(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) क्या है ऑक्सीजन थेरेपी और इससे जुड़ा मौजूदा संकट? (What is Oxygen Therapy and associated crisis?)


(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) क्या है ऑक्सीजन थेरेपी और इससे जुड़ा मौजूदा संकट? (What is Oxygen Therapy and associated crisis?)



कोरोना के इस नए रूप ने पूरे देश को हिला दिया है। शायद ही कोई ऐसा घर है जहां कोई खुद या रिश्तेदार या दोस्त इस महामारी से संघर्ष न कर रहा हो। मरीज इतने ज्यादा हो गए हैं कि आईसीयू बेड, दवाओं, रेमडेसिविर इंजेक्शन, ऑक्सीजन और वेंटिलेटर, इन पांचों के लिए देश में त्राहि-त्राहि मच गया है। बेकाबू होते कोरोना संक्रमण के बीच ऑक्सीजन की कमी एक नई मुसीबत बनकर आई है।

डीएनएस में आज हम आपको ऑक्सीजन थेरेपी के बारे में बताएंगे और साथ ही समझेंगे इससे जुड़े कुछ अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं को भी

ऑक्सीजन यानी प्राणवायु एक रंगहीन, स्वादहीन और गंधहीन गैस है। इसकी खोज, प्राप्ति अथवा प्रारंभिक अध्ययन में जे॰ प्रीस्टले और सी॰डब्ल्यू॰ शेले का काफी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। ऑक्सीजन, वायुमंडल में स्वतंत्र रूप में मिलता है और वायुमंडल में इसकी मात्रा लगभग 20.95% होती है। इसके तमाम उपयोगों के अलावा जीवित प्राणियों के लिए ऑक्सीजन बेहद जरूरी है। इंसानों में भोजन से ऊर्जा प्राप्त करने में ऑक्सीजन सहायक होती है, और वे इसे सांस के जरिए ग्रहण करते हैं।

सिलेंडर में ऑक्सीजन एकत्रित करना इतना आसान नहीं होता है जितना यह सुनने में लगता है। इस उद्योग के विशेषज्ञों के अनुसार, शुद्ध ऑक्सीजन को इकट्ठा करने के लिए एक विशेष तकनीक को वायुमंडल से ऑक्सीजन को अलग करने के लिए तैनात किया जाता है, जिससे वायुमंडलीय वायु का सेपरेशन और डिस्टिलेशन होता है। एक बार ऑक्सीजन एकत्र होने के बाद इसकी जांच की जाती है और विभिन्न ग्रेड में पैक किया जाता है। फिर इन ग्रेडों को कई श्रेणियों में विभाजित किया जाता है, जैसे वेल्डिंग ऑक्सीजन, एविएशन ब्रीदिंग ऑक्सीजन, रिसर्च ग्रेड ऑक्सीजन और मेडिकल ऑक्सीजन।

मेडिकल ऑक्सीजन का उपयोग क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी), साइनोसिस, शॉक, रक्तस्राव, कार्बन मोनोऑक्साइड विषाक्तता, प्रमुख आघात या हृदय और श्वसन अरेस्ट जैसी गंभीर स्थितियों में किया जाता है। गौरतलब है कि कोविड-19 से गंभीर रूप से प्रभावित व्यक्तियों में इसका वायरस फेफड़ों को संक्रमित करता है, जिसकी वजह से एक्यूट रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम और निमोनिया का खतरा हो जाता है और मृत्यु तक हो जाती है। फेफड़ों पर इसके प्रभाव के कारण शरीर में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है इस कारण रोगियों को तुरंत वेंटिलेटर के जरिए ऑक्सीजन थेरेपी दी जाती है।

इस तरह ऑक्सीजन थेरेपी इलाज का एक तरीका है जिसमें मरीजों को जब सांस लेने में मुश्किल होने लगती है तो उन्हें अतिरिक्त (पूरक) ऑक्सीजन दिया जाता है। जब कोई बीमार मरीज खुद से सांस के जरिए सही तरीके से ऑक्सीजन नहीं ले पाता है तो उन्हें ये थेरेपी दी जाती है। कोविड-19 के मरीज जिनमें बीमारी के गंभीर लक्षण हो जाते हैं, जिन्हें सांस लेने में मुश्किल होने लगती है, हाइपोक्सिया यानी शरीर में ऑक्सीजन की कमी होने लगती है, ऐसे मरीजों को भी ऑक्सीजन थेरेपी दी जाती है। इस थेरेपी की मदद से मरीज के शरीर में ब्लड ऑक्सीजन का लेवल बढ़ने लगता है और मरीज को बेहतर महसूस होता है।

लेकिन बढ़ते कोरोना मरीज और अव्यवस्था के चलते देश में ऑक्सीजन संकट पैदा हो गया है। इसी को देखते हुए केंद्र सरकार ने कोरोना के लिए जरूरी मेडिकल उपकरणों की जांच और सप्लाई के लिए एक ग्रुप बनाया है। Empowered Group-2 नाम का ये समूह ऑक्सीजन की कमी से जूझ रहे 12 राज्यों पर खास ध्यान दे रहा है, जो कोरोना संक्रमण की सबसे ज्यादा मार झेल रहे हैं। ये राज्य हैं- महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, छत्तीसगढ़, केरल, तमिलनाडु, पंजाब और हरियाणा। बता दें कि चिकित्सा के अलावा कई दूसरे उद्योगों को भी लगातार ऑक्सीजन की जरूरत होती है। हालांकि, गहराते संकट के बीच इस कमेटी ने बहुत से उद्योगों के लिए फिलहाल इसकी आपूर्ति रोकने का फैसला लिया है। आज यानी 22 अप्रैल से ज्यादातर उद्योगों को ऑक्सीजन की आपूर्ति नहीं होगी। केवल कुछ ही उद्योगों को इससे छूट मिली है। ये कदम इसलिए उठाया गया है ताकि जितनी ऑक्सीजन बने, सारी ही मेडिकल जरूरत में लगाई जा सके।

अब एक नजर ऑक्सीजन उत्पादन और इसकी आपूर्ति से जुड़ी बातों पर डाल लेते हैं। देश रोजाना 7,000 मीट्रिक टन ऑक्सीजन बना सकता है। इनमें सबसे बड़ी कंपनी आईनॉक्स (Inox) रोज 2000 टन ऑक्सीजन बना लेती है। ऑक्सीजन बनाने वाली कंपनियां लिक्विड ऑक्सीजन बनाती हैं, जिसकी शुद्धता 99.5% होती है। इसे विशाल टैंकरों में जमा किया जाता है, जहां से वे अलग टैंकरों में एक खास तापमान पर डिस्ट्रीब्यूटरों तक पहुंचते हैं। डिस्ट्रिब्यूटर के स्तर पर तरल ऑक्सीजन को गैस के रूप में बदला जाता है और सिलेंडर में भरा जाता है, जो सीधे मरीजों के काम आते हैं।

मुश्किल यह है कि हमारे यहां पर्याप्त संख्या में क्रायोजेनिक टैंकर नहीं हैं, यानी वे टैंकर जिनमें कम तापमान पर तरल ऑक्सीजन स्टोर होती है। इसके अलावा मेडिकल ऑक्सीजन को नियत जगह तक पहुंचाने के लिए सड़क व्यवस्था भी उतनी दुरुस्त नहीं। ऐसे में छोटी जगहों, जहां ऑक्सीजन के स्टोरेज की व्यवस्था नहीं है, वहां मरीजों को ऑक्सीजन की कमी होने पर जीवन का संकट बढ़ जाता है, क्योंकि ऑक्सीजन पहुंचने में समय लगता है। हालांकि महामारी के दौरान औद्योगिक ऑक्सीजन बनाने वाली कई कंपनियों को मेडिकल ऑक्सीजन बनाने की मंजूरी दी गई है। उम्मीद है कि यह कदम थोड़ी मददगार साबित होगी। लेकिन सबसे जरूरी बात यह है कि हमें कोरोना को लेकर जरा सी भी लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए। इसके लिए जो भी जरूरी प्रोटोकोल हैं उनका हमें जरूर पालन करना चाहिए।