(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) ऑपरेशन मेघदूत : सियाचीन पर फ़तेह की कहानी (Operation Meghdoot : A Tale of Conquering Siachin)


(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी)  ऑपरेशन मेघदूत : सियाचीन पर फ़तेह की कहानी (Operation Meghdoot : A Tale of Conquering Siachin)


हाल ही में ऑपरेशन मेघदूत की अगुवाई करने वाले लेफ्टिनेंट जनरल पीएन हून का निधन हो गया।लेफ्टिनेंट जनरल पीएन हून के नेतृत्व में ही भारतीय सेना ने विश्व के तीसरे ध्रुव के रूप में प्रसिद्ध सियाचिन पर आधिपत्य जमाते हुए तिरंगा फहराया।

आपको यहां बता दें सियाचिन ग्लेशियर हिमालय की पूर्वी काराकोरम श्रेणी में स्थित है एवं यह काराकोरम श्रेणी का सबसे लम्बा ग्लेशियर है। सियाचिन 2 शब्दों सिया और चिन से मिलकर बना हुआ है जिसमें सिया का अर्थ गुलाब और चिन का अर्थ स्थान होता है। या यूं कहें सियाचिन शब्द का अर्थ गुलाब का स्थान या गुलाबों का बगीचा हैं। लेकिन सियाचिन कोई गुलाब का बगीचा नहीं है बल्कि यह एक सफेद बर्फ का रेगिस्तान है जहां पर तापमान हमेशा माइनस 10 डिग्री से नीचे रहता है एवं जाड़ों में तापमान माइनस 50 डिग्री तक पहुंच जाता है।भौगोलिक रूप से यह निर्जन स्थल जहां पर सांस लेना भी मुश्किल है, भारत के लिए रणनीतिक दृष्टिकोण से बहुत ही महत्वपूर्ण है। इसके एक तरफ जहां पाकिस्तान का नियंत्रण है वहीं दूसरी तरफ चीन का।सियाचिन से पाकिस्तान के साथ-साथ चीन की भी गतिविधियों पर नजर रखी जा सकती है। सियाचिन पर नियंत्रण खोने का मतलब है पाकिस्तान और चीन सेना का संयुक्त रूप से भारत में प्रवेश पा जाना संभव हो जाएगा। वर्तमान में पूरा सियाचिन ग्लेशियर भारत के नियंत्रण में है। भारत 1984 से इस क्षेत्र के नियंत्रित करता है।

आइए आज के डीएनएस कार्यक्रम में भारतीय सेना के उच्च अदम्य पराक्रम वाले मेघदूत अभियान के बारे में जानते हैं

आजादी के बाद जम्मू और कश्मीर को लेकर भारत और पाकिस्तान की लड़ाई प्रारंभ हो गई। 1949 कराची एग्रीमेंट के तहत दोनों देशों के बीच सीमा रेखा को लेकर सीजफायर हुआ। इस एग्रीमेंट में भारत पाकिस्तान के सुदूर पूर्वी भाग में सीमा रेखा नहीं खींची गई थी एवं इस इलाके में NJ9842 आखिरी पॉइंट था। इस पॉइंट के आगे की जगह निर्जन थी जहां पर न कोई आबादी थी एवं ना ही यहां तक पहुंचना आसान था। तात्कालिक राजनीतिक एवं सैन्य नेतृत्व को यह विश्वास था की इस पॉइंट के आगे कभी भी सैन्य विवाद नहीं हो सकता। शिमला समझौते में भी सियाचिन को एक निर्जन भूमि का टुकड़ा मानते हुए NJ9842 के आगे की सीमा के मूल्यांकन को नजरअंदाज कर दिया गया। हालांकि शिमला समझौते यह सहमति बनी NJ9842 से ऊपर जाती हुई नियंत्रण रेखा सियाचिन त्रिकोण के दूसरे सिरे को छुएगी जिसे इंदिरा कोल कहा जाता है।

1975 में भारतीय सेना के कर्नल नरेन्द्र कुमार को सिंधु नदी में जर्मनी पर्वतारोहियों से कुछ ऐसे पाकिस्तानी नक्शे मिले जिसमें नियंत्रण रेखा को NJ9842 के उत्तर में इंदिरा कोल तक न दिखा कर पूर्वोत्तर में कराकोरम पास तक दिखाया गया था। कराकोरम इस त्रिकोण का अंतिम छोर था और इसका मतलब था कि पाकिस्तान ने इस क्षेत्र पर अपना दावा करना प्रारंभ कर दिया था। कर्नल नरेंद्र कुमार ने एक टोही दल को निगरानी के लिए सियाचिन भेजा जिसने यह पुष्टि की पाकिस्तानी सेना इस क्षेत्र पर अपना पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है। इसके उपरांत सियाचिन में पोस्ट बनाने का निर्णय लिया गया लेकिन वहां की दुर्गम परिस्थितियों के कारण यह संभव नहीं था। ऐसे में यह निर्णय लिया गया कि भारतीय सेना गर्मियों में सियाचिन क्षेत्र की पेट्रोलिंग करेगी। इसके साथ ही भारतीय सेना ने सियाचिन में अपनी गतिविधियों को बढ़ाना प्रारंभ कर दिया। 1982 में भारतीय सेना को पाकिस्तानी सेना की तरफ से एक विरोध नोट मिला जिसमें पाकिस्तानी सेना ने सियाचिन में भारतीय सेना की पेट्रोलिंग पर आपत्ति जताई थी।

1983 में भारतीय खुफिया एजेंसियों को यह सूचना मिली कि पाकिस्तान ने जर्मनी स्थित एक कंपनी को बर्फीले क्षेत्र में तैनात होने वाले सैनिकों के लिए आवश्यक सैन्य साजो-सज्जा एवं उपकरणों का आर्डर दिया है। इससे यह आशंका बढ़ गई कि पाकिस्तान सियाचिन पर कब्जा करने जा रहा है। बाद में भारतीय खुफिया एजेंसियों ने इसकी पुष्टि की। पाकिस्तान सियाचिन पर कब्जा करने के लिए "ऑपरेशन अबाबील" को अंजाम देने जा रहा था। ऑपरेशन अबाबील के द्वारा पाकिस्तान 17 अप्रैल को सियाचिन पर कब्जा करने वाला था। भारतीय सेना ने सियाचिन क्षेत्र पर अपना कब्जा स्थापित करने के लिए ऑपरेशन मेघदूत चलाया। ऑपरेशन मेघदूत के लिए 13 अप्रैल की तारीख चुनी गई क्योंकि पाकिस्तानी सेना यह मानती थी कि भारत इस दिन वैशाखी त्यौहार में व्यस्त होगा।

ऑपरेशन मेघदूत भारतीय सेना के सबसे कठिन अभियानों में से एक थी। अगर हम सियाचिन के भौगोलिक अवस्थिति को देखें तो भारत की ओर से सियाचिन की खड़ी चढ़ाई थी एवं पाकिस्तान की ओर से सियाचिन की चढ़ाई आसान थी। वहीं दूसरी ओर भारतीय सैनिकों को -40 से -60डिग्री के तापमान में फतेह हासिल करनी थी। भारतीय सेना ने मात्र एक दिन पहले आए सैन्य साजो सज्जा के द्वारा ऑपरेशन मेघदूत की कार्यवाही को अंजाम देना प्रारंभ किया।

भारतीय सैनिकों को वायुसेना के विमानों द्वारा ग्लेशियर की ऊंची चोटियों तक पहुंचाया। जब पाकिस्तान फौज इस इलाके में पहुंची तो उन्हें पता चला कि यहां पर भारतीय सेना पहले ही सियाचिन, सलतोरो ग्लेशियर, साई-लॉ, बिलाफोंड लॉ दर्रे पर कब्जा जमाए बैठे हैं।

सियाचिन में भारत एवं पाकिस्तान की तरफ से कई पोस्ट बनाए गए। 21,153 फीट की ऊँचाई वाले इस क्षेत्र में 1,500 फीट की बर्फीली दीवार पर स्थित पाकिस्तान की ’क़ायदे आज़म’ की अवस्थिति एक किले के सामान थी। यह पोस्ट नज़दीकी के सभी भारतीय पोस्टों पर हावी थी। सामरिक महत्व वाली इस पोस्ट पर कब्ज़ा करने के लिए भारतीय सेना ने 23 जून 1987, को हमले की कार्रवाई शुरु की। कठिन व प्रतिकूल परिस्थितियों, शून्य से 50 डिग्री कम तापमान एवं बर्फीले तूफानों के बीच भारतीय 8 जम्मू-कश्मीर लाइट इन्फेन्ट्री के जाँबाज़ सैनिकों ने तीन दिन तथा तीन रातों तक भीषण सैन्य कार्रवाई करते हुए, 26 जून 1987 को पाकिस्तानी पोस्ट पर अपना कब्ज़ा जमा लिया। युद्ध के इतिहास में यह एक अद्वितीय तथा असाधारण अभियान था। बाद में पोस्ट का नाम इस अभियान में विशिष्ट योगदान के लिए एक बहादुर सैनिक के नाम पर ’बाना टॉप’ रख दिया गया।

तब से लेकर आज तक सियाचिन पर भारत का नियंत्रण स्थापित है। यहां पर भारतीय सैनिकों को ना केवल दुश्मन देश से खतरा होता है बल्कि यहां का प्रतिकूल मौसम, बर्फीली आंधियां एवं हिमस्खलन से भी हताहत होने का सदैव खतरा बना हुआ रहता है। इस दुर्गम एवं रणनीतिक भौगोलिक भूभाग की रक्षा करते हुए अब तक भारतीय सेना के 1000 से भी ज्यादा जवानों ने अपने प्राणों की आहुति दे दी है।भारतीय सेना के इस सैन्य पराक्रम एवं कर्मठता का यह नतीजा है कि आज विश्व की सबसे ऊँचे युद्धस्थल पर हम सामरिक लाभ की स्थिति में हैं। भारतीय सैन्य उपस्थिति के कारण आज पाकिस्तान सियाचिन ग्लेशियर पर है ही नहीं जिसका सामरिक लाभ भारत को प्राप्त है।