(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) क्या होता है सोनिक बूम? (What is Sonic Boom?)


(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) क्या होता है सोनिक बूम? (What is Sonic Boom?)



ज़रा सोचिये आप घर पर बैठे हैं ...अचानक एक ज़ोर की आवाज़ आती है और घर की खिड़कियों के शीशे तक चटक जाते हैं। सुनने में किसी भयानक घटना से कम नहीं लगता है लेकिन ये हुआ है.... बेंगलुरु में अचानक अजीबो गरीब आवाज आई और लोगों के घरों की खिड़कियां टूट गईं.....इस घटना के बाद शहर में लाखों लोग सहमकर घरो से बाहर आ गए। बाद में इसकी वजह पता चली। यह घटना सोनिक बूम की वजह से हुई थी। ये सोनिक बूम, वायु यानों के काफी तेज़ गति से चलने की वजह से पैदा होती है....

आज के DNS में हम जानेंगे सोनिक बूम के बारे में। साथ ही समझेंगे की क्यों सोनिक बूम की वजह से इतनी तेज़ आवाज़ पैदा होती है।

क्या होता है सनिक बूम?

ध्वनि तरंगों के रूप में चलती है। यह तरंगे आम तौर पर जिस स्त्रोत strot से पैदा होती हैं उनसे बाहर की ओर को चलती हैं....हवा में इन तरंगों की रफ़्तार कई कारकों पर निर्भर करती है जैसे हवा का तापमान और ऊँचाई...किसी रुके हुए स्त्रोत strot से जैसे टेलीविज़न सेट या रेडियो से पैदा होने वाली ध्वनि तरंगे हमेशा बाहर की ओर को चलती है....ये तरंगे सामान केंद्र वाले गोलों के रूप में चलती हैं जिनकी त्रिज्या बाहर की ओर बढ़ती हुई रहती है...इसके उलटे जब आवाज़ किसी चलते हुए माध्यम से निकलती है जैसे ट्रक से तो इससे निकलने वाली तरंगे ट्रक के सामने एक दुसरे के करीब होती जाती है जबकि ट्रक के पीछे ये फैलती जाती हैं। यही वजह होती है डोप्पलर प्रभाव की.......यह देखा गया है कि जब हम ज़्यादा रफ़्तार के साथ ध्वनि के एक स्थिर स्रोत STROT के करीब आते हैं तो ध्वनि की पिच अधिक होती है....और अगर हम ध्वनि के स्रोत से दूर चले जाते हैं तो पिच कम हो जाती है....स्रोत या पर्यवेक्षक की सापेक्षिक गति के कारण तरंगों की पिच या आवृत्ति में यह बदलाव ही डॉपलर प्रभाव के नाम से जाना जाता है...

जब कोई विमान ध्वनि की गति से कम स्पीड से उड़ता है तो उसके द्वारा उत्पन्न प्रेशर डिस्टरबेंस या साउंड सभी दिशाओं में फैल जाती है, लेकिन सुपरसोनिक वेग में दबाव क्षेत्र एक खास इलाके तक सीमित होता है.... ये दबाव क्षेत्र अक्सर विमान के पिछले हिस्से में फैलता है और एक सीमित चौड़े कोन में आगे बढ़ता है जिसे मैक कोन कहा जाता है....

विमान के आगे बढ़ने के साथ ही पीछे की ओर कोन का पैराबोलिक किनारा पृथ्वी से टकराता है और एक जबर्दस्त धमाका या बूम पैदा करता है.....जब इस तरह का विमान काफी लो अल्टीट्यूड में या नीचे उड़ता है, तो यह शॉक वेव इतनी ज्यादा तीव्रता का होता है कि इनसे खिड़कियों के शीशे तक टूट सकते हैं। इस वजह से हमें विस्फोट या बादलों के गड़गड़ाहट जैसी आवाज सुनाई देती है....

जब ऐसे विमान हवा में सुपरसोनिक रफ़्तार से कम ऊँचाई पर उड़ते हैं तो सोनिक बूम की घटना और तीव्र हो जाती है...जिसकी वजह से शीशे तक चटक जाते हैं। इसके अलावा इंसानों की सेहत पर भी इसका बुरा असर देखा जा सकता है....यही वजह है की दुनिया के कई देशों में सुपरसोनिक विमानों को ज़्यादा आबादी वाले क्षेत्रों से उड़ाना प्रतिबंधित है...

सुपरसोनिक उड़ानों का इतिहास

साल 1947 सैंतालिस में अमेरिकी सेना के पायलट चक ईगर ऐसे पहले विमान चालाक बने जिन्होंने बेल एक्स 1 विमान 1127 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से उड़ाकर नया कीर्तिमान बनाया.....उस वक़्त से सुपरसोनिक उड़ानों का चलन शुरू हुआ.....आज उन्नत तकनीकी के दौर में ऐसे विमान आ गए हैं जिन्हे 3 माक या धवनि के वेग से तीन गुनी रफ़्तार से उड़ाया जा सकता है..