(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) भारत में टिड्डियों का प्रकोप (Locust Outbreak in India)


(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) भारत में टिड्डियों का प्रकोप (Locust Outbreak in India)



संयुक्त राष्ट्र की एक भविष्यवाणी के मुताबिक़ भारत इस वक़्त टिड्डियों की सेना से लड़ रहा है जो पूरे देश में झुण्ड के झुण्ड हमला कर रही है…जानकारों का मानना है कि इस तरह का टिड्डी हमला पिछले 26 सालों में नहीं हुआ। देश में वैसे तो टिड्डियों का हमला काफी सालों से हो रहा है लेकिन सबसे बड़ा हमला 1993 तिरानवे में हुआ था....

लेकिन इन सालों में सरकार की मुस्तैदी और तैयारी के चलते इस मुसीबत से निजात पा ली गयी। जब भारत समेत पूरी दुनिया कोरोना जैसी वैश्विक महामारी के चलते थप पडी हुई है तो टिड्डियों का ये झुण्ड भारत के किसानों की फसल चपत करने में लगा हुआ है। इस बार ये टिड्डियां ईरान के रास्ते पाकिस्तान से होते हुए भारत पहुंची हैं। सबसे पहले इन्होंने पंजाब और राजस्थान में फसलों को नुकसान पहुंचाया और अब यह दल झांसी पहुंच गया है।

आज के DNS में हम इन्ही सवालों के जवाबों को तलाशने की कोशिश करेंगे कि क्या हैं टिड्डियाँ , भारत के लिए ये क्यों है खतरे की वजह और हम किस तरह इस खतरे से निपटेंगे।

दुनियाभर में टिड्डियों की 10 हजार से ज्यादा प्रजातियां मौजूद हैं। भारत में टिड्डियों के महज़ चार प्रजाति ही मिलती हैं। इन प्रजातियों में रेगिस्तानी टिड्डा, प्रव्राजक टिड्डा, बंबई टिड्डा और पेड़ वाला टिड्डा शामिल हैं। इन सभी प्रजातियों में रेगिस्तानी टिड्डों को सबसे ज्यादा खतरनाक माना गया है। इसकी वजह इनके द्वारा होने वाला नुक्सान है। रेगिस्तानी टिड्डों का दल हरे-भरे घास के मैदानों में आने पर खतरनाक रूप ले लेता हैं। आंकड़ों पर गौर करें तो रेगिस्तानी टिड्डों की वजह से दुनिया की दस फीसदी आबादी के जीवन पर असर हुआ है।

यूँ तो ये कीड़े आम तौर पर खतरनाक नहीं होते। मानसून के आने पर या तूफानों की वजह से इनकी प्रजनन क्षमता 3 महीने के दौरान तकरीबन 20 गुना बढ़ जाती है। टिड्डों की आबादी बढ़ने पर इनके बर्ताव में बदलाव होने लगता है जिससे ये झुण्ड बनाकर खेत की फसलों को बर्बाद करना शुरू कर देते हैं

FAO के मुताबिक़ एक वयस्क टिड्डा हर दिन अपने भार के बराबर तकरीबन 2 ग्राम भोजन खा सकता है । 1 वर्ग किलोमीटर के दायरे का झुण्ड अपने साथ तकरीबन 4-8 करोड़ टिड्डों को साथ रखता है जो हर दिन लगभग 35,000 लोगों का खाना खाने की क्षमता रखते हैं। ये झुण्ड दिन भर में करीब 120- 150 किलोमीटर की दूरी तय कर लेता है। रेगिस्तानों टिड्डों का जीवन 3-5 महीने का होता है हालांकि ये मौसम और पारिस्थितिकी पर भी निर्भर करता है। यहां पर ये जानना बेहद ज़रूरी है कि ये टिड्डी दल आदमी या जानवरों को सीधे सीधे कोई नुक्सान नहीं पहुंचाता।

टिड्डियों की आबादी में बढ़ोत्तरी की ख़ास वजह ग्लोबल वार्मिंग के चलते मौसम में आ रहा बदलाव है। जानकारों का मानना है कि एक मादा टिड्डी तीन बार तक अंडे दे सकती है। मादा टिड्डी एक बार में 95 पचानवे -158 अट्ठावन अंडे तक दे सकती हैं। टिड्डियों के एक वर्ग मीटर में एक हजार अंडे हो सकते हैं। इनका जीवनकाल तीन से पांच महीनों का होता है। रेगिस्तानी टिड्डे रेत में अंडे देते हैं, लेकिन जब ये अंडों को फोड़कर बाहर निकलते हैं, तो भोजन की तलाश में नमी वाली जगहों की तरफ बढ़ते हैं। इससे नमी वाले इलाकों में टिड्डियों का खतरा ज्यादा होता है।

टिड्डियों की तादाद और हमले बढ़ने के पीछे की एक बड़ी वजह बेमौसम बारिश भी है। पिछले एक साल के दौरान, भारत और पाकिस्तान समेत पूरे इलाके में बेमौसम बारिश हुई है। इस कारण नमी की वजह से ये तेजी से फैलीं । वैज्ञानिकों का कहना है कि पहले प्रजजन काल में टिड्डियां 20 गुना, दूसरे में 400 और तीसरे में 1,600 गुना तक बढ़ जाती हैं।

मध्य प्रदेश राजस्थान जैसे बड़े राज्य आज टिड्डियों के शिकार हैं। टिड्डियों का मौजूदा झुण्ड पूर्वी अफ्रीका में पैदा हुआ और पाकिस्तान से भारत में घुसा। टिड्डियों के झुण्ड ने मध्य प्रदेश के दर्जनों और राजस्थान के तकरीबन 18 और अब उत्तर प्रदेश के लगभग17 ज़िले टिड्डियों के हमले से परेशान हैं।

संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि इन राज्यों के अलावा भी कई राज्य टिड्डियों के हमले के शिकार हो सकते है। इसके अलावा इसहमले के चलते भारत की खेती को अच्छा खासा नुक्सान उठाना पड़ सकता है। खेती पर आंच आने पर भारत की अर्थव्यवस्था पर भी गहरा असर पड़ सकता है।

आम तौर पर भारत टिड्डियों के हमले से वाहनों या विमानों से रसायन का छिड़काव करके टिड्डियों की समस्या से निजात पा लेता है लेकिन इस बार टिड्डियों ने अपने हमले की रणनीति को बदल दिया है। आम तौर पर टिड्डे कम ऊँचाई पर उड़ते देखे जाते हैं लेकिन इस बार ये ज़्यादा ऊँचाई पर उड़ रहे हैं।

कुछ मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत पाकिस्तान और ईरान के साथ मिलकर इन टिड्डियों के हमले से निजात पाने की कोशिश कर रहा है। हालांकि टिड्डियों के इस हमले को भारत को एक आपदा की तरह लेना होगा। जहां भारत के आर्थिक हालात पहले से ही कोरोना जैसी वैश्विक महामारी और अम्फान चक्रवात जैसी आपदा के चलते बिगड़े हुए हैं ऐसे में अगर जल्द ही इस आपदा से निपटने के लिए ज़रूरी कदम नहीं उठाये गए तो हालात बाद से बदतर हो सकते हैं।