(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) यूपी सार्वजनिक संपत्ति क्षतिपूर्ति अध्यादेश (UP Recovery of Damage to Public and Private Property Ordinance 2020)


(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) यूपी सार्वजनिक संपत्ति क्षतिपूर्ति अध्यादेश (UP Recovery of Damage to Public and Private Property Ordinance 2020)



दंगा फसाद आगज़नी, ये सब सुनते ही आम जनता सिहर उठती है…जहाँ ये सब घटनाएं रोज़मर्रा की आम गतिविधियों पर बुरा असर डालती हैं, तो वहीं इसकी आमद से सार्वजनिक सम्पत्तियों, बुनियादी सेवाओं पर बुरा असर डालती हैं । दंगे फसाद में उग्र भीड़ कई सरकारी सम्पत्तियों को नुक्सान पहुंचाती है तो वहीं निजी सम्पत्तियां भी इससे अछूती नहीं रहती हैं । सरकारी और निजी सम्पत्तियों के नुक्सान से हरसाल सरकार को जहाँ लाखों रुपये का नुक्सान होता है वहीं ये घटनाएं कानून व्यवस्था पर भी बड़ा सवाल उठाती हैं।

नागरिकता संशोधन कानून को लेकर हाल ही में देश की राजधानी दिल्ली समेत देश के कई राज्यों में विरोध प्रदर्शन हुए , मकानों दुकानों और कई सार्वजनिक सम्पत्तियों को नुक्सान पहुँचाया गया । लेकिन अब उत्तर प्रदेश की सरकार ने इन गतिविधियों पर लगाम लगाने के लिए कमर कास ली है।

उत्तर प्रदेश में राजनीतिक जुलूस, प्रदर्शन, हड़ताल व बंद के दौरान सरकारी व निजी संपत्ति को क्षति पहुंचाने वालों पर अब नकेल कसी जाएगी । इन लोगों को अब इन सम्पातियों को नुक्सान पहुँचाने के लिए क्षतिपूर्ति देनी होगी। आपको बता दें की यूपी सरकार ने 13 मार्च को कैबिनेट की बैठक में धरना, प्रदर्शन और बंद के नाम पर सार्वजनिक और निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वाले उपद्रवियों से नुकसान की भरपाई करने वाले अध्यादेश के ड्राफ्ट पर मुहर लगा दी। उत्तर प्रदेश रिकवरी ऑफ डैमेज टू पब्लिक एंड प्राइवेट प्रॉपर्टी) अध्यादेश 2020 में ये प्रावधान किया गया है कि, प्रदर्शन के नाम सरकारी या निजी संपतियों की तोड़फोड़, आगजनी से होने वाले नुकसान की भरपाई प्रदर्शन करने वाले दोषी व्यक्तियों से की जायेगी। हालांकि अभी विधानसभा सत्र नहीं है लिहाजा यूपी सरकार ने अध्यादेश के ज़रिये इस कानून पर अपनी मोहर लगाई है । गौर तलब है लखनऊ में CAA के खिलाफ प्रदर्शन में हिंसा फैलाने व संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वालों से क्षतिपूर्ति की वसूली के लिए पोस्टर उत्तर प्रदेश सरकार ने पोस्टर लगाए थे जिस पर उच्च न्यायलय ने उत्तर प्रदेश सरकार पर नाराज़गी ज़ाहिर की थी ।हाईकोर्ट के आदेश और सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का संज्ञान लेते हुए राज्य सरकार अब कानून बनाने की दिशा में बढ़ रही है….

इस अध्यादेश के मुताबिक़ राज्य सरकार एक सेवा निवृत्त जिला जज की अध्यक्षता में क्लेम ट्रिब्यूनल बनाएगी। इसके फैसले को किसी भी अन्य न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकेगी। इतना ही नहीं, ट्रिब्यूनल को आरोपी की संपत्ति ज़ब्त करने का अधिकार होगा। साथ ही वह अधिकारियों को आरोपी का नाम, पता व फोटोग्राफ प्रचारित-प्रसारित करने का आदेश दे सकेगा कि आम लोग उसकी संपत्ति की खरीदारी न कर सकें …

अध्यादेश के मुताबिक ट्रिब्यूनल में अध्यक्ष के अलावा एक सदस्य भी होगा। यह सहायक आयुक्त स्तर का अधिकारी होगा। ट्रिब्यूनल नुकसान के आकलन के लिए क्लेम कमिश्नर की तैनाती कर सकेगा। वह क्लेम कमिश्नर की मदद के लिए प्रत्येक जिले में एक-एक सर्वेयर भी नियुक्त कर सकता है, जो नुकसान के आकलन में तकनीकी विशेषज्ञ की भूमिका निभाएगा।

इस ट्रिब्यूनल को दीवानी न्यायालय का पूरा अधिकार होगा और यह भू-राजस्व की तरह क्लेम वसूली का आदेश दे सकेगा। उत्तर प्रदेश सरकार के अनुसार इस अध्यादेश के कानून बनने से सार्वजनिक संपत्ति व निजी संपत्ति की बेहतर सुरक्षा हो सकेगी।

जुर्माना लगाने से मुआवजा देने तक का अधिकार

अध्यादेश में हड़ताल, बंद, दंगा, सार्वजनिक हंगामा, विरोध या इस संबंध में सार्वजनिक या निजी संपत्ति को क्षति पहुंचाने की रोकथाम से लेकर जुर्माना, संपत्ति के दावों को लागू करने, न्यायाधिकरण को नुकसान की जांच और वहां से संबंधित मुआवजा देने का प्रावधान है।

अध्यादेश के कानूनी पहलुओं पर सवालिया निशान

इस अध्यादेश में कुछ मुद्दे ऐसे हैं जिन पर अभी भी संज्ञान लेने की ज़रुरत महसूस की जा रही है । इस पर सबसे बड़ा सवाल ये उठ रहा है कि जब उत्तर प्रदेश सरकार ने दोषियों के पोस्टर लगाने की कार्रवाई की तब इसे आधार देने के लिए कोई कानून मौजूद नहीं था। इसी मुद्दे को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी राज्य सरकार के इस कदम को सवालों के घेरे में लिया था । इसके अलावा यह सवाल सुप्रीम कोर्ट में भी उठाया गया । इन्ही सब सवालों के चलते उत्तर प्रदेश सरकार ने अध्यादेश का सहारा लिया है । लेकिन संविधान के अनुच्छेद 20 का खंड (1) एक्स पोस्ट फैक्टो कानून के खिलाफ व्यक्तियों की सुरक्षा करता है, जिसका मतलब है कि इस कानून के अधिनियमन से पहले किए गए कार्यों के लिए किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है।जब उत्तर प्रदेश सरकार ने दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की थी तो उस समय ऐसा कोई कानून मौजूद नहीं थे जिसके चलते अब सरकार को कानून बनने के बाद दोषियों को कानून बनने के बाद कार्रवाई करने में कानूनी अड़चन हो सकती है।

पार्लियामेंट व असेंबली को कानून लाने का अधिकार है। किसी भी अपराध में दंड अपराध के समय प्रभावी कानून के तहत निर्धारित होता है। अधिसूचना जारी होने की तारीख से ही नए कानून को प्रभावी माना जाता है।

हालांकि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा उठाया गया ये कदम कानून व्यवस्था को कायम करने की दिशा में एक सराहनीय प्रयास माना जा रहा है।

सार्वजनिक और निजी संपत्ति की सुरक्षा का उत्तर दायित्व राजसरकारों का होता है। इसके नष्ट होने की दशा में सरकार क्षतिपूर्ति के लिए वाज़िब कदम उठा सकती है लेकिन इसके साथ ही कानून को लागू करने की दिशा में संविधान द्वारा प्रदात्त अधिकारों का भी उल्लंघन नहीं होना चाहिए।