(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) खराई ऊँट : कच्छ के तैरने वाले ऊँट (Kharai Camels : The Swimming Camels of Kachch)


(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) खराई ऊँट : कच्छ के तैरने वाले ऊँट (Kharai Camels : The Swimming Camels of Kachch)



ऊंट रेगिस्तान के जहाज़ के नाम से जाना जाता है....क्यूंकि ऊंट रेगिस्तान की रेत में पर बेहद ही आराम से चल सकते है....ये तो सभी जानते है...लेकिन हैरानी तब होती है जब ये सुनने में आये की ऊंट पानी में तैराकी भी बहुत अच्छी करते है....जी हाँ ऊँटों की एक ऐसी प्रजाति भी है जो समुद्र में तैरने के लिए माहिर है....और इनके संरक्षण को लेकर सरकार ने अपने जिम्मेदारी भी समझी है...

आज DNS कार्यक्रम में जानते है ऊंट की इसी प्रजाति के बारे में....ये क्यूँ ख़ास है...दुसरे ऊँटों से कैसे अलग है ..? भारत में कहाँ पायी जाती है और बहुत कुछ....

गुजरात के कच्छ में खराई जिसे खाराश भी कहा जाता है...इस किस्म के ऊंट मैंग्रूव वनस्पति चरने के लिए हर रोज मुंद्रा तट पर समुद्र की खाक छानते हैं...वनस्पति के लिए ये ऊंट रोज लगभग तीन किलोमीटर तक का सफर पानी में तय करते हैं...उथले समुद्री पानी में उगने वाले मैंग्रूव के पैड ही इन ऊंटों के मुख्य आहार है....इन ऊँटों को तैरने वाले ऊंट के नाम से भी जाना जाता है....

समुद्र पार करने वाले ये ऊंट केवल कच्छ में ही पाए जाते हैं....साल 2019 में कच्छ ऊंट उच्चेरक मालधारी संगठन के अनुसार, गुजरात में लगभग 5,000 खराई ऊंट थे...

समुद्र में तैरने की क्षमता रखने वाले खराई ऊंट अन्य कच्छी ऊंटों के मुकाबले अलग होते हैं... खराई ऊंट वजन में हल्के होते हैं...इनके कान छोटे और उनकी खूंध भी छोटी होती है... ऊँट अन्य ऊँटों से अलग होता है क्योंकि इसकी गोल पीठ, लंबे और पतले और छोटे पैर होते हैं....इन ऊंटों के बाल बहुत लम्बे होते है जिनका इस्तेमाल स्टाल, बैग , और दरियां बनाने में किया जाता है...ऐसा कहा जाता है की मादा ऊंट के दूध के सेवन से डायबिटीज़ ठीक हो जाती है...इनके दूध के कई लाभ है और हाल ही के दिनों में इनके दूध की लोकप्रियता बहुत बढती जा रही है...

कच्छ में मुंद्रा के टुंडावांढ, अबसाड़ा के मोहाडी, लैयारी और भचाऊ के जंगी गांव में देखे जाते हैं...और भावनगर के अलियाबेट में भी इनकी थोड़ी बहुत संख्या पायी जाती है....

इन ऊँटों के चरने का इलाका मौसम के अनुसार बदलता है..क्यूंकि यह ऊंट अक्सर ही सफ़र करते रहते है...इन्हें पालने वाले इनके लिए कोई पक्का ठिकाना नही बनाते..मानसून के मौसम में तो इन ऊँटों को टीन महीने तक टापुओं पर ही छोड़ दिया जाता है...जहाँ खाईं में बारिश का पानी जमा होने से इनके लिए पीने के पानी का बंदोबस्त हो जाता है...

आपको बतादें एक ऊंट को प्रतिदन 20 से 40 लीटर पानी की जरूरत होती है...गर्मियों और सर्दियों के दिनों में टापुओं पर ये ऊंट एक साथ 3 दिन से ज्यादा रहते है... यह ऊँट कच्छ के रण की अत्यधिक कड़ी जलवायु के अनुकूल है, गोरतलब हो की इस क्षेत्र में उथले समुद्र और उच्च खारापन पाया जाता..बताते चले की यह ऊंट तटीय और शुष्क पारिस्थितिक तंत्र दोनों में रह सकते है...

भौगोलिक परिस्थिति के अनुसार ऊंटों की आबादी चिंताजनक ढंग से कम हो रही है...इसकी वजह कच्छ में चर भूमि का कम होना भी है...कच्छ में रबारी, मुस्लिम जाति और समा जाति के लोग ऊंट पालन व्यवसाय से जुड़े हुए हैं...वो समुदाय जो इन्हें सँभालते है वो फकिरानी जाट समुदाय से जुड़े होते है....

इन ऊटों को पालने वालों को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है.. मैंग्रोव के पैड भी कम होते जा रहे है...जिससे इन ऊंटों के पारम्परिक चराई मार्ग खत्म हो रहे है... स्थानीय स्तर पर नर ऊंट का माल परिवहन में उपयोग होता है.. हालांकि अब ऊंटनी का दूध को बेचकर भी पैसा कमाया जा रहा है और दूध उत्पादक डेरियों के साथ प्राथमिक बातचीत कर ऊंटनी के दूध का बाजार खड़ा करने की कोशिश की जा रही है...वहीँ खराई ऊंट के बेहतर संरक्षण के लिए इन्हें एक पृथक नस्ल (भारत में पाई जाने वाली नौ नस्लों में से एक) के रूप में मान्यता दी गई है... भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा 2015 में यह मान्यता दी गयी....अब ये देखने वाली बात होगी की आखिर इनके संरक्षण के लिए आगे और क्या क्या कदम उठाये जाते है....