(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) सोवा-रिग्पा : प्राचीन चिकित्सा पद्धति (Sova-Rigpa : Traditional Medicine System)


(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) सोवा-रिग्पा : प्राचीन चिकित्सा पद्धति (Sova-Rigpa : Traditional Medicine System)


क्या है सोवा-रिग्पा पद्धति?

हाल ही में कैबिनेट मंत्री मंडल के द्वारा सोवा रिग्पा राष्ट्रीय संस्थान की स्थापना घोषणा ने सोवा रिग्पा को पुनः चर्चा का केंद्र बना दिया है। इसके साथ ही भारत के द्वारा इसे अपनी अमूर्त संस्कृति विरासत के दर्जे में शामिल करने के लिए लिए यूनेस्को में दावा भी प्रस्तुत किया गया है।हालांकि चीन के द्वारा भारत के इस प्रस्ताव पर आपत्ति जताई गई है एवं चीन के द्वारा भी अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस चिकित्सीय पद्धति पर अपना दावा प्रस्तुत किया गया है।

तो आइए आज के इस डीएनएस कार्यक्रम में जानते हैं कि आखिर यह सोवा-रिग्पा पद्धति है क्या?

सोवा रिग्पा विश्व की प्राचीनतम, जीवंत एवं सुप्रलेखित चिकित्सीय पद्धतियों में से एक है। ऐसा माना जाता है कि सोवा-रिग्पा के मूल पाठ्य पुस्तक ‘रग्युद-ब्जी’ की शिक्षा गौतम बुद्ध के द्वारा स्वयं दी गई थी और यह निकट रूप से बौद्ध दर्शन से जुड़ा हुआ है। भारत में इस चिकित्सीय पद्धति का प्रयोग जम्मू-कश्मीर के लद्दाख क्षेत्र, लाहौल-स्पीति (हिमाचल प्रदेश), सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश तथा दार्जिलिंग (पश्चिम बंगाल) में किया जाता है। भारत के हिमालयी क्षेत्र में इस चिकित्सा पद्धति को 'तिब्बती' या 'आमचि' के नाम से जाना जाता है।सोवा रिग्पा छठवीं प्राचीन चिकित्सा प्रणाली है जिसे सरकार के द्वारा मान्यता प्रदान की गई है।

चिकित्सीय पद्धति सोवा-रिग्पा के सिद्धांत और प्रयोग आयुर्वेद के ही समान हैं और इसमें पारंपरिक चीनी चिकित्सा विज्ञान के कुछ सिद्धांत भी शामिल हैं।सोवा रिग्पा चिकित्सा पद्धति में चिकित्सक को आमची कहा जाता है।पहले यह चिकित्सा पद्धति पिता से पुत्र के द्वारा एक-दूसरे दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरित होती थी लेकिन आमची बनने के लिए 5 साल का कोर्स पूरा करना पड़ता है।सोवा रिग्पा चिकित्सा पद्धति में चिकित्सक देखकर, छूकर एवं प्रश्न पूछकर इलाज करते हैं। आयुर्वेद के समान इस चिकित्सा पद्धति में जांच के दौरान लूंग, खारिसपा और बैडकन जैसे दोषों को ध्यान में रखा जाता है। इस पद्धति में रोग को जड़ से खत्म करने पर बल दिया जाता है, इसलिए इलाज लंबा चलता है।

सोआ-रिग्पा चिकित्सा पद्धति में प्रयोग में लाई जाने वाली अधिकांश दवाइयां हिमालय क्षेत्र में उगने वाली जड़ी-बूटियों के अर्क से तैयार होती हैं। हिमालय क्षेत्र की मिट्टी में अधिक मात्रा में मिनरल्स और खनिज तत्व होते हैं। कैंसर, डायबिटीज, हृदय रोगों और आर्थराइटिस जैसी गंभीर बीमारियों में मिनरल्स का अत्यधिक प्रयोग होता है। कुछ दवाइयों में सोना-चांदी और मोतियों की भस्म भी मिलाई जाती है। इस पद्धति में दवाएं, गोलियों और सिरप के रूप में होती हैं।

आयुर्वेद में जहां औषधीय पौधे के सभी हिस्सों को इस्तेमाल किया जाता है वही सोवा रिग्पा चिकित्सा पद्धति में औषधीय पौधों से केवल अर्क निकालकर दवा बनाते हैं। इसमें इलाज के साथ एलोपैथी, यूनानी, आयुर्वेदिक या होम्योपैथिक दवा भी ली जा सकती हैं।

भारत में सोवा रिग्पा चिकित्सा को बढ़ाने के लिए राष्‍ट्रीय सोवा रिग्‍पा अनुसंधान संस्‍थान, लेह केन्‍द्रीय आयुर्वेदीय विज्ञान अनुसंधान परिषद्, को आयुष मंत्रालय के अधीन1976 में स्‍थापित किया गया । हाल ही में सरकार के द्वारा लेह में सोवा रिग्पा राष्ट्रीय संस्थान (एनआईएसआर) स्थापित करने की मंजूरी प्रदान की गई है। यह एक स्वायत्त संस्थान होगा। इसे आयुष मंत्रालय के तहत बनाया जाएगा और करीब 47.25 करोड़ रुपये लागत आएगी। इस संस्थान के जरिए भारत में सोवा-रिग्पा को लोकप्रियता दिलाई जाएगी और विश्व भर के विद्यार्थियों को यहां पढ़ने के अवसर मिलेंगे। भारत व विश्व के जाने-माने संस्थानों के साथ शोध व विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों के मेल को भी बढ़ावा मिलेगा।