(Video) Daily Current Affairs for UPSC, IAS, State PCS, SSC, Bank, SBI, Railway, & All Competitive Exams - 04 August 2020


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BeiDou नेविगेशन सिस्टम

  • GPS अर्थात ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम एक वैश्विक नेविगेशन सेटेलाइट सिस्टम है जो किसी चीज/वस्तु/व्यक्ति की लोकेशन पता करने में उपयोग किया जाता है।
  • इस सिस्टम को सबसे पहले अमेरिका के डिफेंस डिपार्टमेंट ने 1960 में बनाया था अर्थात इसका उपयोग वहाँ की आर्मी करती थी।
  • 27 अप्रैल 1995 से यह सभी के लिए ओपन कर दिया गया। इसका सर्वाधिक उपयोग नेविगेशन या रास्ता ढूंढने के लिए किया जाता है।
  • इस सिस्टम को NAVSTAR (Navigation Satellite Timing and Ranging) कहा जाता है। यह व्यक्ति की लोकेशन, स्पीड, किसी स्थान से दूरी, सब कुछ बताने में सक्षम होता है।
  • Location, Navigation ,Tracking, Mapping, Timing इसकी विशेषता के मुख्य भाग है।
  • GPS का अच्छा उपयोग करने के लिए कम से कम 24 से 30 सेटेलाइट के एक नेटवर्क का प्रयोग करना होता है।
  • यह सभी सेटेलाइट हर समय पृथ्वी पर सिग्नल भेजते रहते है जिसे रिसीव करने के लिए रिसीवर की जरूरत पड़ती है। रिसीवर जैसे ही सिग्नल को रीसिव करता है वैसे ही उसकी अवस्थिति का पता चल जाता है।
  • किसी व्यक्ति की लोकेशन अच्छे से पता चले इसके लिए कम से कम 4 सेटेलाइट का प्रयोग किया जाता है।
  • इनमें से हर एक सेटेलाइट रेगुलर समय अंतराल पर अपनी पोजिशन और उसको प्राप्त हो रही सूचना का सिग्नल ट्रांसमिट करती रहती है।
  • आपके GPS रिसीवर तक सिग्नल पहुँचने में कितना समय लगा उसके आधार पर यह कैलकुलेशन करता है। इस कैलकुलेशन से यह पता चलता है कि कम से कम 3 सेटेलाइट आपसे कितना दूर हैं ? इससे GPS डिवाइस का पता लगा सकती है कि आपकी लोकेशन क्या है। यह प्रोसेस Trilateration कहलाता है।
  • जैसे-जैसे सेटेलाइट की संख्या बढ़ेगी Accuracy (सटिकता) बढ़ती जायेगी।
  • यू.एस.ए. के बाद रूस द्वारा Glonass नेविगेशन सिस्टम विकसित किया गया। इसके बाद यूरोप का Galileo और चीन का BDS (BeiDou Navigation System) नेविगेशन सिस्टम विकसित हुआ।
  • चीन ऐसा करने वाला चौथा देश है।
  • बाईडू नेविगेशन सिस्टम का विकास चीन द्वारा 1990 के दशक में प्रारंभ किया गया।
  • प्रारंभ में (1990 के दशक में) चीन ने 3 बाईडू नेविगेशन सेटेलाइट को लांच किया और वर्ष 2000 तक चीन का यह घरेलू नेविगेशन सेटेलाइट सिस्टम सक्रिय रूप से चीन में सेवाएं प्रदान करने लगा।
  • धीरे-धीरे चीन ने इस नेविगेशन सिस्टम का विस्तार चीन से बाहर करना भी प्रारंभ किया और 2012 तक एशिया प्रशांत क्षेत्र के लगभग पूरे क्षेत्र को कवर कर लिया।
  • वर्ष 2018 में बाईडू सिस्टम ने अपनी वैश्विक पहुँच सुनिश्चित की।
  • हाल ही में चीन ने औपचारिक रूप से बाईडू-3 नेविगेशन सिस्टम की वैश्विक सेवाओं की शुरूआत कर दी है।
  • चीन ने यह दावा किया है कि लगभग 100 से अधिक देशों द्वारा इसका प्रयोग किया जा रहा है और चीन बहुत ही जल्द अमेरिकी GPS सिस्टम को पीछे छोड़ देगा।
  • चीन का मानना है कि उन्होंने बाईडू के माध्यम से GPS के मामले में आत्मनिर्भरता प्राप्त कर लिया है और किसी भी चीनी व्यक्ति या कंपनी को अमेरिकी GPS पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं है।
  • इसके लिए चीन ने 35 सेटेलाइट का नेटवर्क तैयार किया है।
  • बाईडू के माध्यम से चीन अपने समीपवर्ती क्षेत्र में 10 मीटर से कम की सटिकता प्रदान कर सकता है। सटिकता ग्राउंड सिस्टम की निकटता के अनुसार बढ़ जाती है।
  • चीन में यह बहुत छोटी सी लोकेशन/वस्तु की अवस्थिति को बहुत सटिकता के साथ बताने में सक्षम है।
  • अमेरिकी GPS 2.2 मीटर से कम की सटिकता प्रदान करता है।
  • चीन इस नेविगेशन सिस्टम को अपने बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव का भाग बना रहा है और BRI देशों में इसे प्रमोट भी कर रहा है।
  • पाकिस्तान की सेना और वहां के लोग पहले से ही इस नेविगेशन सिस्टम का प्रयोग कर रहे हैं।
  • पाकिस्तान की वाईडू पर निर्भरता इस संभावना आधारित है कि भारत पाकिस्तान युद्ध के दौरान अमेरिका अपने GPS का प्रयोग पाकिस्तान को करने से प्रतिबंधित कर सकता है।
  • कारगिल युद्ध के दौरान 1999 में भारत ने GPS के माध्यम से कारगिल क्षेत्र में हो रही गतिविधियों के विषय में पता करने का प्रयास किया लेकिन अमेरिका ने किसी भी प्रकार का डेटा देने से मना कर दिया था।
  • वर्तमान समय में भारत-अमेरिका संबंध मजबुत है इसलिए पाकिस्तान की उपरोक्त संभावना सही भी हो सकती है।
  • भारत इस समय सिर्फ चीन और पाकिस्तान के साथ सीमा विवाद को लेकर कठिनाई का सामना नहीं कर रहा है बल्कि नेपाल, बांग्लादेश, म्यामार में बढ़ते चीन के प्रभाव से भी चिंकित है। ऐसे में इस नेविगेशन सिस्टम से भारत की चिंतायें बढ़ सकती है।
  • वर्तमान समय में चीन इसका प्रयोग रक्षा, परिवहन, कृषि, मत्स्यपालन, आपदा राहत आदि में कर रहा है।
  • भारत के साथ-साथ अमेरिका के लिए भी यह सिस्टम चुनौतीपूर्ण है खासकर दक्षिणी चीन सागर एवं प्रशांत क्षेत्र में।
  • इससे चीन की सैन्य ताकत में वृद्धि हुई है और उसकी आक्रमकता बढ़ सकती है।
  • इसका यदि वैश्विक प्रयोग बढ़ता है तो चीन को आर्थिक लाभ भी होगा।
  • रक्षा जानकारों का मानना है कि भारत की सुरक्षा के दृष्टि से यह काफी चुनौतीपूर्ण कदम है।

अगत्ती द्वीप चर्चा में क्यों है?

  • लक्षद्वीप भारत के दक्षिण-पश्चिम तट से 200 से 440 किमी- दूर एक द्वीपसमूह है।
  • लक्षद्वीप समूह में 12 प्रवाल द्वीप (एटॉल), 3 प्रवाल भित्ति और 5 जलमग्न बालू के तटों को मिलाकर कुल 39 छोटे-बडे़ द्वीप है।
  • यह द्वीप 8 0 से 12.3 0 उत्तरी अक्षांश तथा 71 0 से 74 0 पूर्वी देशांतर के मध्य फैले हुए हैं।
  • मुख्य द्वीप कवरत्ती, अगत्ती, मिनिकॉय और अमिनी द्वीप है।
  • पहले इन द्वीपों को लक्कादीव-मिनिकॉय-अमिनीदिवि द्वीप के नाम से जाना जाता था लेकिन अब इस मूह को लक्षद्वीप (संस्कृतः एक लाख द्वीप) के नाम से जाना जाता है।
  • यह भारत का सबसे छोटा केंद्रशासित प्रदेश है, जिसका कुल सतही क्षेत्रफल सिर्फ 32 वर्ग किमी का है।
  • यहां की राजधानी कवरत्ती है और लक्षद्वीप केरल उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत आता है।
  • विषुवत रेखा से निकटता, समुद्री प्रभाव, पर्याप्त वर्षा के कारण यहां गर्म-आर्द्र जलवायु पाई जाती है।
  • मत्स्यन, बागानी कृषि और पर्यटन यहां के लोगों का मुख्य आधार है।
  • कवरत्ती के पश्चिम में अगत्ती द्वीप स्थित है।
  • अगत्ती द्वीप प्रवाल एवं मछलियों की विविध प्रजातियों के लिए प्रसिद्ध है। यह लक्षद्वीप क्षेत्र का वह क्षेत्र है जहां सर्वाधिक मछलियां मिलती है।
  • यहां की एक बड़ी आबादी की निर्भरता नारियल की कृषि पर है।
  • यहां वार्षिक वर्षा लगभग 1600 मिमी. तक होने के कारण नारियल का विकास पर्याप्त हो पाता है।
  • अगत्ती में सड़क निर्माण के लिए बड़े पैमाने पर नारियल के पेड़ों की कटाई की जा रही है जिसके कारण न सिर्फ इस पर निर्भर आबादी की आजीविका प्रभावित हो रही है बल्कि पर्यावरण पर भी नकारात्मक प्रभाव उत्पन्न हो रहा है।
  • इसी संदर्भ में एक याचिका NGT- नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल में एक स्थानीय व्यक्ति दायर की गई थी।
  • राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण की दक्षिणी पीठ ने अगत्ती द्वीप में नारियल के वृक्षों की कटाई पर अंतरिम रोक लगा दिया है।
  • इस सड़क निर्माण से लक्षद्वीप एकीकृत द्वीप प्रबंधन योजना का किसी तरह से उल्लंघन तो नहीं हुआ है, यह चेक करने के लिए NGT ने एक कमेटी का गठन किया है।
  • यह क्षेत्र चक्रवात एवं समुद्री तुफानों के दृष्टिकोण से संवेदनशील है इसलिए इन वनों की कटाई इस क्षेत्र को प्राकृतिक आपदाओं के संदर्भ में और संवेदनशील बना देगी।
  • अंडमान-निकोबार तथा लक्षद्वीप के विकास के लिए एकीकृत द्वीप प्रबंधन योजना (Integrated Island Management Plan - IIMP) का विकास किया गया है।
  • इसके तहत द्वीपीय क्षेत्रें के संसाधनों का उपयोग इस तरह करने का प्रयास किया जाता है जिससे इनका न सिर्फ बेहतर उपयोग सुनिश्चित हो सके बल्कि पर्यावरण को भी क्षति न हो।
  • IIMP दरअसल द्वीपों के वैज्ञानिक विकास, ग्रीन अर्थव्यवस्था का निर्माण इकोटूरिज्म को बढ़ावा देने, आदिवासी मूल्यों की रक्षा करने तथा जलवायु परिवर्तन से द्वीपों को बचाने के काँसेप्ट को लेकर आगे बढ़ता है।