(Video) Daily Current Affairs for UPSC, IAS, UPPSC/UPPCS, BPSC, MPSC, RPSC & All State PSC/PCS Exams - 03 September 2020


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इंद्र अभ्यास 2020

  • भारत और रूस के संबंध अच्छे रहे हैं लेकिन इस समय भारत की पश्चिमी देशों से बढ़ती निकटता इस संबंध को प्रभावित कर रही है इसीलिए रूस कई बार प्रत्यक्ष रूप से अपनी चिंता प्रकट कर चुका है।
  • हाल ही में भारत ने रूस के द्वारा आयोजित किये जा रहे कवकाज 2020 (काकेशस 2020 )में भाग लेने से मना कर दिया है। इसके पीछे प्रमुख प्रमुख कारण भारत चीन तनाव और COVID-19 को माना जा रहा है।
  • भारत ने रूस के साथ अपनी प्रगाढ़ता बनाये रखने के लिए इंद्र अभ्यास 2020 को आयोजित करने का निर्णय लिया है।
  • यह सैन्य अभ्यास भारत और रूस की नौसेना द्वारा अंडमान- निकोबार द्वीप समूह के पास किया जायेगा।
  • भारत का यह युद्धाभ्यास कोरोना काल का पहला युद्धाभ्यास होगा।
  • इसे पहले ही रूस के ब्लादिवोस्तक में इंद्र-2020 के रूप में आयोजित किया जाना था लेकिन कोरोना के कारण इसे टाल दिया गया था।
  • यह सैन्य अभ्यास 4-5 सितंबर 2020 को आयोजित होगा जिसमें दोनों देशों के नौसैनिक हिस्सा लेंगे।
  • इस नौसैनिक अभ्यास में ट्रैकिंग करने, उड़ान भरने, सतह व हवाई लक्ष्यों पर गन फायरिंग करने का युद्धाभ्यास किया जायेगा।
  • इसका उद्देश्य दोनों देशों की सेनाओं के बीच सामरिक कौशल, सैन्य तकनीकी एवं अनुभव को साझा करना है।
  • इस समय भारतीय नौसेना ने मलक्का जलसंधि के समीपवर्ती क्षेत्रें में अपनी गतिविधियां बढ़ा दिया है और दक्षिणी चीन सागर और बंगाल की खाड़ी में युद्धपोत तैनात कर दिया हैं इन परिस्थितियों में यह युद्धाभ्यास भारत को कई प्रकार की चुनौतियों से निपटने में सक्षम बनायेगा ।
  • इंद्र सैन्य अभ्यास की शुरूआत वर्ष 2003 में हुई थी और पश्चिमी और पूर्वी तटों दोनों तटों पर नौसैनिक अभ्यास किया गया था।
  • वर्ष 2017 में ब्लादिवोस्तक में पहला संयुक्त सैन्य अभ्यास किया गया था जिसमें दोनों देशों की सेनाओं के सभी भागों ने हिस्सा लिया था।
  • इंद्र संयुक्त सैन्य अभ्यास 2019 का आयोजन भारत के बबीना (झांसी), पुणे और गोवा में एक साथ किया गया। यह अभ्यास 10 दिन तक चला था जिसमें भारत के तीनों सेनाओं ने एक साथ अभ्यास किया था।
  • इस अभ्यास में आतंकवाद जैसी चुनौती से निपटने का विशेष अभ्यास किया गया था।
  • इसके अलावा समुद्री सुरक्षा, हवाई सुरक्षा, आपातकालीन व्यवस्था आदि का परीक्षण किया गया।

AGR विवाद क्या है?

  • 1990 के दशक में सरकार ने उदारीकरण की नीति अपनाते हुए कई क्षेत्रें में निवेश आमंत्रित किया। इसी क्रम में दूरसंचार के क्षेत्र में भी कई प्रकार के प्रयास किये गये जिससे इस क्षेत्र का विकास हो सके।
  • राष्ट्रीय दूरसंचार नीति, 1994 के तहत एक निश्चित शुल्क के भुगतान के आधार पर कई कंपनियों को लाइसेंस दिया गया।
  • एकमुश्त शुल्क भुगतान करने में कई कंपनयिों को कठिनाई महसूस हो रही थी और कंपनियों को अपनी सेवा विस्तार के लिए पूंजी की कमी हो रही थी। इन्ही कारणों से वर्ष 1999 में सरकार ने एकमुश्त शुल्क भुगतान की जगह कंपनियों को अपना राजस्व साझा करने का विकल्प उपलब्ध करवाया ।
  • राजस्व साझा करने की दर प्रारंभ में 15 प्रतिशत रखी गई बाद में इसे घटाकर 13 प्रतिशत और 8 प्रतिशत कर दिया गया।
  • साझा किये जाने वाले राजस्व (Revenue) को AGR अर्थात Adjusted Gross Revenue के नाम से जाना जाता है।
  • AGR की परिभाषा को लेकर कंपनी और सरकार के बीच स्पष्टता न होने के कारण विवाद उत्पन्न हुआ।
  • टेलीकॉम कंपनियां कई प्रकार से आय की कमाई करती है जो उनके राजस्व का स्रोत होता है। कंपनियां जहाँ कॉलिंग सुविधा, डेटा सुविधा आदि देती है वह कोर सेवा माना जाता है। कंपनियों का मानना था कि वह सरकार के साथ साझा किये जाने वाले राजस्व में कोर सेवा से प्राप्त होने वाले राजस्व को ही शामिल करेंगी।
  • सरकार का कहना था कि कंपनियों को गैर दूरसंचार संबंधी स्रोतो जैसे कि कंपनी द्वारा जमा राशि पर प्राप्त ब्याज, संपत्ति बिक्री से प्राप्त धन आदि का हिस्सा भी सरकार के साथ साझा करना चाहिए।
  • वर्ष 2005 में सेल्युलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ इण्डिया ने सरकार के AGR की परिभाषा को चुनौती दी।
  • वर्ष 2015 में दूरसंचार विवाद समाधान एवं अपील प्राधिकरण (TDSAT) ने इस विवाद को सुनवाई करते हुए कंपनियों के पक्ष में फैसला दिया और कहा कि गैर प्रमुख स्रोतों से प्राप्त राजस्व जैसे कि- किराया, लाभांश, ब्याज, अचल संपत्तियों की ब्रिक्री पर लाभ आदि को AGR से बाहर रखा जाना चाहिए।
  • इसके बाद यह विवाद सुप्रीम कोर्ट पहुँचा। यहां पर सरकार की जीत हुई और कोर्ट ने सरकार की परिभाषा पर सहमती व्यक्त करते हुए 24 अक्टूबर 2019 को कंपनियों को कोर्ट ने आदेश दिया कि- कंपनियों को कुल बकाया AGR बकाया राशि पर जुर्माना और विलंब के लिए जुर्माने पर ब्याज भी देना होगा। इसके लिए कोर्ट ने तीन माह में भुगतान करने का आदेश दिया।
  • इस आदेश के बाद यह संभावना की जा रही थी कि बहुत सी टेलीकॉम कंपनियाँ बंद हो जायेगी। ऐसे में केंद्र सरकार ने दूरसंचार कंपनियों को 20 वर्ष में भुगतान करने का सुझाव मार्च 2020 में कोर्ट के सामने रखा।
  • कोर्ट ने Covid-19 की परिस्थिति को देखते हुए नया आदेश दिया है।
  • सुप्रीम कोर्ट ने दूरसंचार कंपनियों को अपने AGR को चुकाने के लिए 10 वर्ष का समय दिया है।
  • आदेश के तहत दूरसंचार कंपनियों को अपने कुल बकाया AGR की 10 प्रतिशत राशि 31 मार्च 2021 तक जमा करनी होगी।
  • इन 10 वर्षों के दौरान दूरसंचार कंपनियों को और दूर संचार विभाग को प्रतिवर्ष 7 अप्रैल को न्यायालय के आदेश के अनुपालन की रिपोर्ट देनी होगी।
  • दूर संचार कंपनियों के प्रबंध निदेशकों को चार सप्तह के अंदर एक व्यक्तिगत गारंटी देना होगा।
  • वर्तमान समय में दूरसंचार क्षेत्र की कंपनियों का AGR बकाया लगभग 1.4 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है।
  • सर्वाधिक बोझ इसमें एयरटेल, वोडाफोन-आइडिया पर पडेगा । एयरटेल को इसके तहत लगभग 21000 करोड़ रुपये एवं वोडाफोन आइडिया को 58000 करोड़ रुपये देने होंगे।
  • इस ओदश से कंपनियों को समय मिल गया हे जिसमें वह अपना बिजनस बढ़ा सकेंगी तो साथ ही किसी कंपनी की मोनोपोली की संभावना कम होगगी ।
  • 5G सुविधाओं के प्रसार एवं विकास में यह निर्णय सहायक होगा, हालांकि कंपनियों को इतनी बड़ी राशि का भुगतान करने में दिक्कत आयेगी।
  • कुछ समीक्षकों का मानना है कि कंपनियां इस पैसे को ग्राहकों से प्राप्त करने के लिए सेवाएं महंगी कर सकती है।

शार्ली ऐब्दो चर्चा में क्यों है?

  • फ्रांसीसी क्रांति यूरोपीय केक्षेत्रों और फ्रांस के लिए एक बड़ी राजनैतिक और सामाजिक क्रांति थी। जैसा कि किसी भी क्रांति के मूल में होता है, इस क्रांति ने यहां आमूल परिवर्तन (Radical Changes) किये।
  • 1789 से 1799 तक चली इस क्रांति ने राजसत्ता को समाप्त किया और गणतंत्र की स्थापना की ।
  • क्रांतिकारियों ने स्वतंत्रता, समानता एवं भातृत्व की भावना का प्रसार किया और 1789 में नागरिक अधिकारों की घोषण की। इस घोषण में यह कहा गया कि सभी मुनष्य जन्म से समान पैदा होते हैं इसलिए सबको समान अधिकार मिलना चाहिए।
  • यहां से फ्रांस एवं यूरोप के देशों में नागरिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की आजादी की भावना ने तेजी से प्रसार किया।
  • इस समय तक प्रेस का विकास फ्रांस में पर्याप्त हो चुका था इसलिए यहां के प्रबुद्ध वर्ग ने राजशाही वर्ग की विलासित, पतन, भ्रष्टाचार, तानाशाही आदि चीजों से लोगों को परिचित करवाने के लिए कार्टूनों को छापना प्रारंभ किया और लोगों में यह काफी लोकप्रिय भी हुआ।
  • पत्रकारिता की यह शैली फ्रांस के साथ-साथ यूरोप के अन्य देशों में समय के साथ फेलती गई।
  • वर्ष 1960 में फ्रांस में एक मैगजीन शुरू हुई जिसका नाम हारा किरी ऐब्दो था।
  • यह एक व्यंगात्मक पत्रिका थी जो सरकारी अधिकारियों, मंत्रियों, जजों सिलेब्रिटीज़ सब पर व्यंग करती थी।
  • यह धार्मिक मुद्दों पर सटायर छापती थी, धार्मिक मुद्दों की खिल्ली उड़ाती थी, आडंबर और पाखंड पर लेख लिखती थी और ऐसा वह सभी धर्मों के संबंध में करती थी।
  • महिला अधिकारों पर अपना स्टैंड लेकर यह अपने आप को हर तरह से प्रगतिशील साबित करना चाहती थी।
  • 1970 में कुछ विवाद के कारण इस पर (हारा किरी ऐब्दो) प्रतिबंध लगा दिया गया।
  • बैन से बाहर होने के लिए इसने अपना नाम बदल दिया और नया नाम रखा शार्ली ऐब्दो या चार्ली हेब्दो।
  • फिर से इस पत्रिका ने सटायर, व्यंग, कार्टून आदि का प्रकाशन प्रारंभ किया लेकिन लाभजन्य न होने के कारण 1981 में इसका प्रकाशन बंद करना पड़ा।
  • 1992 में यह पुनः प्रारंभ हुआ। लेकिन यह मैगजीन चर्चा में वर्ष 2006 में आई जब इसने अपना एक स्पेशल एडिशन निकाला जिसमें कुछ कार्टून छपे थे और इसका टाइटल था- मुहम्मद पर हावी हुए कट्टरपंथी।
  • 30 सितंबर 2005 को एक डेनमार्क के अखबार ईवलान पोस्टेन ने 12 कार्टून छापे जिसमें कुछ पैगम्बर मुहम्मद से संबंधित थे।
  • इस्लाम के मानने वाले लोगों का मानना है कि पैगंबर को इंसानी रूप देना गलत है, कार्टून तो अस्वीकार्य है।
  • इन कार्टूनों में एक स्कैच भी था जिसमें एक दाढ़ी वाले आदमी की पगड़ी में बम दिखाया गया था। हालांकि यह नहीं लिखा था कि यह पैगम्बर हैं।
  • इसके बाद विवाद वर्ष 2006 में इसने पुनः इनका प्रकाशन किया।
  • इस स्पेशल एडीशन से मैगजीन की पॉलुलरिटी में वृद्धि होने के साथ-साथ विवाद भी बढ़ा।
  • वर्ष 2011 में मैग्जीन ने फिर से स्पेशल अंक निकाला और फिर से विवाद हुआ। मैगिजन के पैरिस दफ्रतर पर बमबारी भी हुई, हालांकि किसी की जान नहीं गई।
  • इस घटना को शार्ली आब्दो ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला माना।
  • सितंबर 2012 में फिर से कार्टून छापा गया और विवाद पहले से ज्यादा बढ़ा।
  • 7 जनवरी 2015 को इसके ऑफीस पर आतंकी हमला हुआ जिसमें 12 लोग मारे गये। यह हमला अल-कायदा की यमन ब्रांच ने करवाया था और बाद में उसने कहा कि ऐसा कर के उसने पैगंबर के अपमान का बदला लिया।
  • नवंबर 2015 में भी इस्लामिक स्टेट के आतंकियों ने पेंरिस में हमला किया जिसमें 130 लोगों की जान गई।
  • शर्ली ऐब्दो ने एक बार फिर पैगंबर मुहम्मद और इस्लाम पर कार्टून छापे हैं। यह वहीं कार्टून्स है जिसके कारण उस पर आतंकी हमला हुआ था।
  • दोबारा छापने का कारण यह है कि 2 सितंबर से शार्ली ऐब्दो टेरर अटैक का कोर्ट ट्रायल शुरू हो रहा है। इसमें 14 लोगों पर मुकदमा चलता है जो आतंकियों की मदद में शामिल थे।
  • मैगजीन के मुताबिक ट्रायल की शुरूआत के मौके पर ये स्कैच न छापना उनकी पत्रकारिता पर डरपोक होने का धब्बा है।
  • इसमें छपने वाले विवादित कार्टून को जीन काबूट ने बनाया था, जिनकी 2015 के हमले में मौत हो गई थी।
  • छापे गये इस अंक के फ्रंट पेज की हेडलाइन- ‘यह सब, बस उसी के लिए’ रखा गया है।