(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) नौसेना विद्रोह (Royal Indian Navy Mutiny)


(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) नौसेना विद्रोह (Royal Indian Navy Mutiny)



भारतीय इतिहास के कुछ पन्ने ऐसे हैं जिनका तालुक आजादी की लड़ाई से तो है लेकिन राजनीतिक या कुछ उनकाही वजहों से उन पर ज्यादा रोशनी नहीं डाली गयी । इन पन्नों में 1946 में हुई नौसेना की एक बगावत का जिक्र है। इस बगावत से आजादी के राजनीतिक आंदोलन के समानांतर एक अलग माहौल पैदा किया। इस माहौल ने अंग्रेजों इतना ख़ौफ़ज़दा कर दिया की उन्होंने भारत को छोड़ने का फैसला जल्दी ले लिया । इस बग़ावत ने अंग्रेजों को यह एहसास करा दिया कि यदि और अधिक समय तक वे भारत में टिके रहे तो वापस ब्रिटेन भागने का रास्ता भी बंद हो जाएगा। भारतीय इतिहास में शायद इस तारीख को और इस बग़ावत को ज़्यादा तवज़्ज़ो नहीं दी गयी लेकिन यह बग़ावत आज भी हिन्दुस्तान की आज़ादी की लड़ाई में खास अहमियत रखती है।

आज से 74 साल पहले 18 फरवरी, 1946 को रॉयल इंडियन नेवी के सिगनल्स प्रशिक्षण संस्थान आई।एन।एस। तलवार(जहाज का नाम) के गैर कमीशंड अधिकारियों एवं सिपाहियों ने अपने खिलाफ हो रहे बुरे बर्ताव और खराब रख रखाव के मद्देनज़र बग़ावत कर दी। इस बग़ावत में HMIS तलवार के कप्तान एफ एम किंग की नस्लवादी टिप्पड़ी ने आग में घी का काम किया जिससे बाग़ी सिपाहियों ने और उग्र रुख अख्तियार कर लिया।

इधर, कांग्रेस के तमाम नेताओं और क्रांतिकारियों, जिसमें दादा भाई नौरोजी से लेकर बाल गंगाधर तिलक, और महात्‍मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू से लेकर सुभाषचंद्र बोस सहित तमाम दिग्‍गजों ने अपनी-अपनी तरह से आंदोलन शुरू हुए, लेकिन इसी बीच जबकि देश 1942 में भारत छोडो आंदोलन का गरमा-गरम माहौल था, वहीं महज आजादी के एक साल पहले यानी की 1946 में यह आंदोलन शुरू हुआ।

मुम्बई में रॉयल इण्डियन नेवी के सैनिकों की हड़ताल के साथ इस विद्रोह की शुरुआत के साथ ही यह अांदोलन शुरू हुआ। यह विद्रोह 18 फ़रवरी 1946 को जहाजों और समुद्र से बाहर स्थित जलसेना के कई ठिकानों पर हुआ। यूँ तो इस बग़ावत का आगाज़ मुम्बई में हुआ था लेकिन देखते देखते इसने कराची से लेकर कोलकाता और पूरे भारत को अपनी ज़द में ले लिया।

विद्रोह की वजह

नौसेना के सिगनल्स प्रशिक्षण पोत 'आई।एन।एस। तलवार' पर हुए इस विद्रोह की असल वजह दरअसल सैनिकों को मिलने वाला खराब खाना था ।जिस को लेकर सैनिकों ने आवाज़ उठायी । लेकिन अंग्रेज अधिकारियों ने उनकी इस आवाज़ को दबाने की कोशिश की । इसके अलावा अँगरेज़ हुक्मरानों ने सैनिकों पर नस्‍लीय टिप्पणियां और अपमान जनक व्यवहार भी किया । इस वाकये और खराब बर्ताव से गुस्‍साए नाविकों ने 18 फ़रवरी को भूख हड़ताल कर दी, जो लगातार फैलती चली गई। अपनी मांगों को लेकर सैनिकों ने 19 फ़रवरी को एक हड़ताल कमेटी बनाई जिसमें उन्होंने बेहतर खाने व गोरे और भारतीय नौसैनिकों के लिए समान वेतन, आजाद हिन्द फौज के सिपाहियों सहित सभी राजनीतिक बन्दियों की रिहाई तथा इण्डोनेशिया से सैनिकों को वापस बुलाये जाने की मांग की।

विद्रोही बेड़ों में कम्युनिस्ट पार्टी, कांग्रेस और मुस्लिम लीग के झण्डे एक साथ फहराए गए। अंग्रेज महज दो दिनों के अंदर लगातार फैल रहे इस विद्रोह को दबाने के लिए तेजी से हरकत में आए । 20 फ़रवरी को बग़ावत को कुचलने के लिए सैनिक टुकड़ियां बम्बई आ गईं। यकीनन अंग्रेज इस काम में सफल हुए और उसी दिन विद्रोही नाविक जहाजों पर लौट गए। शांतिपूर्ण तरीके से लौटने पर भी उनके साथ धोखा हुआ और अंग्रेज़ी सेना के गार्डों ने उन्हें घेर लिया। अगले दिन इस घटना का सभी नाविकों ने विरोध किया जिससे इस बग़ावत ने युद्ध के हालात पैदा कर दिए ।हालात इतने बदतर हो गए की अंग्रेज अफसर एडमिरल गाडफ्रे ने नौसेना को बमबारी कर नष्ट करने की धमकी दे दी । हालांकि इसी वक़्त लोगों की एक भीड़ बाग़ी सैनिकों की मदद के लिए गेटवे ऑफ इण्डिया पर खाना और अन्य मदद लेकर उमड़ पड़ी।

पूरा देश हो गया शामिल, लेकिन पटेल ने रोक दिया आंदोलन :

इस बग़ावत की खबर पूरे देश में आग की तरह फैली । इस बग़ावत ने धीरे धीरे कराची, कलकत्ता, मद्रास और विशाखापत्तनम के भारतीय नौसैनिकों और दिल्ली, ठाणे और पुणे में मौजूद कोस्ट गार्ड को भी अपने प्रभाव में ले लिया और उन्‍होंने भी हड़ताल शुरू कर दी। इस आंदोलन की आंच इतनी तेज थी कि महज चार दिनों के भीतर यह बग़ावत देश के 78 जलयानों, 20 स्थलीय ठिकानों पर फ़ैल गयी ।आंकड़ों पर गौर करें तो तकरीबन 2000 नाविकों ने इस हड़ताल में हिस्सा लिया ।

बहरहाल, नौसैनिकों की इस हड़ताल का असर पूरे देश के राजनीतिक आन्दोलनों पर दिखाई दिया और इसी दिन कम्युनिस्ट पार्टी ने बम्बई में आम हड़ताल बुलाई । हालांकि मजूदरों को नौसैनिकों का समर्थन करना भारी पड़ा। मजदूर प्रदर्शनकारियों पर सेना और पुलिस की टुकड़ियों ने हमला किया। इस हमले में करीब तीन सौ लोग मारे गये और 1700 लोग घायल हो गए।

इस हिंसात्‍मक कार्रवाई का असर काफी भयावह रहा जिसका सबसे ज्‍यादा असर खुद ब्रिटिश सरकार पर ही दिखाई दिया। कराची में तो नौबत यहां तक थी कि 'हिन्दुस्तान' जहाज से नौसिकों का आत्मसमर्पण कराया गया।

इसी दौरान बम्बई वायु सेना के पायलट और हवाई अड्डे के कर्मचारी भी नस्लीय भेदभाव के खिलाफ हड़ताल पर उतर गए।, इस हड़ताल की वजह से हवाई अड्डों के पायलट भी इस आंदोलन के समर्थन में आ गए ।

इस आंदोलन की आग से पूरी कांग्रेस पार्टी और उसका शीर्ष नेतृत्‍व डर गया था । ऐसे हालात में इस आंदोलन को रोकने के लिए खुद सरदार बल्‍लभ भाई पटेल को आगे आना पड़ा। सरदार पटेल ने 23 फरवरी 1946 को नौसैनिकों को आत्म समर्पण के लिए तैयार किया।

कई उतार चढ़ावों के बाद इस आंदोलन को फिलहाल दबा दिया गया । इस आंदोलन का ज़िक्र इतिहास के पन्नों में कहीं कहीं मिलता है।

लेकिन इस आंदोलन ने ऐसी चिंगारी को हवा दी जिसने ब्रिटिश साम्राज्य को हिन्दुस्तान को जल्द जल्द से जल्द छोड़ने पर मज़बूर कर दिया।