(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) गुप्त मतदान (What is Secret Ballot System?)


(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) गुप्त मतदान (What is Secret Ballot System?)



हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए गुप्त मतदान का सिद्धांत एक आधारभूत जरूरत है. सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में गुप्त मतदान इस बात की तस्दीक करता है कि मतदाता अपने मत का प्रयोग करने के लिए पूरी तरह से स्वतंत्र हो.....

डीएनएस में आज हम गुप्त मतदान प्रणाली के बारे में जानेंगे और साथ ही सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के

साल 2018 में, उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जिला पंचायत में पंचायत अध्यक्ष के खिलाफ एक अविश्वास प्रस्ताव पारित किया गया था. इस अविश्वास प्रस्ताव के दौरान जो वोटिंग की गई थी, उसमें सदस्यों ने गुप्त मतदान प्रणाली के सिद्धांतों का पालन नहीं किया था. इसीलिए जिला पंचायत की बैठक के फैसले को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई. उच्च न्यायालय ने 25 अक्टूबर 2018 को इस पंचायत की बैठक के फैसले को रद्द कर दिया. अदालत ने कहा कि अविश्वास प्रस्ताव के खिलाफ किए गए मतदान के दौरान तय नियमों का पालन नहीं किया गया, जिससे मतदान की गोपनीयता भंग हुई थी....

हाईकोर्ट में अपील करने वाले याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि मतपत्रों की गोपनीयता का सिद्धांत कोई पूर्ण सिद्धांत नहीं है. यह एक विशेषाधिकार की तरह है यानी कोई भी सदस्य अपने इस विशेषाधिकार को जब चाहे तब छोड़ सकता है. अपनी बात को साबित करने के लिए याचिकाकर्ताओं ने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 94 का जिक्र किया था... धारा 94 चौरानवे के मुताबिक मतपत्र की गोपनीयता एक विशेषाधिकार की तरह है, इसका पालन करना कोई बाध्य कानून नहीं है.....इलाहाबाद उच्च न्यायालय के इस फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में भी अपील की गई. सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि मतपत्रों की गोपनीयता का सिद्धांत संवैधानिक लोकतंत्र के लिए एक अहम शर्त है. गुप्त मतदान के जरिए स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के मकसद को पाया जा सकता है....

अदालत ने कहा कि जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 94 के मुताबिक गुप्त मतदान एक विशेषाधिकार जरूर है और इसके तहत कोई भी व्यक्ति मतदाता को अपने मत के बारे में खुलासा करने को मजबूर नहीं कर सकता. लेकिन इसका यह मतलब नहीं हुआ कि मतदाता खुद ही यह खुलासा करने का फैसला कर ले कि उसने किसको वोट दिया है. यानी मतदाता खुद भी इस विशेषाधिकार को छोड़ नहीं सकता...भारत में गुप्त मतदान की शुरुआत साल 1951 में पेपर बैलेट के जरिए हुई थी. इस प्रणाली के तहत सभी प्रकार की वोटिंग गुप्त रूप से की जाती है. यानी मतदाता ने किसके पक्ष में वोट दिया है इस बात का खुलासा ना होने पाए. इसका मकसद सिर्फ इतना होता है कि मतदाता किसी अन्य व्यक्ति से प्रभावित ना हो और चुनाव निष्पक्ष और स्वतंत्र हो. दरअसल, आजकल भारतीय चुनाव में चुनाव अभियानों के दौरान पैसे और बाहुबल का इस्तेमाल एक आम बात हो गई है. अक्सर आए दिन ऐसे मामले देखने को मिलते हैं जिसमें मतदाताओं को मजबूर किया जाता है कि वह किसी खास व्यक्ति के पक्ष में ही मतदान करें. अगर मतदाता ऐसा नहीं करता है तो आने वाले समय में उसे तमाम प्रकार के लाभों से वंचित किया जा सकता है. इससे मतदाता काफी प्रभावित होते हैं. ऐसे में, गुप्त मतदान प्रणाली एक मात्र ऐसी व्यवस्था है जिसके जरिए बिना किसी दखलंदाजी के स्वतंत्र और निष्पक्ष वोटिंग की जा सकती है.....

गौरतलब है कि साल 2018 में ही सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दायर कर चुनाव में “टोटलाइजर मशीन” के इस्तेमाल को लेकर निर्देश देने की गुजारिश की गई थी. लेकिन अदालत ने इस याचिका को खारिज कर दिया था....”टोटलाइजर मशीन” मतगणना के वक्त एक निर्वाचन क्षेत्र के सभी ईवीएम से प्राप्त वोटों को एक साथ मिला देती है, इससे मतपत्रों की गोपनीयता बनी रहती है.