें संविधान संशोधन द्वारा, 11वीं अनुसूची 73वें संविधान संशोधन एवं 12वीं अनुसूची 74वें संशोधन 1992 द्वारा सम्मिलित की गई थी।
  • प्रथम अनुसूची- राज्य तथा संघ राज्य क्षेत्र का वर्णन
  • दूसरी अनुसूची- मुख्य पदाधिकारियों के वेतन-भत्ते
  • तीसरी अनुसूची- शपथ का प्रारूप
  • चौथी अनुसूची- राज्यसभा में स्थानों का आवंटन
  • पांचवी अनुसूची- अनुसूचित क्षेत्रें एवं अनुसूचित जन-जातियों के प्रशासन और नियंत्रण से संबंधित उपबंध
  • छठी अनुसूची- असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम राज्यों के जनजाति क्षेत्रें के प्रशासन के विषय में उपबंध
  • संविधान सभा द्वारा जनजातीय क्षेत्रें की स्वायत्तता के संदर्भ में वारदोलोई समिति का गठन किया गया था। इसी कमिटी की रिपोर्ट के आधार पर संविधान सभा द्वारा छठी अनुसूची को पारित किया गया था।
  • संविधान की छठी अनुसूची असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम में जनजातीय क्षेत्रें के प्रशासन के लिए इन राज्यों में जनजातीय लोगों के अधिकारों की रक्षा प्रावधान करती है।
  • संविधान के अनुच्देद 244(2) और अनुच्छेद 275(1) के तहत इसके लिए विशेष प्रावधान किये गये हैं।
  • इन क्षेत्रों के आदिवासी लोगों की अपनी विशिष्ट सामाजिक रीति- रिवाज हैं जिसमें अन्य लोग हस्तक्षेप न करें यह प्रयास किया जाता है।
  • इसलिए आदिवासी क्षेत्रें के लिए एक अलग-प्रकार की प्रशासन प्रणाली का विकास 6 वीं अनुसूची के माध्यम से किया जाता है।
  • असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के जनजातीय क्षेत्रें को 10 स्वायत्त जिलों के रूप में गठित किया गया है।
  • यह 10 स्वायत्त जिले असम, मेघालय, मिजोरम में 3-3 एवं एक त्रिपुरा में विस्तारित है।
  • स्वायत्त जिलों को राज्य विधानमंडल के भीतर स्वायत्तता का अलग, दर्जा प्रदान किया जाता है । स्वायत्त जिला परिषद राज्य के अंदर ऐसे जिले है जिन्हें केंद्र सरकार ने राज्य विधानमण्डल के अंतर्गत स्वायत्तता अलग-अलग प्रदान किया है।
  • आदिवासी समूह स्वायत्त जिला परिषद (Autonomous District Councils- ADCs) या स्वायत्त क्षेत्रीय परिषद (Autonomous Regional Council) के माध्यम से अपने विधायी एवं कार्य शक्तियों का प्रयोग करते हैं।
  • संबंधित राज्य विधान सभाओं एवं संसद द्वारा पारित अधिनियमों को इन क्षेत्रें में तब तक लागू नहीं किया जा सकता है जब तक कि राज्यपाल और राष्ट्रपति स्वायत्त क्षेत्रें के लिए कानूनों में संशोधन के साथ या इसके बिना उसे अनुमोदित न कर दें।
  • राज्यपाल को स्वायत्त जिलों को गठित करने और पुनर्गठित करने का अधिकार है अर्थात वह इन क्षेत्रें को बढ़ा या घटा सकता है, सीमाएं निर्धारित कर सकता है, नाम परिवर्तित कर सकता है।
  • यदि एक स्वायत्त जिले में अलग-अलग जनजातियाँ हैं तो राज्यपाल जिले को कई स्वायत्त क्षेत्रें में विभाजित कर सकता है।
  • प्रत्येक स्वायत्त जिले में एक जिला परिषद होता है जिसमें 30 सदस्य होते हैं जिनमें से 4 राज्यपाल द्वारा नामित किये जाते हैं और शेष 26 व्यस्क मताधिकार के आधार पर चुने जाते हैं।
  • निर्वाचित सदस्य 5 साल के कार्यकाल के (निर्वाचित) लिए पद धारण करते है और मनोनीत सदस्य राज्यपाल के इच्छानुसार समय तक पद पर बने रहते हैं।
  • जिला और क्षेत्रीय परिषदें अपने अधिकार क्षेत्र के तहत प्रशासन करती हैं और भूमि, वन, नहर के जल, स्थानांतरिक कृषि, ग्राम प्रशासन, संपत्ति का उत्तराधिकार, विवाह और तलाक, सामाजिक रीति-रिवाज से संबंधित मामले पर कानून बना सकती है लेकिन इन्हें राज्यपाल की सहमति प्राप्त होना आवश्यक है।
  • यह जिला एवं क्षेत्रीय परिषदें जनजातियों के मध्य मुकदमों एवं मामलों की सुनवाई के लिए ग्राम परिषदों या अदालतों का गठन कर सकती हैं।
  • इन मुकदमों या मामलों पर उच्च न्यायालय का अधिकार क्षेत्र राज्यपाल द्वारा निर्दिष्ट किया जाता है।
  • यह प्राथमिक स्कूलों, औषधालयों, बाजारों, मत्स्य पालन क्षेत्रें, सड़कों आदि की स्थापना, निर्माण एवं प्रबंधन कर सकती हैं।
  • यह राज्यपाल की सहमति से गैर आदिवासियों द्वारा ऋण एवं व्यापार के नियंत्रण के लिए भी नियम बना सकती है।
  • अरुणाचल प्रदेश भी एक जनजातीय बहुल क्षेत्र है लेकिन यह न तो 5वीं अनुसूची में शामिल और न ही 6वीं अनुसूची में, यह इनर लाइन प्रणाली के अंतर्गत शामिल होता है।
  • अरुणाचल प्रदेश में अपाटानी या अपातनी, बुगुन, हासो, सिंगाफोस, मिश्मिस, मोनपा, न्यासी, शेरडुकपेन्स, टैगिन, वानचोस, नोवटेस, योबिन, मेम्बास, खाम्टरी आदि प्रमुख जनजातियाँ है।
  • हाल ही में अरुणाचल प्रदेश में दो स्वायत्त परिषदों द्वारा पूरे अरुणाचल प्रदेश को 6वीं अनुसूची या अनुच्छेद 371(A) के दायरे में लाने की मांग की गई है।
  • इसके पीछे का तर्क यह है कि ऐसा होने पर यहां की जनजातियों एवं उनके प्रतिनिधियों को वहां के संसाधनों पर विशेष अधिकार प्राप्त हो पायेगा तथा अपने विषय में नियम कानून बनाने की शक्ति प्राप्त हो जायेगी।
  • लंबे समय से यह क्षेत्र न तो विकास की मुख्यधारा में शामिल हो पाया है और न ही यहाँ जनजातीय विकास हो पाया है।
  • अनुच्छेद 371(A) कहता है कि नागालैण्ड के मामले में नागाओं की धार्मिक या सामाजिक परंपराओं, पारंपरिक कानून और प्रक्रिया, नगा परंपरा व कानून के अनुसार फैसलों से जुड़े दीवानी और फौजदारी न्याय, प्रशासन और भूमि तथा संसाधानों के स्वामित्व और हस्तांतरण के संदर्भ में संसद के नियम लागू नहीं होंगे। यह तभी लागू होंगे जब राज्य विधानसभा इसे पारित करने का प्रस्ताव पारित करें।
  • 371(A)- यह भी कहता है कि राज्य में भूमि और संसाधन सरकार के नहीं, बल्कि लोगों के हैं।

बायो एथेनॉल चर्चा में क्यों है?

  • इथेनॉल (Ethanol) जल रहित एथिल अल्कोहल है, जिसका रासायनिक सूत्र C2H5OH होता है।
  • ईंधन के रूप में प्रयुक्त एथेनॉल भी रासायनिक रूप से एथिल अल्कोहल ही है जो सामान्य प्रकार के अल्कोहलिक पेयों में पाया जाता है।
  • बायो एथेनॉल ऐसे पदार्थों से प्राप्त किया जाता है जिसमें स्टार्च की उच्च मात्र पाई जाती है जैसे- गन्ना, मक्का, गेहूँ आदि।
  • इथेनॉल में आक्सीजन के अणु होते हैं जिससे पेट्रोल में इसके मिश्रण से पेट्रोल का पूर्ण दहन संभव हो पाता है और प्रदूषक पदार्थ का उत्सर्जन कम होता है।
  • वर्तमान समय में कई देशों में इसे गैसोलीन में मिलाया जाता है जिससे न सिर्फ प्रदूषण में कमी आती है बल्कि जीवाश्म ईंधनों के खपत में भी कमी आती है।
  • जनवरी 2003 में पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय द्वारा 5 प्रतिशत इथेनॉल सम्मिश्रित पेट्रोल की आपूर्ति के लिए इथेनॉल सम्मिश्रण पेट्रोल (Ethanol Blended Petrol- EBP) को प्रारंभ किया।
  • वर्तमान समय में यह कार्यक्रम लक्षद्वीप एवं अंडमान-निकोबार को छोड़कर संपूर्ण भारत में लागू है।
  • वर्तमान समय में पेट्रोल में 5 प्रतिशत बायो इथेनॉल मिश्रित किया जाता है।
  • इसके लिए आवश्यक बायो इथेनॉल की खरीद सरकार द्वारा तय की पारिश्रमिक कीमतों पर तेल विपणन कंपनियों द्वारा की जाती है।
  • सरकार ने Ethanol Blended Petrol (EBP) के तहत वर्ष 2022 तक पेट्रोल में 10 प्रतिशत बायो इथेनॉल सम्मिश्रण का लक्ष्य रखा है जिसे वर्ष 2030 तक 20 प्रतिशत किया जायेगा।
  • बायो इथेनॉल की बढ़ती मात्रा कच्चे तेल पर हमारी निर्भरता को कम करेगी।
  • हमें इसके लिए बायो इथेनॉल के उत्पादन को बढ़ाने की आवश्यकता है। वर्तमान में इसका उत्पादन मांग की तुलना में कम है।
  • चीनी मिलें इसके उत्पादन का प्रमुख स्रोत है जो कुल मांग का केवल 57.6 प्रतिशत आपूर्ति कर पाती है।
  • आवश्यक कृषि अपशिष्ट की कीमत एवं प्राप्त करने में कठिनाई इसके उत्पादन को सीमित करती है वहीं कीमत निर्धारण सरकार द्वारा किये जाने के कारण निवेश भी कम आकर्षिक होता है। इसलिए कीमत निर्धारण की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के साथ- साथ लोगों तक इसकी जानकारी पहुँचाना आवश्यक है।
  • हमारे यहां सैकड़ों टन कृषि अपशिष्ट बर्बाद हो जाता है जिसके समाधान के तौर पर कृषि अपशिष्ट द्वीपों का निर्माण किया जा सकता हैं इससे किसानों की आय वर्ष 2022 तक दोगुना करने का लक्ष्य भी प्राप्त हो पायेगा तो साथ ही अपेक्षाकृत अधिक स्वच्छ ईंधन की उपलब्धता भी सुनिश्चित हो पायेगी।