(Video) Daily Current Affairs for UPSC, IAS, UPPSC/UPPCS, BPSC, MPSC, RPSC & All State PSC/PCS Exams - 16 December 2020


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Myristica Swamps Treefrog चर्चा में क्यों हैं?

  • Myristica (जायफल) पेड़ों की एक प्रजाति है, जिसका संबंध Myristicacease परिवार से है। इस परिवार में 150 से अधिक प्रजातियाँ हैं जो एशिया और पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में मिलती हैं ।
  • यह उष्ण कटिबंधीय सदाबहार पौधा है। यह मसाला आइलेंड (इंडोनेशिया), मलेशिया, केरल (भारत) श्रीलंका, दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका के उन क्षेत्रें में पाया जाता है जहां वर्षा ज्यादा होती है। जायफल के वृक्ष समुद्र तल से 400-500 फुट की ऊँचाई तक नम घाटियों में मिलते हैं जहां दोमट मिट्टी नमी वाली हो। यह पौधे दलदली क्षेत्र में भी अपना विकास करते हैं। लेकिन दलदली क्षेत्र का पानी मीठा होना चाहिए।
  • इस पौधे की लंबाई 5-15 मीटर होता है। इस पर लगने वाले या आने वाले फूलों से फ्रेग्रेंस प्राप्त किया जाता है। फूल हल्के पीले रंग के और कुछ मोमी एवं मांसल होते हैं। इस पर नाशपाती आकार का लेकिन छोटा फल प्राप्त होता है। यही जायफल है। इसी से जावित्री भी प्राप्त होता है।
  • जायफल की अनेक प्रजातियाँ हैं लेकिन अधिकांश जायफल मिरिस्टिका फ्रैग्रैंस से ही प्राप्त होता है।

Myristica Swamps-

  • पीठे पानी के वह दलदली क्षेत्र जिसमें जायफल के पौधे पाये जाते हैं उन्हें मिरिस्टिका स्वॉम्प्स कहते हैं। यह पश्चिमी घाट की अद्धितीय धरोहर माने जाते हैं। यह मीठे पानी के क्षेत्र उच्च जैवविविधता से संपन्न है। यहां मिलने वाले जायफल के पौधे पृथ्वी पर फूलों के पौधों के सबसे आदिम (Primitive) पौधे माने जाते है। इन Swamps को प्राचीन जीवन का जीवित संग्राहलय माना जाता है। इनके विकास पर जलवायु परिवर्तन और मानवीय हस्तक्षेप को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
  • यहाँ जायफल के पौधे अपना विकास लंबी, मोटी और घनी जड़ों के माध्यम से करते है। यह जड़ें जल-सहिष्णु होती है।
  • इन वनों में गैर दल-दल वनों की तुलना में कार्बन को स्टोर करने की क्षमता अधिक होती है। यह महत्पूर्ण कार्बन अवशोषक माने जाते हैं।
  • केरल के इन स्वॉम्प्स के संदर्भ में 2007 में एक रिपोर्ट प्रस्तुत की गई जिसमें इनके संरक्षण पर तुरंत ध्यान देने की आवश्यकता बताई गई थी तथा इन सभी दलदली क्षेत्रों को अपने आप में व्यक्तिगत संरक्षित क्षेत्र के रूप में सीमांकित करने का सुझाव दिया था।
  • हाल ही में केरल के त्रिशूर जिले में बाज़चल रिजर्व फॉरेस्ट में शेंकोट्ता दर्रे के उत्तर में Myristica Swamp Treefrog प्रजाति को पहली बार देखा गया।
  • इस मेढ़क का सांइटिफिक नाम Mercurana Myristicapalutris है। यह पश्चिमी घाट के इन पेड़ों पर रहने वाली एक दुर्लभ एवं स्थानिक प्रजाति है।
  • यह दुर्लभ प्रजाति है पेड़ों के खोल के अंदर या पेड़ों पर ही अधिकांश समय तक रहते है। यह पेड़ों की ऊँची कैनोपियों पर लंबा समय बीताते है।
  • जहां अन्य मेढ़क अपना विकास मानसून काल में करते है वहीं इनका प्रजनन मई माह में प्रारंभ होता है जून में समाप्त हो जाता हैं अर्थात् यह पूरे मानसून सक्रिया नहीं रहते है। और मानसून के प्रभावी होने से पहले ही यह पेड़ों पर वापस लौट जाते है।
  • यह प्रजनन के लिए जमीन पर आते हैं। मादा मेढ़क द्वारा मिट्टी खोदकर उथला गड्ड़ा बनाया जाता है, जिसमें अंडे देते है। इसके बाद यह पुनःवापस पेड़ों पर चले जाते हैं।
  • इससे पहले मेढ़क की इस प्रजाति को वर्ष 2013 में अगस्त्यामलाई के पश्चिमी तलहटी में कुलथुपुझा रिजर्व फॉरेस्ट के पास परिप्पा के तराई क्षेत्र में देखा गया था।

3D प्रिंटिंग चर्चा में क्यों ?

  • 3D का मतलब 3 Dimensional होता है, जिसमें हम किसी वस्तु को 3 तरफ से देख सकते हैं। 2D इमेज या डायमेंशन के माध्यम से जहां हम किसी वस्तु की लंबाई और चौड़ाई देख पाते हैं वहीं 3D के माध्यम से हम लंबाई, चौड़ाई के साथ उसकी गहराई भी देख पाते है। इस तरह की इमेज देखने में बिल्कुल वास्तविक लगती है।
  • इसी 3D की प्रक्रिया का प्रयोग करके हम 3D प्रिंटिंग करते हैं। 3D प्रिंटिंग एक प्रक्रिया है जिसमें एक डिजिटल मॉडल एक मूर्त, त्रि-आयामी वस्तु में बदल जाता है।
  • 3D विनिर्माण की तकनीकी में प्लास्टिक, राल, थर्माप्लास्टिक, धातु फाइबर या चिनी मिट्टी आदि का प्रयोग कर के किसी वस्तु का प्रोटोटाइप अथवा वर्किग मॉडल बनाने के लिए किया जाता है।
  • मॉडल बनाने से पहले इसका एक वर्चुअल डिजाइन बनाया जाता है जो 3D प्रिंटर को पढ़ने के लिए ब्लूप्रिंट की तरह काम करता है। इस वर्चुअल डिजाइन का निर्माण कंप्यूटर-एडेड डिजाइन (CAD) सॉफ्रटवेयर का उपयोग करके किया जाता है।
  • CAD का प्रयोग डिजाइन के निर्माण के अलावा, संशोधन करने, विश्लेषण करने, अनुकूलन करने के लिए किया जाता है।
  • मॉडल के निर्माण के समय स्लाइसिंग तकनीक का प्रयोग करके मॉडल पर सैकड़ों-हजारों पतली, क्षैतिज और उर्ध्वाधर परतों को मॉडल पर चढ़ाया जाता है।
  • 3D तकनीक का प्रयोग करने वाले प्रिंटर योगात्मक विनिर्माण तकनीक (Additive Manufacturing Technology) पर आधारित होते हैं।
  • भारत सरकार का इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रोद्योगिकी मंत्रलय 3D प्रिंटिंग के उभरते बाजार को ध्यान रखते हुए एक नीति ला रहा है, जिसके माध्यम से औद्योगिक स्तर पर इसके उत्पादन और बाजार को बढ़ाया जा सकेगा।
  • 35 प्रतिशत की वैश्विक हिस्सेदारी के साथ अमेरिका 3D प्रीटिंग में अग्रणी बना हुआ है।
  • एशिया में 3D प्रिंटिग क्षेत्र में चीन का कब्जा है और एशिया के कुल बाजार के 50 प्रतिशत पर चीन, जापान (30 प्रतिशत) और दक्षिण कोरिया का कब्जा है।
  • 3D के क्षेत्र में स्पष्ट, आकर्षक नीति होने पर बड़ी कंपनियों का भारत में आगमन हो सकेगा तो साथ ही घरेलू स्तर पर भी इसके उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा और तकनीकी आयात ज्यादा हो सकेगा।
  • 3D के संबंध में नीति होने इसके लिए आधारभूत संरचना और सुविधाओं का विकास हो सकेगा।
  • भारत में ऑटो और मोटर स्पेयर पाटर््स, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, चिकित्सा क्षेत्र, खिलौना उद्योग, घरेलू सामान, सजावटी सामान आदि के क्षेत्र में इसके विकास की पर्याप्त संभावना है।
  • इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रलय के अनुमान के अनुसार वर्ष 2024 तक वैश्विक बाजार 34.8 बिलियन डॉलर तक पहुँच जायेगा इसमें वार्षिक वृद्धि की दर 23.2 प्रतिशत है।
  • भारत में इसके विकास के लिए जहां स्किल्ड लेबर फोर्स मौजूद है वहीं रिसर्च एवं डेवलपमेंट का अभाव है जिसके कारण इसमें ग्रोथ बहुत कम है।

चुनौतियाँ-

  1. उच्च लागत वाली तकनीकी
  2. वैश्विक मानकों का अभाव
  3. चीन से प्रतिस्पर्धा
  4. रोजगार में कमी का खतरा

आईएनएस हिमगिरि

  • फ्रिगेट (Frigate) एक मध्यम आकार की युद्धपोत (नौका) होती है, जिन्हें तेज गति और फुरती से सामान या नेवी की पहुँच किसी क्षेत्र में पहुँचाने के लिए विकसित किया जाता है।
  • इनका प्रयोग नौकाओं या अन्य जहाजों की रक्षा करने, उनके लिए सामान आपूर्ति करने, किसी समुद्री जहाज को पकड़ने ,समुद्री तुटेरों से किसी क्षेत्र की रक्षा करने के लिए किया जाता है।
  • यह नेवी के लड़ाकू जहाजों की तरह की होते है, बस इनका आकार थोड़ा छोटा होता है। फ्रिगेट से छोटे आकार के जहाज को कॉर्वेट कहा जाता है।
  • हाल ही में फ्रिगेट INS हिमगिरी को कलकत्ता में लाँच किया गया है। अर्थात इसे जल में उतारा गया है।
  • यह स्टेल्थ तकनीक से निर्मित फ्रिग्रेट है, जिसके कारण यह राडार के पकड़ में नहीं आयेगा। इसके अलावा इसे सोनार (Sonar) और इन्फ्रारेड मैथेड्स से पकड़ में आने से बचाया जा सकता है।
  • इसकी लंबाई 149 मीटर, चौड़ाई (Beam) 17.8 मीटर, ऊँचाई (Depth) 9.9 मीटर है। इसकी कुल वहन क्षमता 6670 टन है।
  • इसमें दो 6000-6000 किलोवॉट के डिजल इंजन व 2 इलेक्ट्रिक इंजन लगे हैं।
  • यह 28 नॉट्स या 52 किमी/घंटा की गति से चल सकता है।
  • इसकी रेंज 4600 से 5500 किमी की है।
  • इस पर 4 कवर लांचर मौजूद हैं। यह अपने साथ 32 बाराक-8 मिसाइल व 8 ब्रह्मोस मिसाइल ले जा सकती है। इस पर 5 इंच-62 कैलिवर MK-45 मशीनगन लगा है।
  • इसके अलावा इस पर सबमरीन रॉकेट लांचर लगा हैं यह अपने साथ दो हल्के हैलीकॉप्टर ले जाने में सक्षम है।
  • इसका निर्माण ‘प्रोजेक्ट 17A’ के तहत किया गया है।
  • ‘प्रोजेक्ट 17’ को वर्ष 2000 में प्रारंभ किया गया था जिसका दूसरा नाम शिवालिक क्लास प्रोजेक्ट था। इसके तहत बहुउद्देशीय फ्रिगेट का निर्माण किया जाना था। इसके तहत INS शिवालिक, INS सतपुडा, INS सहयाद्री का निर्माण किया जाना था। इन्हें क्रमशः 2003, 2004 और 2005 में लांच किया जा चुका है। इन्हें Mazagon Dock Limited द्वारा बनाया गया था।
  • इन्हें क्रमशः वर्ष 2010, 2011 और 2012 में कमिशन कर दिया गया है।
  • प्रोजेक्ट 17 को और उन्नत करने के लिए इसे प्रोजेक्ट 17A में रूपांतरित कर दिया गया। इसे नीलगिरी क्लास फ्रिग्रेट के नाम से भी जाना जाता है।
  • इसके तहत कुल 7 फ्रिगेट का निर्माण किया जाना है। जिसमें से 4 का निर्माण Mazagon Dock द्वारा तथा 3 का निर्माण GRSE (Garden Reach Shipbuilder and Engineers) द्वारा किया जाना है। मझगांव डॉक द्वारा निर्मित चारों फ्रिगेट को नीलगिरी क्लास के अंतर्गत रखा जायेगा।
  • इनके नाम, हिमगिरी, नीलगिरी, तारागिरी, उदयागिरी, दूनागिरी, विंध्यागिरी और महेंद्रगिरी होंगे।
  • आईएनएस हिमगिरी को गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इजीनियर्स द्वारा इसी प्रोजेक्ट 17A के तहत विकसित किया गया है।
  • आईएनएस हिमगिरी के निर्माण पर 4000-5000 करोड़ का खर्च आया है।
  • आईएनएस नीलगिरी को पिछले साल (2019) 28 सितंबर को लांच किया जा चुका है।
  • लांचिंग के बाद इसका टेस्ट/ट्रायल किया जाता है। सभी पैमानों पर खरे उतरने के बाद इसे नेवी में कमिशन (शामिल) किया जाता है। ट्रायल की अवधि 2 से 3 साल की होती है।
  • आईएनएस हिमगिरी को अगस्त 2023 तक कमीशन किये जाने की उम्मीद है।
  • प्रोजेक्ट 17A के तहत निर्मित होने वाले फ्रिगेट की खास बात यह है कि यह स्वदेशी तकनीक से निर्मित किया जा रहा है।