(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) कंकालों की झील रूपकुंड का रहस्य (Mystery of Skeletons Lake : Roop Kund)


(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी)  कंकालों की झील रूपकुंड का रहस्य (Mystery of Skeletons Lake : Roop Kund)



उत्तराखंड में मौजूद हिमालय पर लगभग 5,029 उनतीस मीटर की ऊंचाई पर स्थित रूपकुंड झील की.......हर साल जब यहाँ बर्फ पिघलती है तो जो नज़ारा दीखता है वो चौंकाने वाला होता है....यहाँ मौजूद है नर कंकाल.... और इन्ही कंकालों की वजह से यह झील काफी मशहूर है....

रुपकुंड झील के किनारे कंकालों के पाए जाने के पीछे आखिर क्या रहस्य छुपा हुआ है और यहां इतने सारे कंकाल कहां से आए?...आखिरकार इस बात का पता चल ही गया...हालांकि इस बारे में कई तरह की बाते सुनने को मिलती हैं. ....

उस रहस्य के पीछे की वजह जाने से पहले जानते है रहस्यमयी झील रुपकुंड के बारे में उत्तराखंड के चमोली जिले के सीमांत देवाल विकासखंड में पर स्थित प्रसिद्ध नंदादेवी राजजात मार्ग पर नंदाघुंघटी और त्रिशूली जैसे विशाल हिम शिखरों की छांव में स्थित है रूपकुंड झील.....त्रिशूली शिखर (24000 फीट) की गोद में च्यूंरागली दर्रे के नीचे 12 मीटर लंबी, दस मीटर चौड़ी और दो मीटर से अधिक गहरी हरे-नीले रंग की अंडाकार आकृति वाली यह झील साल में करीब छह माह बर्फ से ढकी रहती है....

इसी झील से रूपगंगा की धारा भी फूटती है...झील की सबसे बड़ी खासियत है इसके चारों ओर पाए जाने वाले रहस्यमय प्राचीन नरकंकाल, अस्थियां, विभिन्न उपकरण, कपड़े, गहने, बर्तन, चप्पल आदि। इसलिए इसे रहस्यमयी झील का नाम दिया गया है...

रूपकुंड में 12 साल में एक बार होने वाली नंदा देवी राज जात यात्रा में भाग लेने के लिए श्रद्धालु दूर-दूर से यहां आते हैं....इस दौरान देवी नंदा की पूजा की जाती है...

क्या है झील का रहस्य

कोई कहता है कि ये कंकाल किसी राजा की सेना के जवानों के हैं, तो कोई इनके तार सिकंदर के दौर से जोड़ता है। लेकिन, सच अभी भी भविष्य के आगोश में है....

कंकाल झील के रहस्य से पर्दा उठानेवाले कुछ वैज्ञनिकों का कहना है कि जमी झील के पास मिले लगभग 200 कंकाल नौवीं सदी के उन भारतीय आदिवासियों के हैं जो ओले की आंधी में मारे गए थे. रूपकुंड में नरकंकाल की खोज सबसे पहले वर्ष 1942 बयालीस में नंदा देवी रिजर्व के गेम रेंजर हरिकृष्ण मधवाल ने की थी। मधवाल दुर्लभ पुष्पों की खोज में यहां आए थे। इसी दौरान अनजाने में वह झील के भीतर किसी चीज से टकरा गए। देखा तो वह एक कंकाल था। झील के आसपास और तलहटी में भी नरकंकालों का ढेर मिला। यह देख रेंजर मधवाल के साथियों को लगा मानो वे किसी दूसरे ही लोक में आ गए हैं। उनके साथ चल रहे मजदूर तो इस दृश्य को देखते ही भाग खड़े हुए। इसके बाद शुरू हुआ वैज्ञानिक अध्ययन का दौर। 1950 में कुछ अमेरिकी वैज्ञानिक नरकंकाल अपने साथ ले गए। अब तक कई जिज्ञासु-विशेषज्ञों के दल भी इस रहस्यमय क्षेत्र की ऐतिहासिक यात्रा कर चुके हैं। भूगर्भ वैज्ञानिकों व विशेषज्ञों के एक दल ने भी यहां पहुंचकर परीक्षण किया....

शुरुआत में माना जा रहा था कि यह नर कंकाल उन जापानी सैनिकों के थे जो द्वितीय विश्‍व युद्ध के दौरान इस रास्‍ते से गुजर रहे थे. लेकिन अब वैज्ञानिकों की मानें तो ये कंकाल 850 ईसवी में यहां आए श्रद्धालुओं और स्‍थानीय लोगों के हैं....

शोध से यह भी खुलासा हुआ है कि कंकाल मुख्‍य रूप से दो समूहों के हैं. इनमें से कुछ कंकाल एक ही परिवार के सदस्‍यों के हैं, जबकि दूसरा समूह अपेक्षाकृत कद में छोटे लोगों का है...

शोधकर्ताओं का कहना है कि उन लोगों की मौत किसी हथियार की चोट से नहीं बल्कि एक घातक तूफान से सिर में फ्रैक्चर होने की वजह से हुई है. खोपड़ियों के फ्रैक्चर के अध्ययन के बाद पता चला है कि मरने वाले लोगों के ऊपर क्रिकेट की गेंद जैसे बड़े ओले गिरे थे....

पहले कहा जाता था कि यह खोपड़ियां कश्‍मीर के जनरल जोरावर सिंह और उसके आदमियों की हैं, जो 1841इकतालीस में तिब्‍बत के युद्ध से लौट रहे थे और खराब मौसम की चपेट में आ गए थे.

ऐसा भी कहा जाता था कि ये लोग संक्रामक रोग की चपेट में आ गए होंगे या फिर तालाब के पास आत्‍महत्‍या की कोई रस्‍म निभाई गई होगी....

ब्रिटिश व अमेरिका के वैज्ञानिकों ने यह भी पाया कि अवशेषों में तिब्बती लोगों के ऊन से बने बूट, लकड़ी के बर्तनों के टुकड़े, घोड़े की साबूत रालों पर सूखा चमड़ा, रिंगाल की टूटी छंतोलियां और चटाइयों के टुकड़े शामिल हैं। याक के अवशेष भी यहां मिले, जिनकी पीठ पर तिब्बती सामान लादकर यात्रा करते हैं...अवशेषों में खास वस्तु बड़े-बड़े दानों की हमेल है, जिसे लामा स्त्रियां पहनती थीं। वर्ष 2004 में भारतीय और यूरोपीय वैज्ञानिकों के एक दल ने भी संयुक्त रूप से झील का रहस्य खोलने का प्रयास किया.....

वहीँ दुसरे और स्थानीय लोगों की माने तो एक बार जसधावल नाम का एक राजा था...जो नंदा देवी तीर्थ यात्रा पर निकला...ऐसा कहा जाता है की वो अकेले नही था...पुरे लाव लश्कर के साथ यात्रा पर निकला था...स्थानीय पंडितों ने राजा को इतने भव्य समारोह के साथ देवी दर्शन को मना किया...लेकिन वो नही माना..जैसा की तय था इस शोर शराबे और दिखावे से देवी माँ क्रोधित हो गयी और राजा समेत उसके परिवार और सैनिकों पर अपना क्रोध दिखाते हुए सबको मौत के घाट उतार दिया मिले अवशेषों में कुछ चूड़ियाँ और अन्य गहने मिलें जिससे यह पता चलता है की समूह में महिलाएं भी मौजूद थी ....

कंकाल झील के रहस्य से पर्दा उठानेवाले कई शोध हुए...हर किसीके अपने मत है....कई कहानियाँ और कई बातें लेकिन बावजूद इसके रहस्य अब भी बरकरार है.....