(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) गेंहू की नई प्रजाति एमएसीएस 4028 (New Variety of Wheat: MACS-4028)


(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) गेंहू की नई प्रजाति एमएसीएस 4028 (New Variety of Wheat: MACS-4028)



क्या है बायोफोर्टीफाइड एमएसीएस 4028?

हाल ही में भारत के वैज्ञानिकों ने गेहूं की एक बायोफोर्टीफाइड किस्म एमएसीएस 4028 विकसित की है। गेहूं की इस प्रजाति में प्रोटीन की उच्च मात्रा के साथ-साथ कई पोषक तत्व भी उपलब्ध है। गेहूं की इस नई किस्म का विकास पुणे के अगहरकर रिसर्च इंस्टीट्यूट (एआरआई) के वैज्ञानिकों के द्वारा किया गया है।अगहरकर रिसर्च इंस्टीट्यूट भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत एक स्वायत्तशासी संस्थान हैं।

आज के DNS में गेहूं की नवीनतम प्रजाति एमएसीएस 4028 की विशेषता के साथ-साथ भारत में खाद्य एवं पोषण सुरक्षा के संदर्भ इसके लाभों पर जानने की कोशिश करेंगे

भारत में गेहूं की फसल छह विभिन्न कृषि मौसमों के अंतर्गत उगाई जाती है।भारत के प्रायद्वीपीय क्षेत्र (महाराष्ट्र और कर्नाटक राज्यों) में, गेहूं की खेती प्रमुख रूप से वर्षा आधारित और सीमित सिंचाई परिस्थितियों में की जाती है। ऐसी परिस्थितियों में जल की कमी के कारण सूखा-झेलने वाली किस्मों की उच्च मांग है। इसके अलावा गेहूं की फसल कई बीमारियां एवं कीटों से भी प्रभावित होती है। इसी दिशा में अखिल भारतीय समन्वित गेहूं और जौ सुधार कार्यक्रम के अंतर्गत सुखा सहनशील,अधिक पैदावार,अल्प वर्धन काल एवं रोग प्रतिरोधक गुणों से युक्त गेहूँ की नयी किस्म को विकसित करने के प्रयास किए जा रहे थे।

इस दिशा में अगहरकर रिसर्च इंस्‍टीट्यूट, पुणे को सफलता मिली। आपको बता दें यह अनुसंधान कार्य भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के द्वारा नियंत्रित भारतीय गेहूं और जौ अनुसंधान संस्‍थान, करनाल के जरिये संचालित है।

गेहूं की यह नई किस्म एक अर्ध-बौनी (सेमी ड्वार्फ) किस्म है, जो 102 दिनों में तैयार होती है और जिसमें प्रति हेक्टेयर 19.3 क्विंटल उपज क्षमता है।इसके साथ ही गेहूं की यह प्रजाति में डंठल, पत्तों पर लगने वाला फंगस, पत्तों पर लगने वाले कीड़े और गेहूं में लगने वाले ब्राउन घुन जैसे बीमारियों के प्रति प्रतिरोधी है।

गेहूं की इस नई प्रजाति में प्रोटीन के उच्च स्तर के साथ-साथ पोषक तत्वों की भी पर्याप्त मात्रा विधमान है।

इसमें प्रोटीन का स्तर 14.7% एवं पोषक तत्वों में जस्ता (जिंक) 40.3 पीपीएम और 46.1 पीपीएम लौह सामग्री विद्यमान है। इसके साथ ही इस गेहूं की पिसाई गुणवत्ता भी अच्छी होती है।

गेहूं की इस नई प्रजाति में बायोफोर्टीफाइड विधि के द्वारा प्रोटीन और पोषक तत्वों के गुणों का समावेश किया गया है। आपको बता दें फूड फोर्टिफिकेशन के द्वारा किसी खाद्य पदार्थ में पोषक तत्वों का समावेश किया जाता है। यह दो प्रकार से होता है पहली विधि में जहां पोषक तत्वों को खाद्य सामग्री के प्रसंस्करण प्रक्रिया में जरूरी पोषक तत्वों का समावेश किया जाता है। उदाहरण के लिए आटा, ब्रेड
इत्यादि को बनाने के दौरान पोषक तत्वों को मिलाना।

वहीं दूसरी विधि में अनुवांशिक परिवर्तन के माध्यम से पौधों में इन गुणों का समावेश कर दिया जाता है। पौधों में अनुवांशिक परिवर्तन के द्वारा उससे प्राप्त उत्पादों में वांछित गुणों को समावेश कराने की प्रक्रिया को ही बायोफोर्टीफाइड कहा जाता है। उदाहरण के लिए गोल्डन राइस, एमएसीएस 4028

आइए अब गेहूं के इस प्रजाति से होने वाले लाभों के बारे में जानते हैं

गेहूं की यह प्रजाति भारत के राष्ट्रीय पोषण नीति की संकल्पना की दिशा में 2022 तक "कुपोषण मुक्त भारत" के लक्ष्य को हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में भुखमरी अप्रत्यक्ष भूख (हिडेन हंगर) से निपटने के प्रयासों को गति दी जा सकती है। आपको बता दें जब खाद्य पदार्थों में पोषक तत्वों की कमी वाली स्थिति को अप्रत्यक्ष भूख या हिडेन हंगर कहा जाता है। गेहूं की इस प्रजाति को संयुक्त राष्ट्र अंतर्राष्‍ट्रीय बाल आपात कोष (यूनीसेफ) के लिए कृषि विज्ञान केन्‍द्र (केवीके) कार्यक्रम द्वारा भी स्‍थायी रूप से कुपोषण दूर करने के लिए शामिल किया गया है।

रोग प्रतिरोधकता के कारण किसानों को अच्छी फसल प्राप्त होगी वही उच्च पैदावार के कारण किसानों की आर्थिक स्थिति भी अच्छी होगी। रोग प्रतिरोधक क्षमता एवं अल्प वर्धन काल के कारण इसको उपजाने में कुल होने वाली लागत भी कम होगी। इसके अलावा कीटनाशकों के प्रयोग नहीं होने एवं कम पानी के उपयोग से सतत कृषि को बढ़ावा मिलेगा। इस प्रकार यह फसल किसानों के सशक्तिकरण के साथ-साथ भारत में पोषण के स्तर को बढ़ाने में भी काफी मददगार होगी।