(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) 1857 की क्रांति (Indian Rebellion of 1857)


(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) 1857 की क्रांति (Indian Rebellion of 1857)



163 साल पहले 10 मई 1857 के दिन मेरठ में अंग्रेज़ों के खिलाफ पहली जंग का बिगुल फूंका गया था ... ब्रिटिश सेना में कई भारतीय सैनिकों ने विद्रोह कर कई अँगरेज़ अफसरों और अधिकारियों को मौत के घाट उतार दिया था । ये घटना मेरठ के कैंट इलाके में हुई थी ।भारतीय स्वतंत्रता के इतिहास में इस लड़ाई को पहले स्वतंत्रता संग्राम के नाम से जाना गया था ।इस जंग में भारत की तकरीबन पूरी आबादी कूद पडी थी और जात पांत से ऊपर उठकर समाज का हर तबका इस लड़ाई में शामिल था ।इस लड़ाई ने ये साबित कर दिया था की अगर भारत एक जुट होकर अंग्रेज़ों का सामना करेगा तो ब्रिटिश शासन की ईंट से ईंट बजायी जा सकती है । आगे चलकर भारत की आज़ादी की लड़ाई में इस स्वतंत्रता अंदोलन का काफी गहरा असर पड़ा ।

आज के DNS में हम जानेंगे आज़ादी की पहली लड़ाई 1857(सत्तावन) के संग्राम के बारे में , जानेंगे क्यों इसे सैनिक विद्रोह कहा जाता है । साथ ही जानेंगे इस लड़ाई से जुडी अहम् वजहों और बातों को और बताएँगे की इतने बड़े पैमाने पर लड़ी गयी लड़ाई क्यों ब्रिटिश शासन का तख्ता पलटने में नाकाम साबित हुई ।

सदियों की औपनिवेशिक ग़ुलामी और शोषण के खिलाफ जब भारत की जनता उठ खड़ी हुई तो इसमें लगभग लगभग पूरा भारत शरीक हो गया ।इस लड़ाई में ब्रिटिश नीतियों और आततायी नीतियों के खिलाफ भारत का हर तबका चाहे अमीर या ग़रीब , बड़ा या छोटा , मज़दूर या ज़मींदार सब शरीक हुए । इस लड़ाई से ये साबित हुआ की अँगरेज़ अब अपराजेय नहीं हैं उन्हें शिकस्त दी जा सकती है ।

10 मई 1857 को मेरठ छावनी में सिपाहियों ने खुला विद्रोह कर दिया । सिपाहियों ने न केवल अँगरेज़ अफसरों के हुक्म को मानने से इंकार कर दिया बल्कि जेल तोड़कर सैकड़ों बंदी भारतीय सैनिकों को मुक्त करा लिया । विद्रोही सैनिकों ने छावनी के क्रूर और अत्याचारी अँगरेज़ अधिकारियों की हत्या भी कर दी ।

मेरठ में विद्रोह का बिगुल फूकने के बाद भारतीय सिपाही दिल्ली की तरफ कूच कर गए । यहां अगले दिन से सिपाहियों ने दिल्ली पर कब्ज़ा करने का अभियान शुरू कर दिया । कंपनी के राजनैतिक एजेंट साइमन फ़्रेज़र समेत सैकड़ों अँगरेज़ इस अभियान में मारे गए । सराकरी दफ्तरों पर या तो कब्ज़ा किया गया या उन्हें नष्ट कर दिया गया ।दिल्ली पर कब्ज़ा करने के बाद आखिरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फर को दिल्ली का सम्राट घोषित कर दिया गया । इतना ही नहीं उनके नाम पर सिक्के भी ढाले जाने लगे । इसके अलावा सारे फरमान भी मुग़ल बादशाह के नाम पर जारी किये जाने लगे ।

दरसल में 1857 का विद्रोह पहले हुए कई सारे विद्रोहों का परिणाम था 1757 से लेकर 1857 के दरमियान भारत में अंग्रेज़ों के खिलाफ कई छोटे बड़े विद्रोह हुए थे । इसमें सन्यासी विद्रोह , संथाल विद्रोह , और अन्य जनजातीय विद्रोह शामिल थे । लेकिन इन सारी बगावतों में एक ख़ास बात थी इनकी प्रकृति । आम तौर पर ये सारे विद्रोह छोटे स्तर के थे और इनका दायरा भी काफी सीमित था ।

मेरठ और दिल्ली पर कब्ज़े के बाद पूरे उत्तर भारत , पश्चिमी भारत और मध्य भारत के कुछ हिस्सों में अंग्रेज़ों के खिलाफ विद्रोह की लहर तेज़ हो गयी थी । इस आंदोलन का विस्तार पेशावर से लेकर असम के डिब्रूगढ़ तक और दक्षिण में बेलगाम तक था । लड़ाई के दौरान कंपनी के करीब ढाई लाख सैनिकों में से आधे सिपाहियों ने अपनी रेजीमेंट छोड़ दी ..दिल्ली पर कब्ज़े के करीब 1 महीने के भीतर ही यह आंदोलन कानपुर, लखनऊ, इलाहबाद, झांसी ,बरेली, जगदीशपुर समेत देश के अन्य इलाकों में भी फैलने लगा ।पूरी देश की जनता ब्रिटिश हुकूमत की ज्यादतियों और शोषण से तंग आ चुकी थी यही वजह है की पूरे देश की जनता इस लड़ाई में कूद पडी...

दरसल में 1857 की ये लड़ाई ब्रिटिश हुकूमत की सालों से चली आ रही दमन कारी नीतियों के विरोध का नतीजा थी । 1857 के संग्राम के अहम् कारणों में सबसे बड़ी वजह थी गोद निषेध या हड़प नीति । यह अंग्रेज़ों की विस्तारवादी नीति का नतीजा थी जो गवर्नर जनरल लार्ड डलहौज़ी के दिमाग की उपज थी । इसके साथ ही भारी टैक्स और राजस्व संग्रहण के कड़े नियमों के चलते किसानों और ज़मींदार वर्गों में काफी असंतोष फैला हुआ था । इसके साथ ही भारत में तेज़ी से पैर पसारती पश्चिमी सभ्यता को लेकर भी समाज के सभी तबकों में अत्यधिक रोष व्याप्त था ।इसके साथ ही सबसे बड़ी वजह थी भारतीय सैनिकों और ब्रिटिश सैनिकों के बीच होने वाला भेदभाव और भारतीय सैनकों का शोषण ।

इसके अलावा अंग्रेजों ने भारत में व्याप्त सामाजिक धार्मिक मान्यताओं को ना केवल चोट पहुंचे बल्कि इसे पुरातनपंथी और दकियानूसी विचारधारा का जामा पहना कर इसे बदलने की भी कोशिश की । इन सब परम्पराओं को बदलकर उन्होंने ईसाई मिशनरियों को बढ़ावा दिया ताकि ईसाई धर्म का ज़्यादा से ज़्यादा प्रसार हो सके ।ऐसा माना जाता है की ईसाई मिशनरियों ने पैसे का लालच देकर गरीब और भोलीभाली जनता का धर्म परिवर्तन कराया ।इसके साथ साथ कई मामले में बलात धर्म परिवर्तन भी कराये गए । हिंदुओं के उत्तराधिकार कानून,सती प्रथा, विधवा विवाह जैसी धार्मिक परम्पराओं में दखलनदाजी करके अंग्रेज़ों ने भारतियों को अपना दुश्मन बना लिया।

राजनैतिक और धार्मिक मामलों के अलावा औपनिवेशिक हितों को साधने के लिए अँगरेज़ हुक्मरानों ने भारतीय अर्थव्यवस्था में कई बदलाव किये । अधिक से अधिक धन उगाही करने के लिए अंग्रेज़ों ने भूमि राजस्व और राजस्व संग्रहण को काफी कठोर बना दिया। वहीं दूसरी ओर ब्रिटिश उत्पादों और सामानों को भारत में ज़्यादा से ज़्यादा बढ़ावा दिया । इसके इतर भारतीय सामानों पर ज़रुरत से ज़्यादा कर लगाया। इससे जहां एक और किसान हताहत हुए तो वहीं दूसरी ओर पारंपरिक वस्तुओं के उत्पादन करने वाले कारीगर प्रभावित हुए। देसी रियासतों के उन्मूलन से सिपाही, कारीगर, और कलाकार भी प्रभावित हुए जिससे बेरोजगारी बढ़ने लगी और भारतीय अर्थव्यवस्था की कमर टूट गयी।

गौर तलब है की ब्रिटिश फौज में 80 फीसदी से ज्यादा सिपाही भारतीय सैनिक थे लेकिन उनके साथ भेदभाव किया जाता था । उनको वेतन और सुविधाएं यूरोपीय सैनिकों की तुलना में काफी कम मिलता था। इसके साथ ही ‘सामान्य सेवा भर्ती अधिनियम’ के चलते भारतीय सैनिकों को भारत से बाहर कहीं भी सेवा देना अनिवार्य कर दिया गया। लेकिन उस वक़्त समुद्र यात्रा को समाज में स्वीकृति प्राप्त नहीं थी जिसकी वजह से सिपाहियों में एक कुंठा की भावना व्याप्त हो गई थी।

तात्कालिक कारण

ब्रिटिश शासन के द्वारा सेना में एक नई बंदूक इनफील्ड को शामिल किया गया इसको चलाने से पहले कारतूस पर लगे चर्बी को दांत से काटना पड़ता था। इन कारतूस पर सूअर और गाय की चर्बी लगी होती थी जो हिंदू और मुस्लिम सैनिकों के धार्मिक मान्यताओं के विपरीत था। चर्बी वाले कारतूस के विरुद्ध मंगल पांडे ने ने 'बैरकपुर छावनी' में अपने अफ़सरों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। धीरे-धीरे यह विद्रोह अन्य छावनी में भी फैल गया विद्रोह की आशंका को देखते हुए ब्रिटिश अफसरों ने मंगल पांडे को तय समय से पहले ही फांसी दे दी। लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी और अब भारतीय सेना अंग्रेजो के खिलाफ मोर्चा खोलने के लिए मानसिक रूप से तैयार होने लगी थी।

विद्रोह की शुरुआत

10 अप्रैल को मंगल पांडे की फांसी देने से भारतीय सैनिकों में एक असंतोष की भावना व्याप्त हो गई थी। नानासाहब, अजीमुल्ला खाँ, रंगो बापूजी गुप्ते आदि ने 31 मई को क्रान्ति की सम्पूर्ण योजना बनाई थी। छावनियों व गांवों में रोटी और कमल द्वारा सन्देश भेजे जा रहे थे; पर अचानक एक दुर्घटना हो गयी। 9 मई को मेरठ में 85 सैनिकों ने नई राइफल इस्तेमाल करने से इनकार कर दिया जिसके उपरांत इन सैनिकों को नौ साल जेल की सजा सुनाई गई। 9 मई को मेरठ विद्रोह 1857 के संग्राम की शुरुआत का प्रतीक था। मेरठ में भारतीय सिपाहियों ने ब्रिटिश अधिकारियों की हत्या कर दी और जेल को तोड़ दिया। 10 मई को वे दिल्ली के लिए आगे बढ़े। 11 मई को मेरठ के क्रांतिकारी सैनिकों ने दिल्ली पहुंचकर, 12 मई को दिल्ली पर अधिकार कर लिया। इन सैनिकों ने मुगल सम्राट बहादुरशाह द्वितीय को दिल्ली का सम्राट घोषित कर दिया। शीघ्र ही विद्रोह लखनऊ, इलाहाबाद, कानपुर, बरेली, बनारस, बिहार और झांसी में भी फैल गया।

1857 के विद्रोह में तात्या टोपे , झांसी से रानी लक्ष्मीबाई , बरेली से खान बहादुर खान ,बिहार के जगदीशपुर से कुंवर सिंह ने , लखनऊ से बेगम हज़रत महल , इलाहबाद से लियाक़त अली , फतेहपुर से अज़ीमुल्लाह खान और फैज़ाबाद से मौलवी अहमदुल्लाह ने क्रांति का नेतृत्व किया ।

सीमित संसाधनों के बावजूद इस विद्रोह में विद्रोहियों ने अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए। अंग्रेजों को पूरी बगावत को कुचलने में 1 साल से भी ज्यादा का वक्त लगा। लेकिन कुल मिलाकर इस विद्रोह को एक सफल विद्रोह के तौर पर नहीं देखा जाता है । इसकी वजह थी विद्रोह का समय से पूर्व प्रारंभ होना एवं उचित नेतृत्व की कमी । इसके साथ ही ब्रिटिश सेना के सामने अस्त्र शास्त्रों की कमी नहीं थी जिससे बागियों को आसानी से नेस्तनाबूत कर दिया गया । साथ ही इस ग़दर में रियासतों और ज़मींदारों ने भी अंग्रेज़ों के लालच में आकर भागीदारी नहीं की ।

अंग्रेजों ने इस विद्रोह को तो कुचल दिया लेकिन उन्हें पता हो गया कि भारत पर मनमानी तरीके से शासन करना अब मुनासिब नहीं होगा। रानी विक्‍टोरिया के दिनांक 1 नवम्‍बर 1858 की घोषणा के अनुसार भारत में प्रशासन का दायित्व ब्रिटिश क्राउन को सौंप दिया गया। राजाओं के साथ यथास्थिति बनाए रखने की गारंटी दी गई। भारतीय लोगों के सामाजिक, सांस्कृतिक हस्तक्षेप से परहेज किया जाने लगा। जमीदारों के प्रति ब्रिटिश नज़रिये में बदलाव हुए।

1857 की क्रांति आगे आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणा स्रोत का कार्य करने लगा एवं यह भावनाएं बन गयीं कि अंग्रेजों को भी सशक्त चुनौती दी जा सकती है एवं उन्हें पराजित भी किया जा सकता है। यद्यपि शासित भारतीय वर्ग के द्वारा ब्रिटिश शासन का पक्ष लिया गया लेकिन अधिकांश सामान्य जनता जैसे कृषक, मजदूर द्वारा विद्रोही लोगों को समर्थन प्रदान किया गया जो आगे आने वाले राष्ट्रीय आंदोलनों में इन लोगों के प्रति मनोदशा को दर्शाती है और यही वर्ग आगे चलकर सभी महत्वपूर्ण आंदोलनों को सफल बनाने का आधार बनी।