(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) डूबता दूरसंचार उद्योग (Loss Making Telecom Sector)


(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) डूबता दूरसंचार उद्योग (Loss Making Telecom Sector)


भूमिका:

भारतीय दूरसंचार उद्योग दुनिया के सबसे बड़े दूरसंचार बाज़ारों में से एक है। उदाहारण के लिए भारत कुल इंटरनेट उपयोगकर्ताओं के मामले में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा बाजार है। इसके अलावा ग्राहक की संख्या के आधार पर भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा दूरसंचार बाजार भी है। अगले पांच वर्षों मेंभारत में 500 मिलियन नए इंटरनेट उपयोगकर्ता जुड़ेंगे, जिससे नए व्यवसायों के अवसर पैदा होंगे।

इन सबके बावजूद भारतीय दूरसंचार उद्योग पर संकट के बादल मंडरा रहे है। भारत की सबसे बड़ी टेलीकॉम कंपनियों में शामिल वोडाफ़ोन-इंडिया को दूसरी तिमाही में रिकॉर्ड 74,000 करोड़ रुपये का घाटा हुआ है। ऐसी संभावना जतायी जा रही है कि कई दूरसंचार कंपनिया भारत में अपना कारोबार बंद कर सकती है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू (एजीआर) के सन्दर्भ में सरकार के पक्ष में फ़ैसला दिया है। इसके कारन टेलीकॉम कंपनियों को एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू के रूप में सरकार को 83,000 करोड़ रुपये का भुगतान करना होगा। इसके परिणामस्वरूप कंपनियों का नुक्सान अब और बढ़ जायेगा। उदाहारण के लिए एजीआर में अकेले वोडाफ़ोन इंडिया का हिस्सा 40,000 करोड़ रुपये का है।

एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू (एजीआर) के तहत दूरसंचार कंपनियों को अपनी कमाई का एक हिस्सा सरकार के दूरसंचार विभाग के साथ साझा करना होता है . एजीआर की परिभाषा को लेकर टेलीकॉम कंपनियां और सरकार के बीच 2005 से ही मतभेद हैं। कंपनियां का तर्क है कि एजीआर में केवल टेलीकॉम से प्राप्त राजस्व को जोड़ा जाए। जबकि सरकार गैर टेलीकॉम राजस्व जैसे कि जमा पर अर्जित ब्याज और संपत्ति की बिक्री को भी एजीआर में शामिल करना चाहती थी। जिसमे सुप्रीम कोर्ट ने एजीआर के सन्दर्भ में सरकार के पक्ष में फ़ैसला दिया है।

किन कारणों से दूरसंचार उद्योग पर संकट के बादल मंडरा रहे है?

  • भारत में लाइसेंस शुल्क दुनिया में सबसे अधिक है। इससे दूरसंचार उद्योग की लागत काफी उच्च हो जाती है।
  • पिछले वर्षों में कंपनियों की सकल आय में 15% से 20% की गिरावट आई है। इसके अलावा, प्रति उपयोगकर्ता वॉयस और डेटा राजस्व में भी गिरावट आई है।
  • विकसित एवं विकासशील की तुलना में भारत में स्पेक्ट्रम की उपलब्धता कम है एवं स्पेक्ट्रम की कीमत भी उच्च है। इस कारण से मोबाइल ऑपरेटरों की लागत अधिक होने के साथ सेवाओं को प्रदान करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
  • भारतीय दूरसंचार उद्योग में रिलायंस जियो के प्रवेश के साथ गलाकाट प्रतिस्पर्धा और टैरिफ युद्ध प्रारंभ हुआ। इससे अन्य दूरसंचार ऑपरेटरों को वॉयस और डेटा दोनों के लिए टैरिफ दरों में करना पड़ा।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में दूरसंचार ऑपरेटरों को अवसंरचना खामियों (बिजली और सड़क) के कारण दूरसंचार परियोजना के विस्तार में विलंब होता है। इससे दूरसंचार अवसंरचना को स्थापित करने में कंपनियों की लागत बढ़ जाती है।
  • राज्य सरकारों के द्वारा ऑप्टिकल फाइबर बिछाने के एवज के रूप में अत्यधिक शुल्क लिया जाता है।
  • सेलुलर बुनियादी अवसंरचना के संचालन और रखरखाव के लिए प्रशिक्षित कर्मियों की कमी।
  • प्रतिकूल सरकारी वातावरण के कारन डेटा आधारित उत्पादों और सेवाओं के रोल आउट में देरी से टेलीकॉम सेक्टर की प्रगति बाधित हो रही है।
  • देश में ब्रॉडबैंड की निम्न उपलब्धता चिंता का विषय है और सरकार को इस क्षेत्र में बहुत अधिक काम करने की आवश्यकता है।
  • व्हाट्सएप, ओला, उबेर इत्यादि जैसे ओवर द टॉप सर्विसेस प्रदाता को दूरसंचार कंपनी से अनुमति या संधि की आवश्यकता नहीं होती है। यह दूरसंचार सेवा प्रदाता के राजस्व को बाधित करता है।

सरकार द्वारा दूरसंचार उद्योग को बढ़ावा देने के लिए उठाए गए कदम

  • राष्ट्रीय दूरसंचार नीति 2018 तैयार करना जिसके निम्नलिखित घटक है-
  1. 2022 तक दूरसंचार क्षेत्र में 100 बिलियन अमेरिकी डॉलर के निवेश की परिकल्पना की गई है।
  2. प्रत्येक नागरिक को 50 एमबीपीएस की सार्वभौमिक ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी प्रदान करना;
  3. 2020 तक सभी ग्राम पंचायतों को 1 Gbps और 2022 तक 10 Gbps की कनेक्टिविटी उपलब्ध कराना
  4. कौशल निर्माण की दिशा में एक मिलियन युवा जनशक्ति को प्रशिक्षित करना;
  5. इंटरनेट ऑन थिंग्स जैसे अवसंरचना तंत्र का विस्तार करते हुए इसमें 5 अरब उपकरणों को जोड़ना;
  6. राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस कार्यक्रम के तहत 1 मिलियन कॉमन सर्विस सेंटर स्थापित करना।
  • टेलीकॉम सेक्टर में एफडीआई को बढ़ाकर 100 फीसद कर दिया गया है। इसमें 49 फीसद ऑटोमेटिक रूट के तहत है और बाकी को एफआईपीबी रूट के तहत स्वीकृत किया जाएगा।
  • डार्क फाइबर, इलेक्ट्रॉनिक मेल और वॉयस मेल जैसे बुनियादी ढांचा प्रदाताओं के लिए 100 प्रतिशत एफडीआई की अनुमति है।
  • भारत सरकार के द्वारा दूरसंचार उद्योग को बढ़ावा देने के लिए डिजिटल इंडिया कार्यक्रम की शुरुआत की गई है जिसके तहत भारतीय अर्थव्यवस्था के सभी घटकों को इंटरनेट के माध्यम से जोड़ा जाएगा।

दूरसंचार उद्योग के उत्थान के लिए उठाए जाने वाले अपेक्षित कदम

  • सरकार को विकसित देशों के सामान स्पेक्ट्रम की उपलब्धता बढ़ाने की दिशा में काम करना चाहिए। इसके लिए इंफ्रास्ट्रक्चर शेयरिंग को बढ़ावा दिया जाए जिससे टेलीकॉम कंपनियां अपने ग्राहकों को नए और अभिनव उत्पाद प्रदान कर सकें।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में टैली डेंसिटी बढ़ाने के लिए वहनीय लागत के स्मार्टफोन के साथ-साथ निम्न टैरिफ दरों को सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाना चाहिए।
  • सरकार को गला काट प्रतिस्पर्धा एवं प्राइस वार से उद्योग को बचाने के लिए एक न्यूनतम मूल्य निर्धारित करना चाहिए
  • लाइसेंस शुल्क को कम करना चाहिए।
  • स्पेक्ट्रम नीलामी के संदर्भ में आरक्षित मूल्य व्यवहारिक बनाने पर बल दिया जाना चाहिए।
  • सार्वभौमिक कनेक्टिविटी सुनिश्चित करने के लिए महंगे तांबे के केबल के प्रयोग की के बजाय ऑप्टिकल फाइबर को बढ़ावा देना चाहिए।
  • सरकार को मोबाइल हैंडसेट, सीसीटीवी, टच स्क्रीन इत्यादि जैसे हार्डवेयर घटकों के विनिर्माण और निर्यात बढ़ावा देने के लिए आरएंडी पर अधिक खर्च करना चाहिए।

निष्कर्ष: भारत में दूरसंचार क्षेत्र को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है उदाहरण के लिए स्पेक्ट्रम की उपलब्धता बनाए रखना, नई तकनीकों को अपनाना, ग्राहकों को नए-नए सेवाओं एवं उत्पादों को उपलब्ध करवाना एवं सरकार एवं नियामक एजेंसियों के साथ तालमेल बनाए रखना। उपरोक्त चुनौती भरे परिदृश्य में आवश्यक है कि सरकार दूरसंचार उद्योग को अनुकूल वातावरण उपलब्ध करवाएं। इसके लिए सरकार को स्पेक्ट्रम एवं लाइसेंस के मूल्य में कमी करने के साथ-साथ ग्रामीण अवसंरचना विकास में सहयोग देना होगा। इसके साथ ही दूरसंचार ऑपरेटरों को राजस्व के विभिन्न स्रोतों (उदाहरण के लिए विभिन्न डेटा सेवाओं से राजस्व) को भी विकल्प उपलब्ध करवाना होगा क्योंकि केवल वॉयस राजस्व दूरसंचार आपरेटरों के लिए पर्याप्त नहीं होगा।




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