(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) 15वें वित्त आयोग की सिफारिशें (Recommendations of 15th Finance Commission)


(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) 15वें वित्त आयोग की सिफारिशें (Recommendations of 15th Finance Commission)


हाल ही में, 15वें वित्त आयोग की अंतरिम रिपोर्ट संसद में पेश की गई। इस रिपोर्ट में सतत विकास लक्ष्यों के दिशा में आगे बढ़ते हुए केंद्र और राज्यों के बीच कर और राजस्व वितरण तय करने के अलावा कई अन्य अहम सिफ़ारिशें भी की गई हैं। वित्त आयोग की ये रिपोर्ट वित्त वर्ष 2020-21 के लिए है और इसकी फाइनल रिपोर्ट 30 अक्तूबर, 2020 तक आ सकती है। ये फाइनल रिपोर्ट 2021 से लेकर 2026 तक की अवधि के लिए होगी।

डीएनएस में आज हम आपको ‘15वें वित्त आयोग की अंतरिम रिपोर्ट’ के बारे में बताएँगे। और साथ ही समझेंगे इससे जुड़े दूसरे पक्षों को भी।

वित्त आयोग एक संवैधानिक निकाय है जिसका ज़िक्र संविधान के अनुच्छेद 280 में किया गया है। इसका गठन भारत के राष्ट्रपति द्वारा प्रत्येक 5 साल के अंतराल पर किया जाता है। आयोग में एक अध्यक्ष के अलावा 4 अन्य सदस्य भी होते हैं। बता दें भारत के पहले वित्त आयोग का गठन 1951 में केसी नियोगी की अध्यक्षता में किया गया था।

अगर वित्त आयोग के कामों पर नज़र डालें तो इसमें शामिल हैं -

  • केंद्र और राज्य के मध्य करों से होने वाली आय के वितरण की सिफारिश करना
  • राज्यों के लिए अनुदानों की सिफारिश करना
  • स्थानीय निकायों के लिए वित्तीय प्रावधान उपलब्ध करवाना
  • राष्ट्रपति को वित्त आयोग के सीमा क्षेत्र में निर्दिष्ट किसी विषय पर सलाह देना

केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा 22 नवंबर 2017 को एन. के. सिंह की अध्यक्षता में 15वें वित्त आयोग का गठन किया गया था। इसका कार्यकाल 2020 से 2025 तक निर्धारित किया गया है। इस वित्त आयोग ने आय विस्थापन, वन आवरण, कर प्रयास, जनांकिकीय प्रदर्शन, जनसंख्या और क्षेत्रफल को केंद्र और राज्य के मध्य राजस्व बंटवारे का आधार बनाया है। इनमें से हर फैक्टर यानी कारक को अलग-अलग वेटेज यानी भार दिया गया है।

इसमें 2011 की जनसंख्या को 15%, आय विस्थापन को 45% और वन आवरण को 10% वेटेज दिया गया है। इसके अलावा, कर प्रयासों का वेटेज 2.5%, ‘जनसांख्यिकीय प्रदर्शन’ का वेटेज 12.5% और क्षेत्रफल का वेटेज 15% है।

मौजूदा 15वें वित्त आयोग ने केंद्र द्वारा राज्यों के साथ साझा किए जाने वाले कर राजस्व में राज्यों की हिस्सेदारी 41% करने की सिफ़ारिश की है. जबकि 14वें वित्त आयोग के दौरान यह 42 फ़ीसदी था. राज्यों के हिस्से में जो एक फीसदी की कमी की गयी है, वो आयोग द्वारा तय फॉर्मूले के मुताबिक़, पूर्ववर्ती राज्य जम्मू-कश्मीर के हिस्से जो कि 0.85 फीसदी है के लगभग बराबर है.

आयोग ने रक्षा खर्च के लिए नॉन-लैप्सेबल फंड शुरू करने के लिए एक विशेषज्ञ टीम के गठन का प्रस्ताव भी किया है. साथ ही, 14 राज्यों के लिए राजस्व घाटा अनुदान, कर्नाटक, मिज़ोरम और तेलंगाना के लिए 6764 करोड़ रुपए के विशेष अनुदान और साल 2020-21 के दौरान पोषण के लिए 7375 करोड़ रुपए की सिफारिश भी की गई है. इसके अलावा, वित्त आयोग ने स्थानीय निकायों के लिए साल 2020-21 में 90,000 करोड़ रुपये, स्थानीय स्तर पर राहत आपदा कार्यों को बेहतर बनाने के लिए राष्ट्रीय और राज्य आपदा प्रबंधन कोष के गठन और केंद्र तथा राज्यों के बीच खर्च साझाकरण की वर्तमान व्यवस्था को जारी रखने की बात कही है. आपको बता दें कि केंद्र और सभी राज्यों के बीच 75:25 के हिसाब से और पूर्वोत्तर तथा अन्य हिमालयीय राज्यों के लिए 90:10 के हिसाब से खर्च की साझेदारी की जाती है.

इस प्रकार वित्त आयोग द्वारा जो भी सिफारिशें पेश की गई हैं, उनमें सतत विकास के साथ-साथ केंद्र और राज्य के बीच राजस्व के वितरण और अनुदानों की समुचित व्यवस्था है। हालांकि, 15वें वित्त आयोग के द्वारा अपनाए गए नए मापदंड से कुछ राज्यों को आर्थिक नुकसान हो रहा है। इससे इन राज्यों ने कुछ आपत्ति जताई है। बहरहाल वित्त आयोग ने राज्यों को विशेष अनुदान देने की अनुशंसा ज़रूर की है लेकिन यह पूरी तरह से केंद्र सरकार पर निर्भर करता है वो इन सिफ़ारिशों को माने या ना माने। लेकिन अभी तक परंपरा यही रही है कि केंद्र सरकार वित्त आयोग की सिफारिशों को अमूमन मान लेती है.