(Video) पूर्वोत्तर विशेष (North East Special) ब्रिटिश राज में आजाद नागालैंड (Nagaland: Independent Even in British Era)


(Video) पूर्वोत्तर विशेष (North East Special) ब्रिटिश राज में आजाद नागालैंड (Nagaland: Independent Even in British Era)


सन्दर्भ:

भारत का एक ऐसा इलाका जहां कोई भी अंग्रेज़ सिपाही जाने से कतराता था। भारत का वो इलाका जो अंग्रेज़ी हुक़ूमत में भी लगभग आज़ाद सा था। अंग्रेज़ अधिकारियों तक के रूह कंपा देने वाले भारत के उस इलाके को अंग्रेज़ अपनी कड़ी मशक्क्त के बावजूद भी कभी पूरे तरीक़े से अपने कब्ज़े में नहीं कर पाए।

पूर्वोतर विशेष में इस बार कहानी नागालैंड की जिससे अंग्रेज़ी हुक़ूमत के लोग भी खाते थे ख़ौफ़

भारत में अंग्रेज़ों का शासन था। अंग्रेज़ों की क्रूर नीतियां भारतीयों का गला घोंट रही थी। दक्षिण भारत की ओर से आए अंग्रेज़ भारत के सभी इलाक़ों पर कब्ज़ा जमाना चाहते थे। लेकिन पूर्वोतर भारत के कुछ इलाके अंग्रेज़ों के लिए टेढ़ी खीर थे। जिसमें मौजूदा नागालैंड भी शामिल था।

अंग्रेज़ी हुक़ूमत ने जब जब नागा इलाके की ओर बढ़ने की कोशिश की तो नागा समुदाय ने इसका जबरदस्त तरीके से विरोध किया। नागा हिल्स में क़रीब 50 से ज़्यादा कबीले थे। गुरिल्ला युद्ध में माहिर ये कबीले अंग्रेज़ों के लिए बड़ी चुनौती थे। नागा समाज में अपने दुश्मनों का सर काटने की भी एक बहुत ही अनोखी परम्परा थी। नागा समाज की ये परंपरा अंग्रेज़ों के रोंगटे खड़े कर देती थी। जिसके कारण अंग्रेज़ कभी भी इस इलाक़े को अपने कब्ज़े में नहीं कर पाए।

नागा समुदाय के लोग शुरू से ही आज़ाद ख़यालों वाले लोग थे। वे अक्सर असम घाटी, काछार और मणिपुर इलाकों में छापेमारी भी करते थे। 1832 में क़रीब 100 से अधिक सिपाहियों के साथ ब्रिटिश अधिकारी के साथ नागा इलाके में पहुंचे। ये सैनिक नागाओं की बस्तियों से असम को मणिपुर से जोड़ने के लिए एक रास्ता बनाना चाहते थे। लेकिन नागा समुदाय ने अंग्रेज़ अधिकारियों की एक न सुनी और आख़िरकार उन्हें वापस लौटने पर मजबूर होना पड़ा।

दरअसल ब्रिटिश सरकार नागा इलाक़े में चाय के बागानों से राजस्व हांसिल करना चाहती थी। जिसके लिए अंग्रेज़ों ने नागा इलाके को अपने कब्ज़े में करने के लिए कई प्रयास किए। लेकिन 1849 में नागा इकाले का दौरा करने आये सिपाहियों का भी नागाओं ने हत्या कर दी थी। जिसके बाद नागाओं का ख़ौफ़ ब्रिटिश हुक़ूमत में और बढ़ गया और अंग्रेज सरकार ने पूर्वोतर के कई इलाकों से अपनी चौकियों को भी हटा लिया।

नागा समाज अंग्रेज़ों को ‘कंपनी के लोगों’ के रूप में जानते थे। और हमेशा उन पर हमला करने के लिए तैयार रहते थे। एक बार कोहिमा इलाके में मौजूद ब्रिटिश आर्मी को क़रीब 6000 से अधिक नागा कबीलों ने घेर लिया। जिसके बाद ब्रिटिश आर्मी ने बड़ी मुसीबत से अपनी जान बचाई।

जॉन ऑफ़ आर्क और पूर्वोत्तर की रानी लक्ष्मी बाई के नाम से मशहूर रानी गाइदिन्ल्यू भी नागा आंदोलन का हिस्सा रहीं थी। 13 साल की छोटी सी उम्र में ही रानी गाइदिन्ल्यू ने ब्रिटिश हुक़ूमत के ख़िलाफ़ जंग शुरू कर दी थी। वो हमेशा पूर्वोत्तर की छोटी छोटी जनजातियों के साथ मिलकर ब्रिटिश हुक़ूमत से ख़ुद आज़ाद रखने का प्रयास करतीं। रानी गाइदिन्ल्यू ने अंग्रेज़ों से लड़ने के लिए 4 हज़ार योद्धाओं की एक सशस्त्र सेना का भी निर्माण किया था। रानी गाइदिन्ल्यू के निडर और साहसी स्वभाव के कारण ही अंग्रेज़ उन्हें खूंखार नेत्री भी कहते।

नागा आन्दोलन को दबाने के लिए अंग्रेज़ों ने कई बार वहाँ के गांवों को जलाकर राख कर दिए। लेकिन इससे भी नागा समाज पीछे नहीं हटा। नागा हिल्स इन सब के बावजूद भी अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ जबरदस्त संघर्ष किया। अंग्रेज़ों को अब लगने लगा था कि नागा समाज पर इस तरीके से शासन नहीं किया जा सकता है। जिसके बाद 1880 में अंग्रेज़ों ने अपनी नीतियों में बदलाव किया और अपनी नई नीति के ज़रिए ब्रिटिश हुक़ूमत नागा हिल्स के एक बड़े हिस्से पर अपनी पकड़ मज़बूत बनाने में सफल हो गई।

ब्रिटिश नीतियों के नागा समुदाय पर हावी होने से वहां पर काफी बदलाव आया। अंग्रेज़ों के साथ-साथ ब्रिटिश मिशनरीज भी नगा हिल्स में दाख़िल होने लगे। ब्रिटिश मिशनरीज ने नागाओं के बीच वेस्टर्न कल्चर का जोर शोर से प्रसार किया। जिसके चलते नागा समुदाय अपनी संस्कृति और परम्पराओं से दूर होने लगे।

1881 के बाद नागा हिल्स पर भी अंग्रेज़ों ने ब्रिटिश भारत की ही तरह शासन करना शुरू कर दिया। लेकिन अंग्रेज़ों का ये बर्ताव नागाओं को कभी भी रास नहीं आया। नागा समुदाय के लोग ब्रिटिश सैनिकों के नियम कायदों पर ज़्यादा ध्यान नहीं देते थे। और 1918 तक आते-आते नागा हिल्स को एकजुट करने के लिए एक क्लब भी बनाया गया। जिसका नाम था - नागा क्लब भारत में साइमन कमीशन आने के 2 साल बाद नागा हिल्स ने ब्रिटिश सरकार के सामने कुछ मांगे रखी। ये मांगे 10 जनवरी 1929 को रखी गईं थी। जिसे "सबमिशन ऑफ़ मेमोरंडम टू द साइमन कमीशन" भी कहा जाता है। नागा समुदाय की मांग थी कि उनके उपर किसी भी तरह की पाबंधी न लगाई जाय। नागा हिल्स ने कहा कि - "हम से वसूला जाने वाला फसल कर पूरी तरह से ग़लत है क्यूंकि हमारी ज़मीने खेती के लायक नहीं है "

नागा हिल्स ने इस मेमोरंडम में अंग्रेज़ों को अपने इलाके से भी लौट जाने की पेशकश की। नागा हिल्स का मानना था कि - अंग्रेज़ों ने हम पर कोई विजय नहीं पाई है और न ही किसी शर्त के मुताबिक़ ग़ुलाम रहने के उन्होंने हमे मजबूर किया है। हम हमेशा से ही आज़ाद रहे हैं और आगे भी हम यही चाहते हैं। साइमन कमीशन ने नागालैंड की ये बातें मान ली। जिसके बाद नागा समुदाय अंग्रेज़ों के क़ानूनों से दूर रहा।

ये सब कुछ जब चल रहा था तो नागा हिल्स असम क्षेत्र का ही हिस्सा था। लेकिन बाद में नागा हिल्स ख़ुद को असम से भी अलग किए जाने की मांग करने लगा। हालांकि नागा हिल्स की ये मांग कुछ दिन बाद ही ख़त्म हो गई। देश बंटवारे के उस दौर में जब पूर्वोतर भारत को उस वक़्त के बंगाल में शामिल किए जाने की बात हुई तो पूरे असम क्षेत्र ने इसका खुलकर विरोध किया। क्यूंकि पूर्वोत्तर के लोग अपनी संस्कृति को लेकर काफी मशहूर रहे हैं। नागा समुदाय को भी डर था कि अगर हम बंगाल में शामिल होते हैं तो इसका असर हमारे कल्चर पर पड़ेगा। साथ ही मुस्लिम लीग ने पहले ही भारत पकिस्तान बंटवारे की बात कह दी थी। जिसके बाद मुस्लिम क्षेत्र वाले बंगाल को भी पकिस्तान में शामिल किए जाने की सम्भावना थी और फिर बाद में हुआ भी यही...

इन सब कारणों के चलते नागा हिल्स की असम से अलग किए जाने की मांग तो रुक गई लेकिन नागा हिल्स अब भारत से भी आज़ादी चाहता था।

पूर्वोत्तर विशेष के हमारे दूसरे एपिसोड में देखिए कहानी उस शख़्स की जिसने नागा हिल्स को भारत से अलग कराने में कोई भी कसर नहीं छोड़ी।

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