(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) पंडित राम प्रसाद बिस्मिल (Pt. Ram Prasad Bismil : Hero of Kakori)


(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) पंडित राम प्रसाद बिस्मिल (Pt. Ram Prasad Bismil : Hero of Kakori)



“सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है ज़ोर कितना बाजूएँ कातिल में है।”

यह सिर्फ एक पंक्तियाँ नही है ये एक सोच है..एक जूनून है देश के प्रति उन सभी क्रान्तिकारी स्वतंत्रता सेनानियों का....इन पंक्तियों को सुन कर सीने में दबी देश भक्ति की भावना....अपने देश के प्रति प्रेम खुद- ब खुद रगों में लहर उठता है...

इन पंक्तियों के रचयिता, एक महान लेखक, एक कवी पंडित राम प्रसाद बिस्मिल, उन महान स्वतंत्रता सेनानियों में से एक थे जो देश की आजादी के लिये अंग्रेजी शासन से संघर्ष करते हुये शहीद हो गये.....आज पूरा देश उन्हें बड़ी शिद्दत से याद करता है

आज DNS कार्यक्रम में हम उनकी जयंती पर उनके जीवन से जुडी कुछ महत्वपूर्ण बातों को आपसे साझा करेंगे.....

ऐतिहासिक काकोरी कांड के बारे में आपने सुना होगा.....राम प्रसाद बिस्मिल वो प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी थे जो इस कांड में शामिल थे...पंडित राम प्रसाद बिस्मिल का जन्म 11 जून, 1897 को शाहजहांपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ था....उनके पिता मुरलीधर, शाहजहांपुर नगरपालिका में कार्यरत थे....अपने पिता से हिंदी सीखने के बाद उन्हें उर्दू सीखने के लिए एक मौलवी के पास भेजा गया..

आइये आज उनके जन्मदिन के अवसर पर उनसे जुड़ीं कुछ रोचक बातें जानते हैं...

राम प्रसाद बिस्मिल बड़े कवि और शायर भी थे....उन्होंने उर्दू और हिंदी में अज्ञात, राम और बिस्मिल नाम से कविताएं लिखीं लेकिन वे प्रसिद्ध “बिस्मिल कलमी” नाम से हुए....सरफरोशी की तमन्ना जैसे अमर गीत को उन्होंने ही लिखा था जिसने हर भारतीय के दिल में जगह बनाई.... उन्होंने हिंदी से बंगाली में अनुवाद का काम भी किया....उनकी द्वारा किए गए काम में बोल्शेविक प्रोग्राम, अ सैली ऑफ द माइंड, स्वदेशी रंग और कैथरीन शामिल है...ऋषि अरबिंदो की योगिक साधना का राम प्रसाद ने अनुवाद किया था... उनके सभी काम को 'सुशील मेला' नाम की सीरीज में प्रकाशित किया गया है...

वह आर्य समाज से जुड़े थे जहां उनको “सत्यार्थ प्रकाश” नाम की किताब से प्रेरणा मिली...सत्यार्थ प्रकाश को स्वामी दयानंद सरस्वती ने लिखा था...अपने गुरु और आर्य समाज के प्रचारक स्वामी सोमदेव के माध्यम से उनका लाला हरदयाल से भी संपर्क हुआ...वह हिंदुस्तान रिपब्लिकन असोसिएशन नाम के क्रांतिकारी संगठन के संस्थापक सदस्य थे..

उत्तर रेलवे ने एक स्टेशन का नाम उनके सम्मान में पंडित राम प्रसाद बिस्मिल रेलवे स्टेशन रखा। 19 दिसंबर, 1997 को भारत सरकार द्वारा उनकी 100वीं जयंती के उपलक्ष्य में एक यादगार डाक टिकट जारी किया गया था...

काकोरी कांड : एक नज़र

राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में 10 लोगों ने सुनियोजित कार्रवाई के तहत 9 अगस्त, 1925 को लखनऊ के काकोरी नामक स्थान पर देशभक्तों ने रेल विभाग की ले जाई जा रही संग्रहित धनराशि को लूटा...उन्होंने ट्रेन के गार्ड को बंदूक की नोक पर काबू कर लिया। गार्ड के डिब्बे में लोहे की तिजोरी को तोड़कर आक्रमणकारी दल चार हजार रुपये लेकर फरार हो गए। काकोरी कांड में अशफाकउल्लाह, चन्द्रशेखर आजाद, राजेन्द्र लाहिड़ी, सचीन्द्र सान्याल, मन्मथनाथ गुप्त, राम प्रसाद बिस्मिल आदि शामिल थे...

काकोरी कांड ने ब्रिटिश शासन को हिलाकर रख दिया था....काकोरी कांड के क्रांतिकारियों को गिरफ्तार करवाने में मदद के लिए ब्रिटिश सरकार ने इनाम का ऐलान किया था..प्रमुख स्थानों पर इश्तिहार लगा दिए गए थे..क्रांतिकारियों तक ब्रिटिश पुलिस को पहुंचाने में बड़ी भूमिका घटनास्थल पर मिली चादर ने निभाया.... चादर पर लगे धोबी के निशान से पता चल गया कि चादर बिस्मिल के साथी बनारसीलाल की थी। इस तरह से पुलिस यह पता लगाने में सफल रही कि काकोरी कांड में कौन-कौन लोग शामिल थे...फिर क्रांतिकारियों की बड़े पैमाने पर गिरफ्तारी की गई और मुकदमा चलाया गया...बिस्मिल को काकोरी कांड के लिए फांसी की सजा सुनाई गई , 21 मई 1926 को करीब एक साल बाद धारा 121/ए, 120/बी और 369 के अन्तर्गत मुकदमा शुरु किया गया.... लगभग डेढ़ साल तक मुकदमा चलाने के बाद 6 अप्रैल को सेशन कोर्ट ने फाँसी की सजा सुनायी...

रेकॉर्ड्स के मुताबिक 18 जुलाई को अवध चीफ कोर्ट में बिस्मिल द्वारा सजा माफी की अपील की गयी थी....वहीँ 16 सितम्बर को प्रांतीय वॉयसराय को दया-प्रार्थना भेजी गयी, जिसे अस्वीकृत कर दिया गया....जहाँ 16 दिसम्बर को उन्होंने राष्ट्र के नाम सन्देश भेजा....बिस्मिल ने गोरखपुर जेल से कई पत्र लिखे...फांसी से तीन दिनों पहले उन्होंने अपनी मां और दोस्त अशफाकउल्लाह खान को पत्र लिखे.... अपनी मां को लिखे पत्र में अपनी फांसी को लेकर दिलासा दिया था... उन्होंने मां से अफसोस नहीं करने को कहा था.... उन्होंने लिखा था कि “पूरा देश उनको याद करेगा..” उन्होंने मां से प्रार्थना करने को कहा ताकि वह अपना जीवन अपनी मातृभूमि के लिए न्योछावर कर सकें....

अशफाकउल्लाह खान को लिखे पत्र में उन्होंने उनको अपना 'भाई' और 'लेफ्टिनेंट' बताया था। उन्होंने अशफाक को लिखे पत्र को इस शेर के साथ खत्म किया, 'असगर रहीम इश्क में हस्ती ही जुर्म है, रखना कभी न पांव यहां सर लिए हुए।'

फांसी देने से पहले जब उनकी अंतिम इच्छा पूछी गई तो उन्होंने कहा कि मैं ब्रिटिश शासन का अंत देखना चाहता हूं.....और यह कहकर उन्होंने शहादत को गले लगा लिया....19 दिसम्बर 1927 उनकी शाहादत का दिन...जब वो हमेशा के लिए अमर हो गये...पंडित राम प्रसाद बिस्मिल और उनकी रचनायें हमारे बीच हमेशा जिन्दा रहेंगे....उनकी जयंती अपर उनको शत शत नमन