(Video) Daily Current Affairs for UPSC, IAS, UPPSC/UPPCS, BPSC, MPSC, RPSC & All State PSC/PCS Exams - 18 December 2020


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पंजाब में धान का अति उत्पादन घातक क्यों है?

  • विश्व में मक्का के बाद जिस फसल को सर्वाधिक बोया और उगाया जाता है वह धान ही है। यह पूर्वी एशिया क्षेत्र की सबसे प्रमुख फसल है। चीन, भारत एवं दक्षिण-पूर्व एशिया के देश चावल का उत्पादन सर्वाधिक करते हैं। एशिया क्षेत्र पूरे विश्व का लगभग 80 प्रतिशत चावल का उत्पादन करता है।
  • चावल (धान) का उत्पादन विश्व के लगभग 100 देशों में होता है लेकिन इसका संकेंद्रण और अधिक उत्पादकता एक खास जलवायु पेटी में देखने को मिलती है। यह जलवायु पेटी उष्ण एवं उपोष्ण कटिबंधीय जलवायु की पेटी है। मानसूनी जलवायु क्षेत्र इसके अनुकूल होते हैं। इसके लिए 75 सेमी- से 200 सेमी. वर्षा, चिकनी एवं दोमट मिट्टी तथा तापमान 21 डिग्री सैल्सियस से 30 डिग्री सैल्सियस होना चाहिए।
  • भारत की प्रमुख खाद्यान्न फसल चावल है। भारत में गर्म और आर्द्र जलवायु मानसून के समय पाई जाती है, इसी कारण इसे खरीफ की फसल के रूप में बोया जाता है।
  • भारत में इसका उत्पादन पंजाब, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखण्ड, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, तमिलनाडु आदि राज्यों में किया जाता है।
  • भारत में इसका उत्पादन भले ही लगभग सभी क्षेत्रें में होता है लेकिन भारत के सभी चावल/धान उत्पादन राज्य इसके उत्पादन के के अनुकूल नहीं है। खासकर पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश। लेकिन यहां यह भी समझना आवश्यक है कि यह वही राज्य हैं जो भारत की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

बैकग्राउंड-

  • 1960 के दशक के प्रारंभिक वर्षों में देश में बार-बार अकाल और सूखा पड़ने के कारण फसल उत्पादन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा तो रही सही कसर भारत-चीन युद्ध और 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध ने पूरी कर दी। इन परिस्थितियों के कारण देश के सामने खाद्यान्न असुरक्षा की स्थिति उत्पन्न होती जा रही थी। ऐसे में राष्ट्रीय नेतृत्व ने हरित क्रांति को सामने रखा।
  • सरकार ने अधिक उत्पादन के लिए विदेशों से हाइब्रिड प्रजाति के बीज आयात किये, जिनका बाद में उत्पादन भारत में ही होने लगा। इन बीजों की उत्पादन क्षमता ज्यादा होने के कारण इन्हें HYV - High Yeilding Varieties नाम दिया गया। पहले इन्हें 1960-1963 के बीच 7 राज्यों के सात जिलों में आजमाया गया, जिसे गहन जिला कृषि कार्यक्रम नाम दिया गया। इस प्रयोग के बाद 1966-67 में हरित क्रांति को औपचारिक रूप से अन्य क्षेत्रें में अपना लिया गया।
  • HYV के प्रयोग के लिए अधिक सिंचाई की आवश्यकता थी, जिसके कारण यह फसलें वहीं हो सकती थीं जहां सिंचाई के विकल्प मौजूद हों। इसके अलावा इसमें कीटनाशको, उर्वरकों और तकनीकी का भी प्रयोग किया जाना था। इस कारण हरित क्रांति वहीं सफल हो सकती थी जहां जोत का आकार बड़ा हो, वित्त की उपलब्धता हो और किसान नवाचार को अपनाने के लिए तैयार हों।
  • पंजाब इन सभी आधारों पर उस समय फिट बैठता था और उसने इसे अपनाया भी। यहां पंचनदियों के जल का उपयोग किया गया, बिजली सब्सिडी और उर्वरक सब्सिडी प्रदान की गयी और किसानी संबंधित मशीनों पर भी सरकार ने सहयोग किया। फलस्वरूप पंजाब हरित क्रांति को सबसे सफल तरीके से संपन्न कर पाया और सबसे अधिक फायदा भी उठाया।
  • सरकार द्वारा MSP की घोषण और इसमें निरंतर वृद्धि तथा पंजाब के गेहूँ और चावल की खरीद FCI द्वारा अधिक किये जाने के कारण यहां के किसानों ने बढ़चढ़कर चावल एवं गेहूँ के उत्पादन को बढ़ाया।
  • पंजाब जैसी कुछ-कुछ विशेषताएं हरियाणा एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी थी, इसी कारण यहां भी कुछ ऐसा ही परिवर्तन आया।
  • पंजाब ने मोटे अनाज, दलहन, तिलहन को अलविदा कहकर गेहूँ-चावल को अपना लिया। चावल के उत्पादन के लिए अधिक सिंचाई की आवश्यकता थी और पंजाब ने अपनी नदियों के साथ-साथ भूमिगत जल का अति प्रयोग किया। जिसकी वजह से यहां भूजल का स्तर तेजी से नीचे जाने लगा।
  • वर्ष 1979 में सूखे का यहां पहला संकट उत्पन्न हुआ जब मध्य पंजाब के इलाके में भूजल तेजी से नीचे गिरने लगा। हालांकि इस संकट को एक अन्य संकट ने काटा, वह था 1988 का बाढ़ संकट जिसने भूमिगत जल स्तर को रिचार्ज किया।
  • पंजाब में भूमिगत जलस्तर के साथ एक और चुनौती उत्पन्न हो रही थी, वह भी मिट्टी की उत्पादकता का कम होना। अति फसल उत्पादन, उर्वरकों और रसायनों/कीटनाशकों के अति प्रयोग ने यहां की उत्पादकता कम किया। फलस्वरूप किसानों ने 1993-94 में चावल की किस्म गोविन्दा को उगाना प्रारंभ कर दिया। यह फसल साठ दिनों में पककर तैयार हो जाती थी इसलिए आम बोल चाल की भाषा में इसे साठी चावल कहा गया।
  • किसानों ने चावल उत्पादन अवधि (अप्रैल से अक्टूबर) के दौरान साठी चावल की दो फसल उगाना प्रारंभ कर दिया। इससे किसानों की आय तो बढ़ी लेकिन राज्य में पानी का संकट उत्पन्न हो गया।
  • पंजाब में 1980 के दशक में जहां भूजल का स्तर 18 सेंटीमीटर की दर से वहीं यही 2005 तक 88 सेंटीमीटर सालाना की दर से नीचे गिरने लगा। इसके लिए पंजाब ने पंजाब राज्य किसान आयोग का गठन किया तथा किसानों को जागरूक करने के लिए पानी बचाओं पंजाब बचाओं अभियान शुरू किया।
  • पंजाब के सामने एक और चुनौती थी। यह चुनौती थी जलवायु परिवर्तन की। जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से यहां का तापमान बढ़ रहा था।, जिसकी गेहूँ का उत्पादन कम हो रहा था, फसलस्वरूप चावल पर किसानों की निर्भरता और बढ़ गई। ग्लोबल वार्मिंग/जलवायु परिवर्तन की वजह से यदि तापमान 0.5 डिग्री सैल्सियस की बढ़ोत्तरी होती है तो गेहूँ के उत्पादन में 10 प्रतिशत की गिरावट आती है। 1970 से 2010 तक 0.5-1.0 डिग्री सैल्सियस तापमान बढ़ चुका है।
  • पंजाब का बासमती चावल GI टेग धारित करता है, जिसकी वैश्विक मांग ज्यादा है फलस्वरूप यहां के किसान इसका उत्पादन करते रहना चाहते हैं।
  • एक अनुमान के अनुसार पंजाब में एक किलो धान उगाने के लिए 17 लीटर पानी का प्रयोग किया जाता है। दरअसल एक चावल की फसल उपजाने के लिए 30 बार या उससे ज्यादा बार सिंचाई की आवश्यकता करनी पड़ती है।
  • पंजाब अधिक जल के साथ-साथ अति उर्वरक का भी प्रयोग करता है। पंजाब 184 किग्रा/हेक्टेयर खाद का प्रयोग करता है वहीं दूसरे राज्य पश्चिम बंगाल 122 किलोग्राम का उपयोग करता है।
  • वर्ष 2009 में पंजाब में यह कानून लाया गया कि यहां चावल की कृषि मानसून के समय ही चावल की कृषि की जाये। अर्थात अप्रैल माह में फसल का उत्पादन नहीं किया जाये। इससे किसान साठा धान का उत्पादन नहीं कर सकते थे।
  • अभी भी पंजाब में भू-जलसंकट न सिर्फ बना हुआ है बल्कि यह विकराल भी होती जा रही है। जून 2018 में पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने चेताया था कि राज्य के नाम का अर्थ भले ही पांच नदियों की भूमि हो लेकिन हो सकता है कि अगले 15 वर्षों में इस कृषि प्रधान राज्य में पानी ही न रह जाये।
  • पंजाब में 71 प्रतिशत सिंचाई ट्यूबवेल के जरिए होती है जिसकी बिजली किसानों को मुफ्रत में मिलती है। मौजूदा वित्त वर्ष में इस सब्सिडी पर 8275 करोड़ राज्य सरकार खर्च कर रही है।
  • यहां के किसानों का कहना है कि ऐसा नहीं है कि हम दूसरी फसल उपजाना नहीं चाहते है लेकिन उन फसलों से आर्थिक लाभ मिल सकता हो। यहां के किसानों ने गन्ने और कपास की फसल को भी आजमाया। कपास की फसल बीमारियों के हमले से बर्बाद हो जाती है तो गन्ने का मूल्य सही समय पर नहीं मिलता है।
  • पंजाब इस एकल कृषि की समस्या का सामना कर रहा है। एकल कृषि से तात्पर्य कृषि भूमि या खेत पर एक समय में एक ही प्रकार के फसल उगाने के विचार पर आधारित है। इस समय खाद्यान्न फसल चावल एवं गेहूँ को ही सर्वाधिक महत्व यहां दिया जा रहा है।
  • वर्ष 2018-19 में पंजाब का सकल कृषि क्षेत्र लगभग 78.30 लाख हेक्टेयर था, जिसमें से 35.20 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में गेहूँ और लगभग 31.03 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में धान को उपजाया गया। यह कुल कृषि क्षेत्र का 84.6 प्रतिशत था। जबकि 1960-61 में यह प्रतिशत मात्र 32 प्रतिशत था।
  • इस एकल कृषि से रोगों एवं कीटों के हमले से पूरी फसल बर्बाद होने की संभावना बढ़ जाती हैं वहीं फसलों की आनुवांशिक विविधता भी कम होती हैं जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न पर्यावरण में कीटों की संभावना भी बढ़ रही है जो पंजाब के लिए चुनौती उत्पन्न कर रहा है।
  • गेहूँ एवं धान नाइट्रोजन स्थरीकरण भी नहीं करते है जिससे नाइट्रोजन का स्तर कम हो रहा हैं इसी के साथ मिट्टी की पोषकता तेजी से कम हो रही है।
  • अति सिंचाई से मिट्टी लवणीयता (Salinity) बढ़ रही है फलस्वरूप मिट्टी बंजर होने की संभावना बढ़ रही है।
  • पंजाब में वर्तमान समय में जिस कृषि पद्धति को अपनाया जा रहा है उससे कृषि पारिस्थितिकी पर तेजी से नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।
  • सरकार यहां अब चावल के एक किस्म Pusa-44 के उत्पादन को बोने के लिए किसानों को प्रोत्साहन दे रही है। इसका समयकाल लंबा, लगभग 130 दिन होता है। जिसकी वजह से गेहूँ की फसल के लिए कम समय मिलता है, जिसके कारण धान की कटाई करने के बाद तुरंत बाद (15 दिन के अंदर) गेहूँ के लिए खेत को तैयार करने के लिए खेत में आग लगा देते हैं, जिसकी वजह से वायु प्रदूषण की समस्या उत्पन्न होती है।
  • समीक्षकों का मानना है कि इस समस्या के समाधान के लिए निम्नलिखित कदम उठाये जाने चाहिए।
  1. कम पानी वाले बीजों का प्रयोग
  2. कृषि सब्सिडी में कमी और सब्सिडी का प्रवाह उन कृषि पद्धतियों की ओर करना जिससे पर्यावरण अनुकूल कृषि को बढ़ावा मिले।
  3. गेहूँ उत्पादन को 35 लाख हेक्टेयर से 30 लाख हेक्टेयर तक सीमित करना। इस राज्य की दशायें चावल की तुलना में गेहूँ के लिए ज्यादा अनुकूल है।
  4. चावल में गैर बासमती चावल के अंतर्गत 20-76 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को घटाकर 1 लाख हेक्टेयर तक सीमित करना कपास, मक्का, मूँगफली, दलहन को बढ़ावा दिया जाना चाहिए जिससे MSP का फायदा भी मिलता रहेगा।

भारत बांग्लादेश वर्चुअल समिट

  • 17 दिसंबर को भारत और बांग्लादेश के मध्य वर्चुअल समिट का आयोजन किया गया है जिसमें भारतीय प्रधानमंत्री ने बंगबंधु बापू डिजिटल एग्जिबिशन को लॉन्च किया। भारत ने इस वर्चुअल बैठक में बांग्लादेश के साथ 7 समझौतों पर भी हस्ताक्षर किया है। इन विषयों में प्रमुख हैं : हाइड्रोकार्बन , कृषि और 1965 से विलंबित सीमा पार रेलवे आदि।
  • बैठक में बांग्लादेश की प्रधानमंत्री ने कहा कि बांग्लादेश भारत के पड़ोसी प्रथम की नीति का महत्तवपूर्ण स्तंभ है। यह व्यक्तव्य दोनों देशों के सामूहिक हितों के लिए पारस्परिक समझ को दर्शाता है।
  • दोनों देशों के प्रमुखों ने इस वर्चुअल बैठक में चिलहटी हल्दीबाड़ी रेलवे लिंक को पुनः शुरू करने का निर्णय करते हुए इसका उद्घाटन किया। इस प्रकार
  • भारत और बांग्लादेश के बीच 55 साल से बंद बड़ी चिलहटी-हल्दीबाड़ी ट्रेन सर्विस फिर से प्रारंभ हो गई है। हल्दीबाड़ी पश्चिम बंगाल के कूच बिहार जिले में है। भारत-पाकिस्तान में 1965 की जंग के दौरान यह सर्विस बंद हो गई थी जिसे अब फिर से दोनों देशों ने क्षेत्रीय अंतर संपर्क को मजबूती देने के उद्देश्य से शुरू किया है। 7.5 किलोमीटर लंबी रेल लाइन के जरिए बांग्लादेश होते हुए पश्चिम बंगाल का असम तक संपर्क आसान हो जाएगा। इस ट्रेन के चलने से दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंधों में मजबूती आएगी। इसके अलावा पर्यटन क्षेत्र को भी अधिक मजबूती मिल सकेगी।
  • भारत-बांग्लादेश के बीच शुरू होने वाले इन रेलवे ट्रैक में पेत्रापोल-बेनापोल, गेडे-दरशाना, सिंघाबाद-रोहनपुर और राधिकापुर-बिरोल रेलवे लाइन शामिल है। पिछले दिनों भारत के हल्दीबाड़ी से भारत-बांग्लादेश सीमा के जीरो प्वाइंट तक ट्रेन का ट्रॉयल किया गया था।
  • गौरतलब है कि भारत और बांग्लादेश के मध्य पहले से ही कुछ रेलवे लिंक कार्यशील हैं। भारत बांग्लादेश मित्रता पाइपलाइन 136 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन है जिसमें 130 किलोमीटर बांग्लादेश के क्षेत्र में और 6 किलोमीटर भारत के भू भाग में है। इसके तहत पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी से डीज़ल की आपूर्ति उत्तरी बांग्लादेश के पार्वतीपुर और दिनाजपुर जिलों को की जाएगी। असम स्थित नुमालीगढ़ रिफाइनरी द्वारा भारतीय भूभाग वाले पाइपलाइन के निर्माण कार्य का वित्त पोषण किया जाएगा। इस पाइपलाइन के जरिए पहले वर्ष भारत 2.5 लाख टन तेल की आपूर्ति बांग्लादेश को करेगा और इसके पूर्ण रूप से निर्मित हो जाने पर प्रति वर्ष 4 लाख टन तेल की आपूर्ति बांग्लादेश को की जाएगी। असम के नुमालीगढ़ के इस प्रोजेक्ट से जुड़ने के चलते बांग्लादेश और उत्तर पूर्वी भारतीय राज्यों में विकास परियोजनाओं की प्रत्येक संभावना को खोजने का प्रयास भारत सरकार द्वारा किया गया है।
  • इसके साथ ही अगरतला (त्रिपुरा) से अखौरा (बांग्लादेश) के बीच बहुप्रतीक्षित रेलवे लाइन का कार्य सितंबर 2021 तक पूरा हो जाएगा। रेलवे लाइन के लिए भूमि का अधिग्रहण और इसे कार्यदायी संस्था को सौंपने की प्रक्रिया दोनों देशों में पूरी हो चुकी है। यह रेललाइन 15.6 किलोमीटर लंबी होगी। इसका 10.6 किलोमीटर का हिस्सा गंगासागर (बांग्लादेश) से निश्चिंतपुर (भारत) और 5.46 किलोमीटर लंबा हिस्सा निश्चिंतपुर से अगरतला रेलवे स्टेशन तक होगा। भारतीय हिस्से में 5.46 किमी रेलवे लाइन बिछाने का खर्च पूर्वोत्तर रेल मंत्रालय वहन करेगा।
  • इस परियोजना के पूरा होने के बाद कोलकाता से अगरतला (वाया गुवाहाटी) की रेल यात्रा का समय और दूरी जो पहले 38 घंटे और 1500 किमी थी अब घटकर 15 घंटे और 500 किलोमीटर रह जाएगी। कोलकाता और ढाका के बीच मैत्री एक्सप्रेस पहले से ही चल रही है जिसे अगरतला तक बढ़ाया जा सकता है।