(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) बोडो आंदोलन का अंत (End of Bodo Movement)


(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) बोडो आंदोलन का अंत (End of Bodo Movement)


हाल ही में बोडो अलगाववादी गुटों समेत कुल नौ संगठनों एवं असम और केंद्र सरकार के मध्य समझौता संपन्न हुआ। इन बोडो अलगाववादी गुटों ने बोडोलैंड की मांग छोड़ दी। समझौते के तहत जहां बोडो गुट के आतंकवादी आत्मसमर्पण करेंगे वहीं सरकार उनके पुनर्वास की जिम्मेदारी उठाएगी। इसके साथ ही असम के मुख्यमंत्री के नए उल्फा को भी बातचीत करने का निमंत्रण दिया गया है। इस प्रकार अगर देखें तो असम में दशकों से चली आ रही बोडो समस्या का समाधान हो गया लेकिन अभी भी सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या वाकई असम में शांति स्थापित हो पाएगी……..

यूं तो देखा जाए तो लगभग भारत का समस्त क्षेत्र आतंकवादी गतिविधियों का सामना कर रहा है। उदाहरण के लिए कश्मीर में पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद, बंगाल, बिहार, उड़ीसा, झारखंड, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ समेत आंध्र प्रदेश में नक्सलवादी आतंकवाद और वही पूर्वोत्तर में अलगाववादी आतंकवाद।

पूर्वोत्तर भारत के अंतर्गत 7 राज्य असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड और त्रिपुरा राज्य आते हैं जिन्हें सेवन सिस्टर भी कहा जाता है। ऐतिहासिक, भौगोलिक, सामाजिक सांस्कृतिक, धार्मिक और भाषाई विविधता जितना इन राज्यों में है उतना और भारत के किसी क्षेत्र में देखने को नहीं मिलता।

यह क्षेत्र सामरिक दृष्टिकोण से भी काफी संवेदनशील है क्योंकि यह 4 देशों चीन, बांग्लादेश, भूटान और म्यांमार से घिरा हुआ है।

आइए आज के डीएनएस कार्यक्रम में जानेंगे वर्षों से असम अशांत क्यों है और क्या हालिया समझौता वाकई असम में शांति स्थापित करेगा?

असम में अशांति की पृष्ठभूमि कैसे तैयार हुई?

अगर हम पूर्वोत्तर में हिंसा के कारणों पर नजर डाले तो इसकी जड़ें ब्रिटिश शासन काल तक जाती हैं। 1826 में अंग्रेजों ने यान्दबू संधि के द्वारा असम पर अधिकार कर लिया। यहीं से अंग्रेजों तथा ईसाई मिशनरियों के द्वारा जनजातीय बहुल पूर्वोत्तर राज्यों को भारत की मुख्य धारा से अलग वाली कहानी की शुरुआत हुई।पूर्वोत्तर क्षेत्र को भारत में एकीकरण पर अंकुश लगाकर पूर्वोत्तर को शेष भारत से पृथक रखा गया । अलग पहचान के प्रश्न पर 1945 में नागा पर्वतीय जनजातीय परिषद का गठन हुआ जिसका नाम 1946 में नागा नेशनल काउंसिल रख दिया गया। इसी के बाद धीरे-धीरे सभी पूर्वोत्तर राज्यों में अलगाववादी गतिविधियां बढ़ने लगी। पूर्वोत्तर में अलगाववादी आतंकवाद को बढ़ाने में कई अन्य कारण ने भी सम्मिलित रूप से भूमिका निभाई।इसमें शामिल है- अकुशल प्रशासनिक नीतियां, भ्रष्टाचार एवं वोट बैंक पॉलिटिक्स, ईसाई मिशनरियों एवं विदेशी शक्तियों की भूमिका।

अगर असम में विगत कुछ दशकों से विद्यमान समस्याओं की बात करें तो इसे मुख्यतः तीन भागों में बांट सकते हैं

1.असम में अलगाववाद एवं आतंकवाद
2. बोडोलैंड की समस्या
3. घुसपैठ और सांप्रदायिक संघर्ष

असम पूर्वोत्तर का सबसे प्रमुख राज्य है। आजादी उपरांत मूलतः उत्तरी पूर्वी राज्यों का सारा भौगोलिक क्षेत्र असम के अंतर्गत था। असम में मुख्य रूप से हिंदू, मुस्लिम तथा आदिवासी जनसंख्या है। असम को दो भौगोलिक भागों में बांटा जाता है ऊपरी असम तथा निचले असम। ऊपरी भाग में प्रायः असम के मूल निवासी केंद्रित है तथा निचले भाग में प्रवासियों की बहुलता है। इन अप्रवासी लोगों में संथाल, मारवाड़ी, बांग्ला भाषी तथा बिहार समेत भारत के अन्य भागों से आए लोग शामिल हैं। इन प्रवासी लोगों में सबसे बड़ी तादाद बांग्लादेश से आए हुए अवैध घुसपैठियों की है।

इन अवैध घुसपैठियों के कारण सामाजिक एवं आर्थिक अवसंरचना पर बढ़ते दबाव से भयभीत होकर भारतीय मूल के असमिया लोगों की अपनी पहचान को सुरक्षित करने के लिए 1979 में ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन(आसू) के द्वारा व्यापक जन आंदोलन की शुरुआत की गई। वोट बैंक की राजनीति के कारण शासन द्वारा उनकी मांगों का दमन किया गया जिसके कारण से यह आंदोलन हिंसक स्वरूप में बदल गई।
1979 में ‘यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा) के नाम से एक उग्रवादी संगठन की स्थापना हुई। आंदोलन का कोई परिणाम नहीं निकलने तथा असम गण परिषद की सरकार से निराशा हाथ लगने के उपरांत उल्फा के नेताओं ने संघर्ष का रास्ता चुना। उल्फा के घोषित लक्ष्यों में शामिल है- असम को संप्रभुता संपन्न राष्ट्र बनाना, असम के राजस्व स्रोतों पर पूर्ण नियंत्रण, प्रवासियों को असम से बाहर करना और उल्फा के लक्ष्यों को समर्थन देने वाले देशों से सहायता एवं सहयोग लेना।

असम की दूसरी मुख्य समस्या बोडोलैंड की मांग से संबंधित है। ‘बोडो’ एक जनजातीय समूह है जो निचले असम में संकेन्द्रित है। पूरे असम की जनसंख्या में बोडो जनजातीय समूह का हिस्सा मात्र 6% है। पिछले कई वर्षों से बोडो आंदोलनकारियों के द्वारा एक पृथक राज्य की मांग की जा रही है। 1980 के दशक के बाद बोडो आंदोलन हिंसक तत्वों का प्रवेश हुआ. इसके साथ ही ये आंदोलन तीन धाराओं में बंट गया। पहले का नेतृत्व NDFB ने किया, जो अपने लिए अलग राज्य चाहता था। दूसरा समूह बोडो लिब्रेशन टाइगर (BLT) है, जिसने ज्यादा स्वायत्तता की मांग की और गैर-बोडो समूहों को निशाना बनाया। तीसरी धड़ा ऑल बोडो स्टूडेंट्स यूनियन यानी (ABSU) का है, जिसने मध्य मार्ग अपनाते हुए राजनीतिक समाधान की मांग की।

असम की तीसरी सबसे प्रमुख समस्या सांप्रदायिक संघर्षों की है जो कुछ वर्षों से बड़ी तेजी से बढ़ रही है। बांग्लादेशी घुसपैठियों में बड़ी संख्या में मुस्लिम आबादी शामिल है। इन घुसपैठियों ने असमिया मूल के लोगों को धुबरी, खानपाड़ा, बारपेटा, हाइलाकांदी, नगाँव, करीमगंज और मोरेगंज इत्यादि जिलों में अल्पमत में ला दिया है। घुसपैठियों ने अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए कई सारे आतंकवादी समूह की भी स्थापना की है। इसके कारण असम में सांप्रदायिक संघर्ष की भी शुरुआत हो गई।

उपरोक्त सभी समस्याओं के कारण देखते ही देखते असम अशांत हो गया। असम के आतंकवादी समूह के द्वारा काफी सारी हिंसक गतिविधियां की गई जिसमें अलगाववादी, निर्दोष नागरिक समेत काफी सुरक्षाकर्मी भी मारे गए। पूर्वोत्तर समेत असम में भारत सरकार ने आतंकवाद के उन्मूलन हेतु दो सूत्री रणनीति पर कार्य किया। एक तरफ सरकार ने असंतुष्ट गुट से शांति वार्ता के प्रयासों को जारी रखा तो वहीं दूसरी ओर शांति वार्ता का विद्रोह करने वाले गुटों का दमन भी जारी रखा। सरकार ने सक्रिय कूटनीति के द्वारा भूटान, बांग्लादेश और म्यांमार जैसे देश से अलगाववादी गुटों पर ना केवल दबाव डलवाया बल्कि इन देशों की सेनाओं के द्वारा इन आतंकवादी समूहों का सफाया भी किया गया। उदाहरण के लिए भूटान में ऑपरेशन ऑल क्लियर और म्यांमार सीमा पर भारतीय सेनाओं के द्वारा सर्जिकल स्ट्राइक । गौरतलब है कि पूर्वोत्तर समेत असम के आतंकवादी समूह द्वारा म्यांमार, भूटान और बांग्लादेश मे शरण लिया जाता था। इन अलगाववादी संगठनों को चीन एवं पाकिस्तान के द्वारा परोक्ष रूप से सहायता भी प्रदान की जाती थी।

गौरतलब है कि नब्बे के दशक से ही असम में हथियार डालने वाले उग्रवादियों के पुनर्वास के लिए सरकार कुछ योजनाएं क्रियान्वित करती रही है। पहले भी 1993 और 2003 में बोडो गुटों के समझौता किया गया। इन समझौतों का क्रमशः परिणाम थाबोडोलैंड ऑटोनॉमस काउंसिलऔर बोडोलैंड टेरिटोरियल काउंसिल। लेकिन इसमें सभी बोडो गुट शामिल नहीं हुए जिससे यह शांति प्रक्रिया ज्यादा कारगर नहीं हुई। बोडो गुटों के साथ संपन्न हुए वर्तमान समझौते के तहत NDFB गुट हिंसा का रास्ता छोड़ने के साथ साथ आत्मसमर्पण करेंगे और इस समझौते पर हस्ताक्षर करने के एक महीने के भीतर अपने सशस्त्र संगठनों को खत्म कर देंगे। भारत और असम सरकार इस संबंध में निर्धारित नीति के अनुसार एनडीएफबी (पी), एनडीएफबी (आरडी) और एनडीएफबी (एस) के लगभग 1500 से अधिक कैडरों के पुनर्वास के लिए आवश्यक उपाय भी करेगी। इस समझौते के दौरान असम के मुख्य मंत्री श्री सर्वानंद सोनोवाल, अध्यक्ष नेडा (NEDA), श्री हिमंता विस्वा सर्मा, बीटीसी (Bodoland Territorial Council) के मुख्य कार्यकारी सदस्य हग्रामा मोहिलारी, एबीएसयू (ABSU), यूबीपीओ (United Boro People Organization), एनडीएफबी (NDFB) के गोविन्दा बासूमतारी, धीरेन्द्र बोरा, रंजन दाइमारी तथा सरायगारा घटकों के प्रतिनिधि सहित केंद्र सरकार तथा असम सरकार के वरिष्ठ अधिकारी शामिल रहे।

वहीं दूसरी ओर असम के सबसे शक्तिशाली उग्रवादी संगठन उल्फ़ा सहित 14 उग्रवादी संगठनों के साथ वर्षों से केंद्र सरकार की तरफ से शांति वार्ता चल रही है, लेकिन कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया। नवम्बर 2011 में उल्फ़ा के वार्ता समर्थक गुट के साथ केंद्र सरकार की पहली वार्ता आयोजित हुई थी। बीच-बीच में कई आतंकवादी संगठनों ने अपने हथियार डालते हुए शांति प्रक्रिया में भाग लेने की पहल की गई। लेकिन सरकारों की अनिच्छा, पुनर्वास की मांगों एवं शर्तें, अलगाववादियों की अतिवादी मांगे इत्यादि के कारण शांति वार्ता प्रायः फलीभूत नहीं हो पाए।

हालांकि इस दिशा में बोडो अलगाववादी गुटों के साथ संपन्न समझौता एवं उल्फा को बातचीत करने का नियंत्रण देना एक सार्थक कदम है लेकिन अभी भी असम की काफी सारी समस्या विद्यमान ही रहेगी जैसे कि

  • अवैध प्रवासियों की समस्या,
  • सांप्रदायिक संघर्ष,
  • नागरिकता रजिस्टर एवं उससे उत्पन्न चुनौतियां,
  • नागरिकता संशोधन कानून का विरोध ,
  • अलगाववादियों गुटों के द्वारा शांति समझौतों को नहीं मानना (उदाहरण के लिए बोडो गुटों एवं सरकार के बीच हुए समझौते को कई अलगाववादी गुटों के द्वारा विरोध करते हुए असम में बंद का ऐलान किया गया है।)
  • चीन और पाकिस्तान के द्वारा आतंकवादियों के परोक्ष सहायता पर रोक लगाना

इस प्रकार अगर देखे तो अभी भी असम की कई सारी समस्याएं विद्यमान है जिस को सुलझाने के लिए सरकार को ना केवल कुशल नीति एवं उचित कूटनीतिक सफलता भी हासिल करनी होगी। जिससे पूर्वोत्तर भारत में शांति की स्थापना हो।