(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) आरओ का पानी बना जान का दुश्मन (RO Water becomes Life Threatening)


(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) आरओ का पानी बना जान का दुश्मन  (RO Water becomes Life Threatening)


पर्यावरण मंत्रालय के दवारा जारी की गयी अधिसूचना जिसमे RO प्लांट्स के निर्माताओं और घरों में RO वाटर प्यूरिफायर्स के प्रयोग को निषिद्ध करने के निर्देश दिए गए हैं । पर्यावरण मंत्रालय द्वारा जारी की गयी ये सूचना राष्ट्रीय हरित अधिकरण के द्वारा दिल्ली में RO वाटर फ़िल्टर के उपयोग को रोकने को लेकर जारी आदेश की वजह से आयी है । NGT के मुताबिक़ RO प्लांट्स में पानी की काफी बर्बादी होती है । प्यूरीफायर मशीनों के निर्माताओं ने एक याचिका के द्वारा इस आदेश को चुनौती दी थी । इस याचिका की वजह से भारत सरकार को देश स्टार पर ये सूचना जारी करनी पडी । सूचना को जारी करने के पीछे सरकार की मंशा पानी की बर्बादी को रोकना और RO द्वारा पानी में टीडीएस की कटौती को रोकना है । आपको बता दें की RO प्लांट्स के ज़रिये कुछ ख़ास रसायन , लाभकारी बैक्टीरिया और साल्ट ख़त्म हो जाते हैं जो सेहत के लिए ज़रूरी होते हैं । इसके अलावा घरों में इस्तेमाल होने वाले RO प्यूरिफायर्स पानी को साफ करने में 80 फीसदी पानी बर्बाद कर देते हैं ।

कई शोध से ये पता चला है की पानी को साफ़ करने के दौरान लाभकारी खनिज जैसे कैल्शियम और मैग्नीशियम भी पानी से हट जाते हैं ।इस निर्देश में ये भी स्पष्ट किया गया है की इन फिल्टरों को तभी बैन किया जा सकेगा जब घरों में पीने वाले पानी की आपूर्ति भारतीय मानक ब्यूरो के मानदंडों के मुताबिक़ हो ।

पिछले साल भारतीय मानक ब्यूरो ने घरों में आने वाले पानी की गुणवत्ता के आधार पर भारत के शहरों को रैंकिंग प्रदान की । इन रैंकिंग में जहाँ मुंबई सभी मानकों को पूरा करके पहले स्थान पर रहा तो दिल्ली को इस रैंकिंग में आखिरी स्थान मिला । 28 टेस्ट मानकों में दिल्ली 19 मानकों, चेन्नई 9 मानकों , और कोलकाता 10 मानकों पर खरा नहीं उतर पाया ।

नीति आयोग द्वारा जारी समग्र जल प्रबंधन सूचकांक के मुताबिक़ 70 फीसदी जल आपूर्ति दूषित है । एक गैर लाभकारी संस्था वाटर ऐड द्वारा जारी गुणवत्ता सूचकांक की रैंकिंग में भारत को 122 देशों की सूची में 120 वां स्थान मिला है ।सरकार द्वारा जारी की गयी सूचना में खास तौर पर व्यावसायिक जल आपूर्तिकर्ताओं के लिए नियमों पर ज़ोर दिया गया है । इसके अलावा जल उपभोक्ताओं को जल गुणवत्ता के खास सूचक टीडीएस के बारे में जानकारी मुहैया कराना भी इन दिशा निर्देशों का मकसद है । इन दिशानिर्देशों का मकसद ये भी सुनिश्चित करना है की 2022 के बाद 25 फीसदी से ज्यादा शोधित पानी बर्बाद न हो और शोधन के बाद निकले हुए पानी का अन्य कार्यों जैसे बाग़वानी आदि में इस्तेमाल हो सके ।

निर्देश के अनुसार जिन जगहों पर पानी में टोटल डिजॉल्व्ड सॉलिड्स (Total Dessolved Solids- TDS) की मात्रा 500 मिलीग्राम प्रति लीटर से कम है, वहाँ RO सिस्टम के इस्तेमाल पर रोक लगा दी जाये । NGT के मुताबिक़ अगर टीडीएस का स्तर 500 मिलीग्राम प्रति लीटर से कम है, तो आरओ सिस्टम उपयोगी नहीं होगा, बल्कि पानी में मौजूद महत्वपूर्ण खनिजों की हानि के साथ पानी की बर्बादी भी होगी।डब्ल्यूएचओ के अध्ययन के अनुसार 300 मिलीग्राम प्रति लीटर से नीचे के टीडीएस स्तर वाले जल को उत्कृष्ट, 900 मिलीग्राम प्रति लीटर टीडीएस स्तर वाले जल को खराब और 1200 मिलीग्राम से ऊपर के टीडीएस स्तर वाले जल को अस्वीकार्य माना गया है।

अधिकतर पीने का पानी उपलब्ध कराने का काम हर शहर में नगरपालिका/नगरनिगम द्वारा किया जाता है। परन्तु पानी को साफ़ करने के बारे में काम जानकारी और संसाधनों की कमी की वजह से नगरपालिका/नगरनिगम अपना दायित्त्व पूरी तरह से नहीं निभा पाते हैं। यह स्थिति पूरे देश में बनी हुई है। यही कारण है कि आज ज़्यादातर लोग अपने घरों में वाटर प्योरिफायर लगाकर साफ़ पानी ले रहे हैं।

जल के शुद्धिकरण में मुख्य रूप से फिल्ट्रेशन तथा असंक्रमण (अल्ट्रावायलेट/क्लोरीनेशन) प्रक्रिया प्रयोग की जाती हैं। फिल्ट्रेशन प्रकिया में सस्पेंडिड साॅलिड, बड़े माइक्रोआॅरर्गेनिज्म पेपर तथा कपड़े के बारीक-बारीक टुकड़े धूल के कण इत्यादि को जल से अलग किया जाता है। घरेलू स्तर पर इन फिल्टरों में विशेष पदार्थ की झिल्ली (Membran) या कार्टरिज (Cartidge) का प्रयोग किया जाता है तथा इसे एक बन्द तंत्र (Closed System) में स्थापित किया जाता है। ये फिल्टर विभिन्न साइजों में उपलब्ध हैं जैसे माइक्रोफिल्टर, तथा अल्ट्राफिल्टर (मैमब्रेन)। माइक्रोफिल्टर 0 .04 से 1 .0 माइक्रो मीटर साइज के कणों तथा माइक्रोब्स को जल से अलग करता है । किसी भी फिल्टर से फाॅस्फोरस, नाइट्रेट तथा भारी धातुओं के आयनों को पानी से दूर नहीं किया जा सकता है। सामुदायिक स्तर पर जल शुद्धिकरण हेतु स्लोसैंडफिल्टर तथा रैपिड सैंड फिल्टर का इस्तेमाल किया जाता है जो नगरपालिका/नगरनिगम स्तर पर किया जाता है।

रिवर्स आॅसमोसिस (Reverse Osmosis, RO) प्रक्रिया का इस्तेमाल आज सबसे अधिक लोकप्रिय होता जा रहा है। रिवर्स आॅसमोसिस वह प्रक्रिया है जिसमें जल को एक प्रेशर द्वारा एक अर्धपारगम्य झिल्ली (Semi Permeable Membarne) से पार कराया जाता है। इस प्रक्रिया में जल में उपस्थित अधिक सान्द्रता वाले विलेय तो झिल्ली के एक तरफ रह जाते हैं तथा शुद्ध जल झिल्ली को पार कर जाता है। एक RO Membrabe का इस्तेमाल 2 से 5 सालों तक किया जा सकता है। इस प्रक्रिया की विशेषता यह है कि यह पानी में मौजूद तकरीबन सभी अकार्बनिक आयनों, गंदलापन तथा बैक्टीरिया एवं पैथोजन को भी पानी से हटा देते हैं पर यह तकनीक बहुत अधिक खर्चीली है और साथ-ही-साथ इस प्रक्रिया में जल शुद्धिकरण में बहुत अधिक पानी की बर्बादी भी होती है।

पानी में मौजूद बैक्ट्रीरिया कई तरह के रोगों की वजह बनता है । पानी को पीने लायक बनाने के लिए कुछ ख़ास रासायनों जैसे क्लोरीन डाइआॅक्साइड, क्लोरामीन, ओजोन आदि का इस्तेमाल किया जाता है। पर क्लोरीन और इसके अन्य यौगिकों के इस्तेमाल से कई और पदार्थ ट्राइहैलोमिथेन तथा हैलोएसिटिक एसिड पैदा हो जाते हैं। जो सेहत के लिये बेहद नुकसानदायक होते हैं। ओजोन का इस्तेमाल बहुत कम किया जाता है। अल्ट्रावाॅयलेट लाइट का प्रयोग असंक्रमण के लिये सबसे ज़्यादा लोकप्रिय है। आज बाजार में उपलब्ध वाटर प्योरिफायरों में उपरोक्त बताई गई तकनीकों के प्रयोग के अनुसार कम्पनियाँ बड़ी-बड़ी कीमतें वसूल कर रही हैं।

भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा पीने के पानी हेतु निर्धारित मानकों के मुताबिक़ अगर पानी में टोटल डिसॉल्वड सॉलिड (TDS) 500 mg/1 से कम है तो किसी फिल्टर की ज़रुरत नहीं है बशर्ते इस पानी में कोई विशेष अशुद्धि नहीं है। RO वाटर प्योरिफायर के इस्तेमाल से tds 20 mg/1 पर आ जाता है। आपको बता दें की भारतीय मानक ब्यूरो के अनुसार पीने के पानी में कैल्शियम की मात्रा कम से कम 75 mg/1 तथा मैग्निशियम की कम-से-कम मात्रा 30 mg/1 होनी चाहिए।

आर ओ फिल्टर धूल, मिट्टी, बैक्टीरिया, वायरस तथा अन्य अशुद्धियों के साथ जल से नुकसान दायक रेडियोएक्टिव कणों कार्बनिक पदार्थ, पेस्टीसाइड, तथा भारी धातुएँ भी जल से दूर कर देती हैं।