(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) क्या है बेलगाम सीमा विवाद (What is Belgaum Border Dispute?)


(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी)  क्या है बेलगाम सीमा विवाद (What is Belgaum Border Dispute?)


पिछले कुछ दिनों से कर्नाटक और महाराष्ट्र राज्य की सीमा पर तनाव जैसे माहौल है। इन दोनों राज्यों के बीच ये तनाव दशकों से चले आ रहे बेलगाम ज़िले पर अधिकार को लेकर पैदा हुआ है। एक ओर जहां महाराष्ट्र इस इलाके में रहने वाले मराठी भाषी बहुसंख्यकों की वजह से इसे अपनी सीमा शामिल कराने की कोशिशें करता आया है तो वहीं कर्नाटक अपनी सीमा में आने वाले बेलगाम ज़िले को कतई छोड़ने को राज़ी नहीं है। दरअसल ये दशकों पुराना विवाद इसलिए सुर्ख़ियों में है क्यूंकि बीते दिनों एक कन्नड़ संगठन ने महाराष्ट्र एकीकरण समिति पर बेलगाम को लेकर कुछ टिप्पणी की थी।

DNS में आज हम समझेंगे कि बेलगाम विवाद क्या है और इसकी जड़ें कहां से जुडी हैं ?

कर्नाटक और महाराष्ट्र के बीच चल रहा ये विवाद दशकों पुराना है। आज़ादी मिलने के बाद बेलगाम को बॉम्बे स्टेट का हिस्सा बनाया गया। लेकिन जब साल 1956 में देश में भाषा के आधार पर राज्यों का गठन किया जा रहा था तो उस दौरान बेलगाम को संयुक्त महाराष्ट्र में शामिल करने की मांग उठी। इसके लिए कई आंदोलन हुए। उस समय की एक मुश्किल ये भी थी गुजरात बॉम्बे स्टेट पर अपना हक़ जता रहा था। ऐसे में बॉम्बे स्टेट को केंद्र शासित प्रदेश बनाए जाने की बातें चल रही थी। लेकिन हुआ ये कि आज की मुंबई यानी तब के बॉम्बे स्टेट को महाराष्ट्र राज्य की राजधानी बना दिया गया। ऐसे में तमाम मराठी भाषी इलाक़े जो उस वक़्त के मैसूर स्टेट में रह गए वो साल 1973 में बने कर्नाटक राज्य का हिस्सा हो गए। इन तमाम इलाकों में बेलगाम इलाका भी शामिल था जिसको लेकर तब से आज तक कई विवाद सामने आते रहें हैं।

दोनों राज्यों के बीच बेलगाम इलाक़े के विवाद को देखते हुए साल 1957 में केंद्र सरकार ने महाराष्ट्र राज्य की मांग पर महाजन समिति गठित की। हालाँकि ये समिति इस विवाद का कोई ख़ास हल नहीं निकाल पाई। महाराष्ट्र एकीकरण समिति बेलगाम इलाके को महाराष्ट्र में शामिल कराने कोशिशों में लगी हुई थी। इसके अलावा स्वतंत्रता सेनानी रहे सेनापती बापट के भूख हड़ताल ने इस आंदोलन को और तेज़ कर दिया। आंदलोन कर रहे लोगों को मांग थी कि बेलगांव समेत 865 गांवों को महाराष्ट्र में शामिल किया जाए।

इसके बाद एक बार से महाराष्ट्र राज्य के आग्रह पर, भारत सरकार ने 25 अक्टूबर 1966 को महाजन आयोग का गठन किया। तत्कालीन महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री वी.पी नाइक ने 9 नवंबर 1967 को इस बात का सार्वजनिक रूप से ऐलान भी किया कि महाराष्ट्र परिणाम की परवाह किए बग़ैर महाजन आयोग की रिपोर्ट का पालन करेगा। आयोग ने, महाराष्ट्र के दावों की समीक्षा कर दोनों राज्यों के बीच बेलगाम जिले के कई गांवों के आदान-प्रदान की सिफारिश की।

लेकिन महाजन आयोग ने बेलगाम शहर पर महाराष्ट्र के दावे को खारिज कर दिया। बेगलाम विवाद पर आई महाजन आयोग की इस रिपोर्ट को महाराष्ट्र सरकार ने अपने ऐलान के बावजूद भी इसे मानने से इंकार कर दिया और तभी से बेलगाम इलाका महाराष्ट्र और कर्नाटक के बीच तनाव पैदा करता आया है।

बेलगाम इलाके को लेकर महाराष्ट्र एकीकरण समिति और कन्नड़ रक्षण वेदिके संगठन के बीच कई हिंसक झड़पें भी हुई है। तब से लेकर अब तक दोनों राज्यों में आई कई सरकारें बेलगाम पर अपना हक़ जताती रहीं है। इस मामले को लेकर महाराष्ट्र साल 2006 में सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचा। महाराष्ट्र के इस क़दम से को देखते हुए कर्नाटक ने 2006 में ही बेलगांव को उपराजधानी का दर्जा दे दिया। इतना ही नहीं कर्नाटक सरकार ने बेलगांव का नाम बदलकर अब 'बेलगांवी' कर दिया जिसको लेकर भी कई आंदोलन हुए। देखा जाए तो आज भी बेलगाम और इससे सटे कई इलाक़े को लेकर महाराष्ट्र और कर्नाटक के बीच सर्वोच्च न्यायालय में कानूनी लड़ाई जारी है। इसके अलावा महाराष्ट्र सरकार ने साल 2019 के आखिर में कर्नाटक सरकार के साथ सीमा विवाद से जुड़े मामलों पर बातचीत तेज़ करने के प्रयासों की समीक्षा के लिये दो मंत्रियों को ‘समन्वयक’ भी बनाया है।

बात अगर बेलगाम के ऐतिहासिक महत्त्व की हो तो कर्नाटक का बेलगाम शहर ऐतिहासिक रूप से काफी अहम माना जाता है। साल 1924 में हुआ कॉन्ग्रेस का अधिवेशन बेलगाम में ही हुआ था जिसकी अध्यक्षता महात्मा गांधी ने की था। इसके अलावा बेलगाम से ही लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने साल 1916 में अपना ‘होम रूल लीग‘ आंदोलन शुरु किया था।

बेलगाम विवाद के हल की बात की जाए तो मौजूदा वक़्त में सरकारों को क्षेत्रवाद के स्वरूप को समझना सबसे ज़रूरी है। क्यूंकि यदि ये विवाद सिर्फ विकास की मांग तक ही सीमित है तो ठीक है। लेकिन अगर इस विवाद से क्षेत्रीय टकराव को बढ़ावा मिलता है तो इसे रोकने की सख़्त ज़रूरत है। मौजूदा वक़्त में देखा गया है कि क्षेत्रवाद संसाधनों पर अधिकार जमाने और विकास की चाह के कारण ज़्यादा बढ़ा है। ऐसे में ज़रूरत इस बात की है विकास योजनाओं की पहुंच दूर तक तो जिससे सम-विकासवाद यानी Equal Evolutionism बढ़े और असल मायनों में यही क्षेत्रवाद के विस्तार का सही तरीका भी हो सकता है।