(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) क्यों मानते है मुस्लिम महिला अधिकार दिवस (Muslim Women Rights Day)


(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) क्यों मानते है मुस्लिम महिला अधिकार दिवस (Muslim Women Rights Day)



पिछले साल अगस्त माह में ही ऐतिहासिक तीन तलाक विधेयक पास किया गया था। इस ऐतिहासिक बिल के 1 साल पूरे होने पर मौजूदा केंद्र सरकार ने 1 अगस्त को मुस्लिम महिला अधिकार दिवस के रूप में मानाने की घोषणा की है। इस मौके पर कई कैबिनेट मंत्रियों ने ट्वीट करके इस कानून की प्रशंशा की। गौर तलब है की तीन तलाक़ कानून तलाक इ बिद्दत या तीन तलाक़ देने के रिवाज़ को एक संगीन जुर्म करार देता है

इस कानून को शुरुआती दौर में मुस्लिम महिला विवाह अधिकार सुरक्षा कानून 2019 के नाम से जाना जाता था। संसद के निचले और उच्च सदन में एक लम्बी और तीखी बहस के बाद यह विधेयक पिछले साल दोनों सदनों से पारित हो गया था। हालांकि बहस के दौरान विपक्षी पार्टियों ने इसे मुस्लिम समुदाय पर हमला करार दिया था जबकि केंद्र सरकार ने इसे मुस्लिम महिलाओं के लिए लैंगिक न्याय का दर्ज़ा दिया था

केंद्र सरकार ने तीन तलाक़ जैसे संगीन अपराध को समाज के लिए एक कलंक बताया और कहा की ऐसे कानून महिला सशक्तिकरण का एक अनूठा उदहारण है। इस मौके पर कानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद और अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री मुख्तार अब्बास नक़वी समेत अन्य मंत्रियों ने ट्ववीट कर इस कदम को ऐतिहासिक और काल जयी बताया था।

शाह बानो से लेकर शायरा बानो तक मुस्लिम औरतें दशकों से तीन तलाक़ के दंश को झेलती आ रही हैं। मुस्लिम महिलाओं को समाज में इज़्ज़त और बराबरी का हक़ भी नहीं दिया जाता है। इस ज़िल्लत से मुस्लिम महिलाओं को 1 अगस्त 2019 में एक कानून के ज़रिये मुक्ति मिल गयी।

तीन तलाक़ कानून के एक साल पूरा होने के मौके पर देश की मुस्लिम महिलाओं को एक वीडियो कांफ्रेंस के ज़रिये सम्बोधित करते हुए श्री नक़वी ने कहा की इस कानून के बाद देश में तीन तलाक़ से जुड़े मामलों में काफी कमी दिखाई दी है।

तीन तलाक़ का मसला नया नहीं है लेकिन दशकों से इस मसले पर सिर्फ सियासत ही हुई है। शाह बानो का मामला हो या शायरा बानो का या देश की किसी भी मुस्लिम महिला का तलाक़ के नाम पर उन्हें हमेशा THAGAA गया है। मज़हब की आड़ में उनके साथ SIR अन्याय ही हुआ है। इन्साफ की गुहार हमेशा अनसुनी की गयी और सिर्फ मामले को वोट बैंक के लिए उछाला गया। कमज़ोर राजनीतिक इच्छाशक्ति और सियासत के चलते मुस्लिम महिलाओं की पीड़ा हमेशा ही अनदेखी रही।

इस कानून के मुताबिक़ मोटे मोटे तौर पर तीन तलाक़ या तलाक़ ऐ बिद्दत या इसी तरह का कोई भी तलाक़ इस कानून के तहत गैर कानूनी माना जाएगा। कोई भी मुस्लिम पति जो अपनी पत्नी को इस तरह तलाक़ देगा उसे इस कानून के तहत तीन साल की क़ैद और जुर्माना देना होगा।

इसके अलावा इस कानून में कुछ और भी प्रावधान भी शामिल थे जिनमे तीन तलाक देने पर पत्नी स्वयं या उसके करीबी रिश्तेदार ही इस बारे में केस दर्ज करा सकेंगे. महिला अधिकार संरक्षण कानून 2019 बिल के मुताबिक एक समय में तीन तलाक देना अपराध है. इसलिए पुलिस बिना वारंट के तीन तलाक देने वाले आरोपी पति को गिरफ्तार कर सकती है. एक समय में तीन तलाक देने पर पति को तीन साल तक कैद और जुर्माना दोनों हो सकता है. मजिस्ट्रेट कोर्ट से ही उसे जमानत मिलेगी.

मजिस्ट्रेट बिना पीड़ित महिला का पक्ष सुने बगैर तीन तलाक देने वाले पति को जमानत नहीं दे पाएंगे. तीन तलाक देने पर पत्नी और बच्चे के भरण पोषण का खर्च मजिस्ट्रेट तय करेंगे, जो पति को देना होगा. तीन तलाक पर बने कानून में छोटे बच्चों की निगरानी और रखावाली मां के पास रहेगी. इस कानून में समझौते के विकल्प को भी रखा गया है. हालांकि पत्नी के पहल पर ही समझौता हो सकता है लेकिन मजिस्ट्रेट की ओर से उचित शर्तों के साथ.