(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) शेरों की गिनती का नया तरीका "पूनम अवलोकन" (What is Poonam Avlokan?)


(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) शेरों की गिनती का नया तरीका "पूनम अवलोकन" (What is Poonam Avlokan?)



क्या है यह पूनम अवलोकन?

हाल ही में, प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने ट्विटर के जरिए गुजरात में एशियाई शेरों की तादाद में बढ़ोतरी की खबर को साझा किया और इस सफलता के लिए सामुदायिक सहयोग को इसका श्रेय दिया. इसके अलावा, पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने इसको लेकर टिप्पणी की और इस खुशखबरी को संरक्षण की सफलता बताया. बाघों की संख्या में वृद्धि होना तो एक अच्छी बात है लेकिन इस बार बाघों की संख्या गिनने में "पूनम अवलोकन" की तकनीक खासा चर्चा में रही.

डीएनएस में आज हम आपको "पूनम अवलोकन" के बारे में बताएंगे और साथ ही समझेंगे इससे जुड़े कुछ अन्य पक्षों को भी…….

इस बार बाघों की गणना परंपरागत तरीके से नहीं हुई बल्कि इसके लिए "पूनम अवलोकन" की विधि अपनाई गई यानी पूनम अवलोकन बाघों को गिनने का एक तरीका है. इसमें पूर्णिमा के दिन बाघों का अवलोकन किया जाता है और उसी के आधार पर उनकी संख्या का अंदाजा लगाया जाता है. दरअसल हर 5 साल के अंतराल पर होने वाले बाघों की गणना इस बार मई में होनी थी, लेकिन लॉकडाउन होने की वजह से इसे इस बार टाल दिया गया था. लेकिन बाघों की गिनती करनी भी जरूरी थी इसीलिए सरकार ने "पूनम अवलोकन" विधि का सहारा लिया.

बीते 5 और 6 जून को शेरों के संभावित संख्या की गणना शुरू की गई. इस गणना के मुताबिक जहां मई 2015 में गिर में एशियाई शेरों की संख्या 523 थी तो वहीं अब यह संख्या बढ़कर 674 हो गई है यानी इस बार बाघों की संख्या में तकरीबन 29 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई है. हालांकि इस बीच कई शेरों की मौत भी हो गई थी. अधिकारियों की मानें तो किलनी (टिक) जनित बीमारी यानी "बेबसियोसिस" के चलते बीते 3 महीने में क्षेत्र में तकरीबन दो दर्जन से ज्यादा शेरों की मौत हो चुकी है. और इसके पहले भी 2018 में केनाइन डिस्टेंपर वायरस के चलते लगभग 40 शेर मौत के मुंह में समा गए थे. साल 2010-15 के दौरान इसकी संख्या में 27 फ़ीसदी की वृद्धि हुई थी. आधिकारिक जानकारी के मुताबिक शेरों में 161 नर, 260 मादा, 116 वयस्क शावक और 137 शावक है. इसके अलावा, शेरों के इलाकों में भी 36 फ़ीसदी की वृद्धि हुई है.

सवाल यह उठता है कि परंपरागत गणना और पूनम अवलोकन में आखिर फर्क क्या है? जहां परंपरागत गणना में करीब 2000 कर्मचारियों और इसके अलावा विशेषज्ञ एवं स्वयंसेवकों की जरूरत पड़ती है वहीं पूनम अवलोकन में थोड़े कर्मचारियों और कुछ विशेषज्ञों की मदद से ही काम हो जाता है यानी परंपरागत गणना में पारदर्शिता ज्यादा होती है. इसके अलावा, परंपरागत गणना दो चरणों में की जाती है - प्रारंभिक चरण और अंतिम चरण. जबकि पूनम अवलोकन में पूरी प्रक्रिया एक ही चरण में पूरी की जाती है. इसका मतलब परंपरागत गणना ज्यादा सटीक भी होती है.

गुजरात में सबसे पहले बाघों की गणना साल 1936 में जूनागढ़ के नवाब ने करवाई थी. बाद में, 1965 से वन विभाग हर 5 साल के अंतराल पर लगातार गणना करता आया है लेकिन इस गणना प्रक्रिया में छठवीं सातवीं और एक ग्यारहवीं में जनगणना को अलग-अलग वजहों के चलते कुछ वक्त के लिए रोक दिया गया था. आपको बता दें कि बाघों के संरक्षण के संबंध में जागरूकता फैलाने के लिहाज से हर साल 29 जुलाई को अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस मनाया जाता है. भारत सरकार ने बाघों के संरक्षण के लिए कई कदम उठाए हैं. इस कड़ी में साल 1973 में सरकार ने "प्रोजेक्ट टाइगर" योजना की शुरुआत की थी. इस परियोजना के तहत सरकार अब तक 50 टाइगर रिजर्व बनवा चुकी है. कुल मिलाकर बाघों की संख्या में बढ़ोतरी एक राहत भरी खबर है लेकिन खतरा अभी टला नहीं है.