(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) इंटरनेट शटडाउन (What is the Truth behind Internet Shutdown?)


(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) इंटरनेट शटडाउन (What is the Truth behind Internet Shutdown?)


हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने अपने एक महत्वपूर्ण निर्णय में इंटरनेट को 19 (1) (ए) के तहत एक मौलिक अधिकार माना है। इसके साथ ही शीर्ष न्यायालय ने जम्मू-कश्मीर में अस्पतालों, शैक्षणिक संस्थानों जैसी सभी जरूरी जगहों पर इंटरनेट सेवा बहाल करने का निर्देश भी दिया है। अनुच्छेद 370 के उन्मूलन के बाद जम्मू-कश्मीर में इंटरनेट शट डाउन कर दिया गया था।

गौरतलब है की उच्चतम न्यायालय से पहले ही केरल राज्य में इंटरनेट को लोगों के मूलभूत अधिकार घोषित किया गया था। कोस्टारीका, एस्तोनिया, फिनलैंड, फ्रांस इत्यादि देशों में पहले से ही इंटरनेट को मूलभूत अधिकार माना गया है।

लेकिन यहां पर एक बात गौर करने लायक है कि जहां उच्चतम न्यायालय ने इंटरनेट को मूलभूत अधिकारों में शामिल किया है वहीं दूसरी ओर वैश्विक स्तर पर भारत इंटरनेट शटडाउन के मामले में शीर्ष देशों में शुमार है।

आज के DNS कार्यक्रम में हम जानेंगे कि आखिर इंटरनेट शट डाउन होता क्या है एवं यह अर्थव्यवस्था को कैसे प्रभावित करता है?

दुनियाभर के तमाम देशों सहित भारत में इंटरनेट पर पाबंदी लगाना कोई नई बात नहीं है। शांति और सुरक्षा के दृष्टिकोण से सरकार फेक न्यूज़, अफवाहों इत्यादि पर नियंत्रण लगाने के लिए सरकार इंटरनेट शटडाउन का सहारा लेती हैं। आपको बता दें इंटरनेट शटडाउन एक पूर्ण प्रतिबंध है जिसके द्वारा किसी विशिष्ट स्थान पर इंटरनेट सेवाओं को बंद कर दिया जाता है। या दूसरे शब्दों में कहें तो किसी स्थान पर इंटरनेट सेवाओं को बंद किया जाना ही इंटरनेट शटडाउन है।

हमारे देश में इंटरनेट शटडाउन का आदेश केंद्र या राज्य के गृह सचिव द्वारा दिया जाता है। यह आदेश एसपी या उससे ऊपर के रैंक के अधिकारी के जरिए भेजा जाता है। इसके उपरांत वह अधिकारी इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स को इंटरनेट शटडाउन करने के लिए कहता है। इंटरनेट शटडाउन के इस आदेश अगले कामकाजी दिन (वर्किंग डे) के भीतर केंद्र या राज्य सरकार के रिव्यू पैनल के समक्ष भेजा जाता है। केंद्रीय रिव्यू पैनल में कैबिनेट सेक्रेटरी, लॉ सेक्रेटरी और टेलिकम्युनिकेशन्स सेक्रेटरी होते हैं। वही राज्यों के रिव्यू पैनल में चीफ सेक्रेटरी, लॉ सेक्रेटरी और एक कोई अन्य सेक्रेटरी शामिल होता है।

2017 से पहले इंटरनेट शटडाउन का आदेश जिला मजिस्ट्रेट द्वारा दिया जाता था। 2017 में सरकार ने इंडियन टेलीग्राफ एक्ट 1885 में संशोधन करते हुए टेम्प्ररी सस्पेंशन ऑफ टेलिकॉम सर्विसेज (पब्लिक इमरजेंसी या पब्लिक सेफ्टी) रूल्स को तैयार किया। इसके द्वारा वर्तमान में सिर्फ केंद्र या राज्य के गृह सचिव या उनके द्वारा अधिकृत प्राधिकारी ही इंटरनेट शटडाउन का आदेश दे सकते हैं।

हालिया रिपोर्ट के अनुसार 2019 में भारत इंटरनेट शटडाउन के संदर्भ में तीसरे स्थान पर है। पहले नंबर पर म्यांमार और दूसरे नंबर चाड है। ब्रुकलिन इंस्टीट्यूट के मुताबिक इंटरनेट शटडाउन के कारण आर्थिक नुकसान के संदर्भ में भारत विश्व में तीसरे स्थान पर काबिज है। आर्थिक नुकसान के संदर्भ में इराक प्रथम स्थान पर है तो वहीं सूडान दूसरे नंबर पर पर विद्यमान है। सूचना और प्रौद्योगिकी के इस दौर में इंटरनेट शटडाउन से वाणिज्य और व्यापार पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। इसके साथ ही मूलभूत सेवाएं जैसे स्वास्थ, शिक्षा इत्यादि पर भी गंभीर प्रभाव पड़ता है। आज के तकनीकी दौर में हर सेवाएं जैसे उपभोक्ता वस्तुओं को खरीदना, धन हस्तांतरण, परीक्षाओं के लिए आवेदन, यात्रा के लिए टिकट बुक करना इत्यादि का अधिकतर कार्य इंटरनेट के माध्यम से होने लगा है। यू कहे तो भारत सहित तमाम देशों में इंटरनेट के माध्यम से वाणिज्य व्यापार लगातार बढ़ता जा रहा है। छोटी से छोटी सेवाएं आजकल ऑनलाइन गतिविधियों के द्वारा अंजाम दी जा रही है। ऐसे में यदि इंटरनेट शटडाउन होता है तो यह सारी आर्थिक गतिविधियां रुक जाती हैं जिसका अर्थव्यवस्था पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। इंडियन काउंसिल काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकोनॉमिक रिलेशंस के एक अध्ययन के मुताबिक, 2012 से 2017 तक देश में इंटरनेट शटडाउन के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था को लगभग 3 बिलियन डालर का नुकसान हुआ। इसके साथ ही इंटरनेट शटडाउन के कारण नागरिक मूलभूत सेवाओं से वंचित हो जाते हैं। वह समाज से अलग-थलग पड़ जाते हैं जिससे उन पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ता है। इसके साथ ही शैक्षणिक गतिविधियों इत्यादि पर भी व्यापक प्रभाव पड़ता है।

हालांकि उच्चतम न्यायालय ने इंटरनेट को मूल अधिकार प्रदान कर दिया है लेकिन इंटरनेट शटडाउन इसमें एक बहुत बड़ी चुनौती है। सरकार समेत सभी हितधारकों को यह सुनिश्चित करना होगा कि इस मूल अधिकार का दुरुपयोग ना हो। इसके साथ ही सरकार को भी इंटरनेट शटडाउन के मामले में सावधानी एवं संयम बरतने की आवश्यकता है। कहीं ना कहीं सरकार को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एवं सुरक्षा के मध्य एक संतुलन बनाना होगा जिससे इंटरनेट शटडाउन की स्थिति कम से कम हो।

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