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Blog / 07 Nov 2020

(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) राधा विनोद पाल : जापान में पूजे जाने वाले भारतीय (Radha Binod Pal : Worshipped Indian Judge in Japan)

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(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) राधा विनोद पाल : जापान में पूजे जाने वाले भारतीय (Radha Binod Pal : Worshipped Indian Judge in Japan)



तारीख थी 12 नवंबर, 1948। द्वितीय विश्वयुद्ध खत्म हो चुका था। विजेता देश जापान को ‘सबक’ सिखाना चाहते थे। इसलिए अमेरिका ने ‘क्लास ए वार क्राइम’ नाम का एक क़ानून बनाया. कानून को लागू करने के लिए जापान में ‘इंटरनेशनल मिलिट्री ट्रिब्यूनल फॉर द फार ईस्ट’ ने संयुक्त राष्ट्रों से 11 न्यायाधीशों की एक टीम बनाई. और फिर शुरू हुआ ‘टोक्यो ट्रायल्स’। इस कानून के तहत जापान के 25 आरोपियों को क्लास-ए के 55 मामलों में दोषी ठहराया गया। एक के बाद एक सभी न्यायधीश इन आरोपियों को ‘दोषी’ करार देते जा रहे थे कि अचानक एक आवाज़ आई – “दोषी नहीं हैं”। इस एक आवाज़ को सुन कर पूरी अदालत में सन्नाटा छा गया क्योंकि उस वक्त मित्र राष्ट्रों के खिलाफ बोलने की कूवत शायद ही किसी में थी। यह आवाज़ थी राधाबिनोद पाल की।

डीएनएस में आज हम आपको राधाबिनोद पाल के बारे में बताएंगे और साथ ही समझेंगे उनके जीवन से जुड़े कुछ दूसरे महत्वपूर्ण पक्षों को भी..

डॉ. पाल का जन्म 27 जनवरी, 1886 को तत्कालीन बंगाल के कुश्तिया जिले के सलीमपुर गांव में हुआ था। यह इलाका अब बांग्लादेश में पड़ता है। कोलकाता के प्रेसिडेंसी कॉलेज और कोलकाता विश्वविद्यालय से कानून की शिक्षा पूरी कर वे इसी विश्वविद्यालय में 1923 से 1936 तक अध्यापक रहे। 1941 में उन्हें कोलकाता उच्च न्यायालय में न्यायाधीश नियुक्त किया गया। वे तत्कालीन अंग्रेज शासन के सलाहकार भी रहे। हालांकि उन्होंने अन्तरराष्ट्रीय कानून की कोई औपचारिक प्रशिक्षण नहीं ली थी, इसके बावजूद द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जब जापान के विरुद्ध ‘टोक्यो ट्रायल्स’ नामक मुकदमा शुरू हुआ, तो डॉ पाल को इसमें बतौर न्यायाधीश नियुक्त किया गया। उन्हें ब्रिटिश सरकार ने भारत का प्रतिनिधि बनाया था और यहीं से राधाविनोद पाल को वैश्विक पहचान मिली। बता दें कि युद्ध न्यायाधिकरण में पाल की भागीदारी, गिरजा शंकर बाजपेयी के अथक प्रयासों का नतीज़ा था। बाजपेयी वाशिंगटन डीसी में भारत के एजेंट जनरल थे।

ट्रायल क्या था, बस सजा सुनानी थी और युद्ध का सारा दोष हारे हुए देशों पर मढ़ देना था। मामला एशिया का था इसलिए नाम के लिए ही सही …. दो जज एशिया से भी चुन लिए गए। एक जापान-पीड़ित फिलीपींस से और दूसरे भारत से। बाकी सारे जज यूरोप से थे या फिर अमेरिका से। कुल 11 जजों में से डॉक्टर पाल एकमात्र ऐसे जज थे, जिन्होंने ये फैसला दिया था कि सभी युद्ध अपराधी निर्दोष हैं।

न्यायाधीश पाल ने अपने फैसले में लिखा था कि किसी घटना के घटित होने के बाद उसके बारे में कानून बनाना उचित नहीं है। इसीलिए डॉक्टर पाल ने युद्धबंदियों पर मुकदमा चलाने को विश्वयुद्ध के विजेता देशों की जबरदस्ती बताते हुए सभी को छोड़ने का फैसला सुनाया था जबकि बाकी जजों ने उन्हें मृत्युदंड दिया था। इसी फैसले के चलते आज भी राधा विनोद पाल को जापान में एक महान व्यक्ति की तरह सम्मान दिया जाता है। अपने जीवन के अन्तिम दिनों में डॉ. पाल ने गरीबी की वजह से अत्यन्त कष्ट भोगते हुए 10 जनवरी, 1967 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया।

राधाबिनोद का शायद आपने नाम भी न सुना हो या आपके अलावा और भी बहुत सारे भारतीय ऐसे होंगे, जो इन्हें न तो जानते हैं और न ही पहचानते हैं, लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि इस शख्स को जापान में न सिर्फ लोग जानते हैं बल्कि उसे भगवान की तरह पूजते भी हैं। यही वजह है कि जापान के यासुकुनी मंदिर और क्योटो के र्योजेन गोकोकु मंदिर में इनकी याद में खास स्मारक बनवाए गए हैं।

साल 2007 में जब जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे भारत आए थे, तो उन्होंने राधाबिनोद पाल के बेटे से कोलकाता में मुलाकात की थी और तस्वीरों का आदान-प्रदान भी किया था। दरअसल, उस समय के युद्ध अपराधियों में शिंजो आबे के नाना नोबूसुके किशी भी शामिल थे, जो बाद में जापान के प्रधानमंत्री बने थे।

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