(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) क्या है IPOI जिसका हिस्सा बना है फ्रांस? (What is IPOI?)


(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) क्या है IPOI जिसका हिस्सा बना है फ्रांस? (What is IPOI?)



हाल ही में भारत और फ्रांस ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में आपसी सहयोग को मजबूत करने के लिए एक वार्ता संपन्न की है। इस वार्ता के दौरान फ्रांस ने भारत की हिंद-प्रशांत महासागर पहल यानी आईपीओआई का हिस्सा बनने का भी फैसला किया है। भारत और फ्रांस ने 13 अप्रैल को हुई बातचीत में ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर त्रिपक्षीय सहयोग करने, समुद्र तथा अंतरिक्ष में उभरती हुई चुनौती का सामना करने और जलवायु परिवर्तन तथा जैव विविधता संरक्षण पर साथ मिलकर काम करने की बात कही।

डीएनएस में आज हम आपको हिंद-प्रशांत महासागर पहल के बारे में बताएंगे और साथ ही समझेंगे इससे जुड़े कुछ अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं को भी

इंडो-पैसिफिक ओशन इनिशिएटिव (IPOI) का सुझाव सबसे पहले प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 14वें पूर्वी एशियाई शिखर सम्मेलन के दौरान पेश किया गया था। इस पहल का उद्देश्य पड़ोसी और एक समान सोच रखने वाले दशों के साथ मिलकर समुद्री सीमाओं को मजबूत करना है। निर्बाध व्यापार और समुद्री संसाधनों के सतत उपयोग के सिद्धांत पर आधारित इस साझेदारी को काफी बढ़ावा दिया जा रहा है। यह भारत के सागरीय पड़ोसियों के साथ क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा देने के मक़सद से शुरू की गई SAGAR मिशन का भी हिस्सा है।

भारत ने हिंद महासागर और हिंद प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा के लिए जागरूकता, सतर्कता और साथ ही अप्रत्यक्ष चेतावनी के देने के मकसद से तमाम बड़ी शक्तियों के साथ मिलकर मालाबार और रिमपैक जैसे सैन्य अभ्यासों को संपन्न किया है। इन सब अभ्यासों से महासागरीय संसाधनों के ग़ैरक़ानूनी दोहन की कुछ राष्ट्रों की आदत को सबक सिखाने का अवसर मिलता है। लेकिन सवाल ये उठता है कि हिंद-प्रशांत महासागर जैसे पहल की ज़रूरत क्यों पड़ रही है?

दरअसल मौजूदा वक़्त में पश्चिमी हिंद महासागर के पॉलीमेटालिक सलफाइडों के का पता लगाने और इसका दोहन करने पर चीन की निगाह लगी हुई है। समुद्री रास्ते से संकीर्ण मलक्का जलडमरूमध्य तक अपनी आपूर्तियों के लिए चीन अंडमान सागर को एक चोक प्वाइंट के रूप में देखता है। इसलिए अंडमान सागर में रूल बेस्ड इंटरनेशनल ऑर्डर, फ्रीडम ऑफ नेविगेशन जैसी बातों को चीन बर्दाश्त नहीं कर पाता। चीन दक्षिण एशिया के राष्ट्रों श्रीलंका, पाकिस्तान और बांग्लादेश में अपनी उपस्थिति बढ़ाकर अपने लिए वैकल्पिक समुद्री और स्थल आधारित आपूर्ति मार्ग के निर्माण की मंशा रखता है और इसके लिए सक्रिय भी है। इसके साथ ही मध्य पूर्व से चीन तक ऊर्जा आपूर्ति में मलक्का स्ट्रेट की भूमिका किसी से छुपी नहीं है। यही कारण है कि चीन की ईरान से भी दोस्ती लगातार बढ़ रही है। दोनों ने अभी 25 वर्षीय सहयोग समझौते पर भी हस्ताक्षर किया है। इंडो पैसिफिक क्षेत्र में चूंकि पूर्वी अफ्रीकी देश भी आते हैं और पूर्वी अफ्रीकी देशों में भी चीन लगातार अपनी आर्थिक कूटनीतिक पहुंच को बढ़ाने के प्रयास में लगा हुआ है। इस लिहाज से भी हिंद महासागर क्षेत्र की सुरक्षा, स्थिरता का प्रश्न संवेदनशील हो जाता है। अभी तक अमरीका की रुचि तेल पर नियंत्रण रखने की थी। लेकिन, शेल गैस और दूसरी खोजों के बाद अमरीका तेल का नेट एक्सपोर्टर बन गया है। ऐसे में, उसकी तेल पर निर्भरता कम हुई है। इससे मध्य पूर्व पर एनर्जी के लिए उसकी निर्भरता कम हुई है। और इस इलाके की अहमियत अमरीका के लिए घट गई है। दूसरी ओर, चीन के लिए तेल का मुख्य जरिया मध्य पूर्व ही है। इस लिहाज से चीन की हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती रुचि पर लगाम लगाना राष्ट्रों के लिए जरूरी हो गया है।

अब एक नज़र ज़रा क्वाड पर डाल लेते हैं कि ये क्या है। पिछले कुछ दशकों से, चीन अपने विस्तारवादी सोच और पड़ोसी देशों के प्रति आक्रामक रवैया रखने के लिए बदनाम हो चुका है। इसके अलावा, चीन की सुपर पावर बनने की आकांक्षा दूसरे देशों के मन में कई तरह के सवाल पैदा करती है। शायद यही वजह है कि चीन को प्रतिसंतुलित करने के लिहाज से कई संगठन अस्तित्व में आए हैं और इसी में एक है क्वॉड. क्वॉड यानी 'द क्वॉड्रिलैटरल सिक्‍यॉरिटी डायलॉग' इसके 4 सदस्य देश हैं जिनमें जापान, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और भारत शामिल हैं। इसका मकसद हिंद प्रशांत क्षेत्र में शांति बनाए रखना और चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकना है।