Daily Current Affairs for UPSC, IAS, State PCS, SSC, Bank, SBI, Railway, & All Competitive Exams - 10 June 2020


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क्या हमारा स्वास्थ्य तंत्र कमजोर है?

  • स्वास्थ्य से आशय किसी व्यक्ति का बीमारियों, चोट या ऐसी समस्याओं से मुक्ति है जिसका शरीर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है और शरीर कमजोर तथा कम सक्रिय हो जाता है।
  • बीमारियाँ हर समय काल में रहती है और हर समाज उससे लड़ने के लिए अपने हिसाब से स्वास्थ्य तंत्र को खड़ा और विकसित करता है।
  • 21वीं सदी में यह स्वास्थ्य सेक्टर सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है, कारण है लोगों के पास अपने स्वास्थ्य के लिए समयाभाव तथा नित-नयी बीमारियों का आगमन।
  • कोरोना वॉयरस ने जिस तरह पूरी दुनिया को घरों में कैद कर दिया है उससे सभी देश अपने स्वास्थ्य सुविधाओं को न सिर्फ मजबूत कर रहे है बल्कि उन कमियों का भी पता लगा रहे है जिससे वह इस महामारी से निपटने में नाकाम रहे है।
  • भारत वर्तमान समय में 2.9 ट्रिलियन अर्थव्यवस्था वाला देश है, जिसके ऊपर लगभग 135 करोड़ से अधिक लोगों का स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराने की जिम्मेदारी है।
  • भारत अपनी GDP का लगभग 1.4% फीसदी स्वास्थ्य पर खर्च करता है। जबकि वैश्विक स्तर पर यह मानक 5-6% है।
  • भारत की तीसरी राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति वर्ष 2017 में अपनाई गई थी उसमें भी 2025 तक GDP का मा 2.5% खर्च करने की बात की गई है।
  • पहली और दूसरी राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति क्रमशः 1983 एवं 2002 में बनी थी।
  • मशहूर स्वास्थ्य पत्रिका लैनसेट के अनुसार भारत में स्वास्थ्य पर निजी खर्च लगभग 78% है अर्थात 22% व्यय ही सरकार के खाते में आता है।
  • भारत जैसे विकासशील और विविध जलवायु वाले देश में इस कम खर्च से चुनौतियाँ बढ़ जाती है क्योंकि कि अधिकांश निम्न आय और मध्यम आय वर्ग एक बार बीमारी का शिकार होकर गरीबी रेखा से नीचे आ जाता है।
  • भूटान अपनी GDP का 2.5%, मालदीव 9.4%, श्रीलंका 1.6% वहीं नेपाल, अफगानिस्तान और बांग्लादेश भी अपनी GDP का भारत से ज्यादा खर्च स्वास्थ्य सेक्टर पर करते हैं।
  • WEF (World Economic Forum) ने 2019 में एक रिपोर्ट प्रकाशित की जो 141 देशों के स्वास्थ्य जीवन प्रत्याशा सर्वे से संबंधित या इसमें भारत 109 वे स्थान पर था।
  • लेंसेंट के 2018 के अध्ययन में भारत 195 देशों में 145वें पायदान पर है, जिसमें स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता और लोगों तक उनकी पहुँच को आधार बनाया गया था।
  • कोरोना वॉयरस के फैलाव के प्रारंभ में ही WHO द्वारा भारत के संदर्भ में स्थिति चिंताजनक बतायी गई थी क्योंकि हमारा स्वास्थ्य तंत्र महामारियों के लिए उपयुक्त नहीं हैं हमने ग्रामीण और अर्द्धशहरी क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य पर ही फोकस किया है।
  • खर्च के अलावा एक प्रमुख मुद्दा डॉक्टरों की कमी का है।
  • WHO के मानकों के अनुसार प्रति 1 हजार जनसंख्या पर एक डॉक्टर होना चाहिए लेकिन भारत में 1 डॉक्टर पर कम से कम 2000 लोगों की जिम्मेदारी है। हालांकि कुछ समीक्षक इस संख्या को 8-10 हजार तक बातें है।
  • हमारे पास जो भी डॉक्टर है उनमें से बहुत से डॉक्टर पूर्णतः योग्य नहीं है। WHO की वर्ष 2016 के अनुसार 1/3 लोगों के पास मेडिकल की डिग्री ही नहीं है।
  • एक अन्य रिपोर्ट में यह भी बताया गयाहै कि हमारे यहाँ के 5% डॉक्टर ही पहली बार में ठीक से बीमारी समक्ष पाते हैं।
  • डॉक्टरों की संख्या से महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि अधिकांश डॉक्टरों का संकेन्द्रण शहरी क्षेत्रों में है और ग्रामीण क्षेत्र में जूनियर डॉक्टर कम संसाधनों की उपस्थिति में ईलाज करते है।
  • दूसरी तस्वीर राज्यों के स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं और डॉक्टरों की उपलब्धता के अंतर से जुड़ा है।
  • हाल ही में दिल्ली सरकार ने दिल्ली के लोगों के लिए यहाँ के अस्पतालों को आरक्षित रखने का आदेश लिया या क्योंकि उनका मानना यह है कि अन्य राज्य पिछड़े हुए है।
  • तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल और दिल्ली डॉक्टरों की संख्या के हिसाब से धनी हैं लेकिन पिछड़े राज्यों में स्थिति गंभीर है।
  • इसके साथ-साथ हमें स्वाथ्य सेक्टर की संरचना को भी समझना आवश्यक है।
  • भारत में 60-80% स्वास्थ्य सुविधाएं निजी क्षेत्र द्वारा पहुँचाई जा रही है और भारत में जो स्वास्थ्य जाल विकसित हुआ है उसमें इनका ही योगदान ज्यादा है।
  • लेकिन निजी अस्पताल अपने लालची, अनैतिक प्रवृत्ति और अपने व्यवसाय के लिए जाने जाते है फलस्वरूप व्यक्ति इनके पास जाकर स्वस्थ्य भले ही हो जाये लेकिन गरीब अवश्य हो जाता है।
  • हर जिले और गाँव में कई ऐसे परिवार मिल जाते है जो जमीन बेचकर ईलाज कराते है।
  • COVID-19 के समय यही अस्पताल विस्तर और मरीज की भर्ती को लेकर कालाबाजारी कर रहे है।
  • दिल्ली, मुम्बई जैसे महानगरों में एक बेड की कीमत 5-10 लाख रुपये रखी गई है।
  • पिछले 2 माह से सैकड़ों ऐसे केस सामने आये है जिसमें सामान्य उपचार इसलिए नहीं किया जा रहा है क्योंकि कोरोना हो सकता है, इसकी वजह से अस्पतालों के बाहर लोगों की मौत हो रही है।
  • हाल ही में यह मुद्ददा सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुँचा और उसका विचार था कि इस माहारी के समय उन्हें अपनी सामाजिक जिम्मेदारी निभानी चाहिए क्योंकि सरकार द्वारा जमीन, ऋण और निजी स्वास्थ्य उपकरणों पर कम सीमा शुल्क जैसे अनेक लाभ दिये जाते है।
  • राज्य के प्रदान किये गये लाभ के एवज में कुछ गरीबों का जो ईलाज करना होता है उससे भी यह संस्थान इस समय बच रहे है।
  • भारत में स्वास्थ्य सेक्टर की बुनियाद दरअसल कमजोर है।
  • हमारे यहाँ स्वास्थ्य व्यवस्था जिला अस्पताल और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के बीच बांटकर चलाई जाती है।
  • जिला अस्पताल और प्राथमिक स्वास्थ्य दोनों आधारभूत संरचना और संसाधनों के अभाव का सामना कर रही है।
  • आजादी केबाद से अनेक योजनाओं के चलाया अवश्य गया लेकिन अस्वीर अभी भी बहुत अच्छी नहीं है।
  • एम्बुलेंस, ऑक्सीजन सिलेंडर, स्ट्रेचर, बेड, दवा आदि प्राथमिक चीजें भी उपलब्ध नहीं है।
  • आज जब पूरे देश के COVID-19 से निपटने के लिए इनकी आवश्यकता थी उस समय यह अस्पताल अपनी कमजोरयिों को बाहर ला रहे हैं इससे यह स्पष्ट है कि हमने अपने स्वास्थ्य पर न तो पर्याप्त ध्यान दिया है और नही रेगुलेट करने का प्रयास किया है।
  • बात यहाँ सिर्फ अस्पताल और डॉक्टर की नहीं है बल्कि लैब और दवाओं की उपलब्धता और कीमत से भी है।
  • भारत में लैब समान्यतः शहरी क्षेत्रों में और अपर्याप्त संख्या में संकेंद्रित है जिसकी वजह से न सिर्फ ईलाज में विलंब होता है बल्कि अधिक पैसा भी खर्च होता है।
  • COVID-19 के समय इनकी कम संख्या हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती है।
  • दवाओं का भार आज भी बहुत ज्यादा है जिसे सरकारी प्रयास के बावजूद अभी भी कम नहीं किया जा सका है।
  • अन्सर्त एंड यंग की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 80% शहरी और 90% ग्रामीण नागरिक अपने सालाना घरेलू खर्च का आधे से अधिक हिस्सा स्वास्थ्य सुविधाओं पर खर्च करते है।