(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) भारत चीन विवाद में पैंगोंग सो झील (India-China Dispute and Pangong Tso Lake)


(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) भारत चीन विवाद में पैंगोंग सो झील (India-China Dispute and Pangong Tso Lake)



हाल ही में पांगोंग सो क्षेत्र में लाइन ऑफ़ एक्चुअल कण्ट्रोल पर भारतीय और चीन सैनिकों के बीच हुई झड़प , विवाद को अगर गौर से देखा जाए तो ये काफी रोमांचक नज़र आता है। यूँ तो ये किसी विदेशी थ्रिलर फिल्म के किसी रोमांचकारी दृश्य सा लगता है लेकिन करीब से देखें तो इसमें दो परमाणु शक्ति देशों के बीच ताक़त की एक नुमाइश सी नज़र आती है। हालांकि इस नुमाइश के कई सारे ऐसे मतलब निकलते हैं जिसके पूरी दुनिया में परिणाम दिखाई दे सकते हैं...

आज के DNS में जानेंगे पांगोंग त्सो झील के बारे में साथ ही समझेंगे भारत चीन के रिश्ते में इस झील की अहमियत को।

भारत और चीन के बीच मौजूद सीमा जिसे लाइन ऑफ़ एक्चुअल कण्ट्रोल या एल ऐ सी के नाम से भी जाना जाता है दशकों से विवाद की वजह रही है। एल ऐ सी को तीन हिस्सों में बांटकर देखा जाता है पश्चिमी ,मध्य और पूर्वी क्षेत्र। ऐसे कई इलाके है जहां दोनों देशों के बीच एल ऐ सी की बिलकुल सही स्थिति को लेकर विवाद है। भारत का दावा है की एल ऐ सी की लम्बाई 3488 अट्ठासी किलोमीटर है जबकि चीन का मानना है यह महज़ 2000 किलोमीटर लम्बी है..

दोनों ओर की सेनाएं अपने हिसाब से एल ऐ सी की सीमा के मुताबिक़ गश्त के ज़रिये इस इलाके में ज़ोर आजमाइश की फ़िराक में रहती हैं...इसके मद्देनज़रदोनों देशों के बीच छोटे मोठे विवाद जन्म लेते रहते हैं। इसकी मिसाल हाल ही में सिक्किम के नाकु ला इलाके में हुई झड़प के तौर पर दी जा सकती है

यूँ तो एल ऐ सी का ज़्यादातर हिस्सा ज़मीन से होकर गुज़रता है लेकिन इसका कुछ हिस्सा पांगोंग सो झील से भी होकर गुज़रता है। पानी में मौजूद एल ऐ सी का ज़्यादातर हिस्सा ऐसा है जिसको लेकर चीन और भारत में अभी भी विवाद बना हुआ है।

एलएसी को लेकर दोनों देशों की अपनी अपनी समझ है और इस वजह से दोनों के बीच टकराव होते रहते हैं. लद्दाख एलएसी करीब 134 चौंतीस किलोमीटर पांगोंग सो झील के बीच से गुजरती है और भारतीय सेना झील में करीब 45 पैंतालिस किलोमीटर के इलाके पर पहरा देती है. भारतीय सेना का कहना है कि चीनी सिपाही हर साल सैकड़ों बार एलएसी का उल्लंघन कर भारत की सीमा में घुस आते हैं. कई बार स्थिति गंभीर भी हो जाती है.

क्यों है पांगोंग सो झील इतनी अहम्

तिब्बती में सो का अर्थ झील होता है। पांगोंग सो लद्दाख में 14 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित एक लंबी, संकरी और गहरी झील है। यह चारों तरफ से जमीन से घिरी हुई है। यह झील रणनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है। दोनों देश लगातार इस झील में पट्रोलिंग करते रहते हैं।पैंगोंग सो झील 1962 बासठ के बाद से ही जब-तब दोनों देशों के बीच तनाव की वजह से सुर्खियों में रहती है। 1962 बासठ में चीन ने इसी इलाके में भारत पर मुख्य हमला बोला था।अगस्त 2017 में पैंगोंग सो के किनारे भारत और चीन के सैनिक भिड़ गए थे।

झील की भौगौलिक स्थिति इसे रणनीतिक रूप से बेहद अहम बनाती है। ये झील चुशूल के रास्ते में पड़ती है, जो कि भारत का अहम हिस्सा है. चुशूल एक गांव है, जो बॉर्डर से 15 किलोमीटर दूर है. आर्मी की पोस्ट है यहां पर. झील के उत्तरी और दक्षिणी किनारे को ‘चुशूल अप्रोच’ कहते हैं, जिसका इस्तेमाल चीन भारत में घुसने में कर सकता है. 1962 बासठ के युद्ध में चुशूल में ही चीन ने सबसे बड़ा हमला किया था. रेज़ांग ला पर भारतीय सेना डटकर लड़ी.....13 कुमाऊं की अहीर रेजिमेंट के मेजर शैतान सिंह शहीद हो गए थे.

जानकारों के मुताबिक चीन अगर भविष्य में कभी भारतीय क्षेत्र पर हमले की हिमाकत करता है तो चुशुल अप्रोच का इस्तेमाल करेगा क्योंकि इसका रणनीतिक महत्व है। पांगोंग झील तिब्बत से लेकर भारतीय क्षेत्र तक फैली है। इसका पूर्वी हिस्सा तिब्बत में है। इसके 89 नवासी किलोमीटर यानी करीब 2 तिहाई हिस्से पर चीन का नियंत्रण है। झील के 45 पैंतालिस किलोमीटर पश्चिमी हिस्से यानी करीब एक तिहाई हिस्से पर भारत का नियंत्रण है।चीन ने पैंगोंग सो झील के आस-पास मजबूत सैन्य इन्फ्रास्ट्रक्चर बना लिया है। झील के किनारों से सटे ऐसे सड़क बना लिए हैं जिनमें भारी और सैन्य वाहन भी आ-जा सकते हैं।

9 मई को नॉर्थ-ईस्ट में सिक्किम के नाकू ला सेक्टर में भारत और चीन के सैनिकों में झड़प हो गई थी जिसमे सैनिक चोटिल हो गए. हालांकि बाद में बातचीत से मसला सुलझा लिया गया. लेकिन ये कोई नई बात नहीं है. अक्सर उत्तर में लद्दाख और नॉर्थ-ईस्ट में अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम की सीमा पर ऐसे तनाव देखने को मिलते हैं. असल में यहां भारत की सीमाएं तिब्बत से लगती हैं. 1914 के शिमला समझौते में ब्रिटिश हुकूमत और तिब्बत के बीच नॉर्थ-ईस्ट के लिए सीमा तय हुई थी, जिसे मैकमोहन रेखा कहते हैं लेकिन चीन इसे मानता नहीं है. चीन का कहना है कि ये समझौता तिब्बत-ब्रिटेन के बीच हुआ था. इसलिए चीन भारत में घुसपैठ करता रहता है. 1962 बासठ के भारत-चीन युद्ध के पीछे सीमा का यही संघर्ष था. थोड़ा पीछे जाएं तो युद्ध की भूमिका तब से ही बन रही थी, जब जवाहरलाल नेहरू ने तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा को भारत में शरण दी थी....

सीमा तय ना होने की वजह से इस तरह के टकराव पहले भी होते रहे हैं। जून-अगस्त, 2017 में भूटान की सीमा पर डोकलाम विवाद चरम पर था। उस साल भारत के स्वतंत्रता दिवस समारोह में भी चीन के सैनिकों ने भाग लेने से मना कर दिया था. ऐसा 2005 के बाद पहली बार हुआ. एक और समारोह, जो 1 अगस्त को चीन में पीपल्स लिबरेशन आर्मी के फाउंडिंग डे पर हुआ करता है, वो भी नहीं हुआ. 19 अगस्त, 2017 को पांगोंग झील पर पथराव-मारपीट की घटना हुई. इसका एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें कथित तौर पर दोनों तरफ के सैनिक झगड़ते दिखे.

चीन और भारतीय सेनाओं के बीच इस तरह के टकराव आये दिन देखने को मिलते हैं लेकिन इन्हे सुलझाना सिर्फ बातचीत से संभव है। भारत को चाहिए की चीन से पांगोंग त्सो झील में आने वाले एल ऐ सी के हिस्से का निर्धारण करे ताकि सीमा पर सेनाओं के दरमियान विवाद को रोका जा सके। ऐसे समय में जब दोनों देश वैश्विक महामारी के दौर से गुज़र रहे हैं उन्हें सीमा विवाद से अलग हटकर आपस में वैश्विक महामारी के खिलाफ साझा कदम उठाने के बारे में सोचना चाहिए। दोनों देश दक्षिण एशिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं जिन पर वैश्विक शांति और सुरक्षा बनाने का दारोमदार भी सबसे ज़्यादा है।




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