(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) वार्ली लोक चित्रकला (Warli Folk Painting)


(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) वार्ली लोक चित्रकला (Warli Folk Painting)



भारतीय कलाओं की विरासत संस्कृत की तरह प्राचीन है तथा विविधताओं से भरी है....भारतीय कलाओं के स्वरूप में वास्तुकला, मूर्तिकला, चित्रकला, संगीतकला, नृत्यकला एवं साहित्यकला प्रमुख हैं....कला मानव जीवन की अभिव्यक्ति है... कला किसी भी संस्कृति एवं विचारधारा का प्रतीक है....उसकी पहचान है....जहाँ भारतीय संस्कृति में कला की समृद्ध विरासत रही है...वहीँ भारत की समृद्ध कला परंपरा में लोक कलाओं का गहरा रंग है...

आज DNS कार्यकम में चलिए जानते है...कहानियों की कला एक लोककला वारली....के बारे में, जो महाराष्‍ट्र की वार्ली जनजाति की रोजमर्रा की जिंदगी और सामाजिक जीवन का सजीव चित्रण है...

महाराष्‍ट्र जो अपनी वार्ली लोक चित्रकला के लिए प्रसिद्ध है....वार्ली एक बहुत बड़ी जनजाति है जो पश्‍चिमी भारत के मुम्‍बई शहर के उत्तरी बाह्मंचल में बसी है....भारत के इतने बड़े महानगर के इतने पास बसे होने के बावजूद वार्ली के आदिवासियों पर आधुनिक शहरीकरण का कोई प्रभाव नहीं पड़ा .... 1970 के प्रारम्‍भ में पहली बार वार्ली कला के बारे में पता चला....

हालांकि इसका कोई लिखित प्रमाण तो नहीं मिलता कि इस कला का प्रारंभ कब हुआ....लेकिन दसवीं सदी ई.पू. के आरम्भिक काल में इसके होने के संकेत मिलते हैं....वार्ली, महाराष्ट्र् की वार्ली जनजाति की रोजमर्रा की जिंदगी और सामाजिक जीवन का सजीव चित्रण है....यह चित्रकारी वो मिट्टी से बने अपने कच्चे् घरों की दीवारों को सजाने के लिए करते थे। लिपि का ज्ञान नहीं होने के कारण लोक वार्ताओं (लोक साहित्यर) के आम लोगों तक पहुंचाने का यही एकमात्र साधन था....

मधुबनी की चटकीली चित्रकारी के मुकाबले यह चित्रकला बहुत साधारण है...चित्रकारी का काम मुख्यी रूप से महिलाएं करती है। इन चित्रों में पौराणिक पात्रों, अथवा देवी-देवताओं के रूपों को नहीं दर्शाया जाता बल्कि सामाजिक जीवन के विषयों का चित्रण किया जाता है। रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी घटनाओं के साथ-साथ मनुष्यों और पशुओं के चित्र भी बनाए जाते हैं जो बिना किसी योजना के, सीधी-सादी शैली में चित्रित किए जाते हैं....

महाराष्ट्र की जनजातीय चित्रकारी का यह कार्य परम्परागत रूप से वार्ली के घरों में किया जाता है....मिट्टी की कच्ची दीवारों पर बने सफेद रंग के ये चित्र प्रागैतिहासिक गुफा चित्रों की तरह दिखते हैं और सामान्य्त: इनमें शिकार, नृत्य, फसल की बुवाई, फसल की कटाई करते हुए व्यंक्ति की आकृतियां दर्शाई जाती हैं...

कागज़ पर की गई वार्ली चित्रकारी काफी लोकप्रिय हो गई है और अब पूरे भारत में इसकी बिक्री होती है। आज, कागज़ और कपड़े पर छोटी-छोटी चित्रकारी की जाती है पर दीवार पर चित्र अथवा बड़े-बड़े भित्ति चित्र ही देखने में सबसे सुन्दकर लगते हैं जो वार्लियों के एक विशाल और जादुई संसार की छवि को प्रस्तुकत करते हैं। वार्ली आज भी परम्परा से जुड़े हैं लेकिन साथ ही वे नए विचारों को भी ग्रहण कर रहे हैं जो बाज़ार की नई चुनौतियों का सामना करने में उनकी मदद करते हैं...

वारली जाति में माश नामक व्यक्ति ने इस कला को व्यावहारिक रूप दिया। उसने वारली लोककला को महाराष्ट्र से बाहर ले जाने की हिम्मत दिखाई और इस कला में अनेक प्रयोग किए। उन्होंने लोक कथाओं के साथ-साथ पौराणिक कथाओं को भी वारली शैली में चित्रित किया। वाघदेव, धरती मां और पांडुराजा के जीवन काल को भी वारली शैली में चित्रित किया। उन्होंने वारली में आधुनिकता का समावेश किया।

मिट्टी, गोंद के मिश्रण के साथ-साथ काम ज्यादा टिकाऊ बनाने के लिए उन्होंने ब्रुश और औद्योगिक गोंद का प्रयोग किया। इस प्रयोग से वारली कलाकृतियों को नए आयाम मिले और उनकी अंतर्राष्ट्रीय लोकप्रियता बढ़ने के साथ ही वारली जन जाति का आर्थिक स्तर भी सुधरने लगा। आज माश के अतिरिक्त शिवराम गोजरे और शरत वलघानी जैसे कलाकार इस दिशा में कार्य कर रहे हैं ये लोग कागज़ और कैनवस पर पोस्टर रंग इस्तेमाल कर रहे हैं...वारली कलाकृतियों की यात्रा गोबर मिट्टी की सतह वाली दीवार से शुरू हो कर आज कैनवस तक आ पहुंची है...जो वारली जनजाति के सरल जीवन को दर्शाती है....