(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) चुनाव सुधारक : टी. एन. शेषन (T. N. Sheshan : Man Behind Election Reforms)


(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) चुनाव सुधारक : टी. एन. शेषन (T. N. Sheshan : Man Behind Election Reforms)


महत्वपूर्ण बिंदु

बीते 10 नवंबर को निर्वाचन आयोग को एक अलग ऊंचाई तक ले जाने वाले शख्स और पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन का निधन हो गया। श्री शेषन 87 साल के थे। वे 1990 से 1996 तक मुख्य चुनाव आयुक्त रहे। शेषन अक्सर मजाक में कहते थे कि मैं नाश्ते में राजनीतिज्ञों को खाता हूं।

डीएनएस में आज हम आपको टीएन शेषन के बारे में बताएँगे। साथ ही उनके द्वारा लागू चुनाव सुधारों के बारे में भी चर्चा करेंगे।

टी एन शेषन का जन्म 15 दिसंबर 1932 को केरल के पलक्कड़ जिले के तिरुनेलै नामक स्थान में हुआ था। इनका पूरा नाम तिरुनेलै नारायण अइयर शेषन था। वे छह भाई-बहनों में सबसे छोटे थे और उनके पिता पेशे से एक वकील थे। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा बेसल इंजीलिकल मिशन हायर सेकेंडरी स्कूल से पूरी करने के बाद गवर्नमेंट विक्टोरिया कॉलेज, पलक्कड़ से इंटरमीडिएट पास किया। उसके बाद मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज से भौतिकी में स्नातक स्नातक करके उन्होंने वहीँ पर बतौर लेक्चरर सेवा देना प्रारंभ किया।

साल 1953 में, उन्होंने मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज छोड़ दिया और 1955 में भारतीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षा पास कर तमिलनाडु कैडर ज्वाइन कर लिया। सिविल सेवा में आने के बाद वे हार्वर्ड विश्वविद्यालय में अध्ययन करने चले गए जहाँ उन्होंने पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में पोस्टग्रेजुएशन की डिग्री हासिल की। सिविल सेवा में रहते हुए उन्होंने कई विभागों और मंत्रालयों में काफी उम्दा काम किया जिसके लिए उन्हें काफी ख्याति मिली। साल 1989 में उन्होंने 18वें कैबिनेट सचिव के रूप में पदभार संभाला। कैबिनेट सचिव भारतीय सिविल सेवा में सबसे ऊंची पदवी मानी जाती है। उसके बाद उन्हें योजना आयोग में स्थानांतरित कर दिया गया।

साल 1990 में उन्हें 10वें मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में नियुक्त किया गया और वे 12 दिसंबर 1990 से 11 दिसंबर 1996 तक इस पद पर बने रहे। इस दौरान शेषन ने चुनावी संस्कृति में चल रहे क़रीब सौ से अधिक गड़बड़ियों और कुप्रथाओं में सुधार किया। इसमें चुनाव आचार संहिता लागू करना, मतदाताओं के लिए मतदाता पहचान पत्र जारी करना, चुनाव के उम्मीदवारों के खर्च की सीमा तय करना और जिस राज्य में चुनाव हो रहा हो वहां दूसरे राज्यों के चुनाव अधिकारियों की नियुक्त करना जैसे अहम कदम शामिल हैं। उन्होंने मतदाताओं को रिश्वत देने या डराने, चुनाव के दौरान शराब का वितरण करने, प्रचार के लिए सरकारी मशीनरी का उपयोग करने और मतदाताओं को जाति या संप्रदाय के आधार पर उकसाने जैसे चुनावी विसंगतियों पर काफी सख्ती दिखाई। इसके अलावा श्री शेषन ने चुनाव प्रचार के लिए पूजा स्थलों का उपयोग करने और लाउडस्पीकर का उपयोग करने जैसी कुप्रथाओं पर भी लगाम सा लगा दिया था। सरकारी सेवाओं के लिए उन्हें 1996 में रेमन मैग्सेसे अवार्ड से सम्मानित किया गया था।

यहां पर शेषन के जीवन से जुड़ी एक वाकया का जिक्र करना काफ़ी रोचक होगा। दरअसल सेवा के दौरान एक बार उन्हें तमिलनाडु में बतौर ट्रांसपोर्ट कमिश्नर नियुक्त किया गया। उस पोस्टिंग के दौरान क़रीब 3000 बसें और 40,000 हज़ार कर्मचारी उनके नियंत्रण में थे। किसी बात को लेकर एक ड्राइवर ने शेषन से कहा कि आप ना ही बस के इंजन के बारे में कुछ जानते हैं ना ही बस ड्राइविंग के बारे में, तो आप ड्राइवरों की समस्याओं को कैसे समझ पाएंगे। शेषन ने इसको एक चुनौती के रूप में स्वीकार किया। उन्होंने बस की इंजन को खोलकर दोबारा फिट करना सिखा। एक बार तो उन्होंने बीच सड़क पर ड्राइवर को रोक कर स्टेयरिंग संभाल लिया और यात्रियों से भरी बस को 80 किलोमीटर तक चला कर दिखाया।

रिटायर होने के बाद उन्होंने ‘देशभक्त’ नाम से एक ट्रस्ट बनाया। साल 1997 में वे राष्ट्रपति का चुनाव भी लड़े, लेकिन के. आर. नारायणन से हार गए। उसके दो साल बाद कांग्रेस के टिकट पर उन्होंने लालकृष्ण आडवाणी के खिलाफ चुनाव भी लड़ा, लेकिन उसमें भी पराजित हुए।

शेषन को आजाद भारत के ऐसे नौकरशाह के रूप में याद किया जाएगा, जिसके पास खुद की एक मौलिक सोच थी और जो देश में पारदर्शिता और निष्पक्षता के लिए विवादित निर्णय लेने से भी नहीं डरते थे। उनके आलोचक तो उन्हें ‘सनकी’ तक कहा करते थे। लेकिन उनके इस सनक ने उन्हें लोक सेवा के इतिहास में मील का एक पत्थर बना दिया।