(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) परिसीमन आयोग: क्यों सवालों के घेरे में? (Delimitation Commission : Why are Questions Being Raised in North East?)


(डेली न्यूज़ स्कैन - DNS हिंदी) परिसीमन आयोग:  क्यों सवालों के घेरे में? (Delimitation Commission : Why are Questions Being Raised in North East?)



हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और असम सरकार से एक याचिका पर जवाब मांगा. इस याचिका में, असम में विधानसभा और संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन की प्रक्रिया पर सवाल उठाये गए हैं। इसमें इस आधार पर परिसीमन प्रक्रिया का विरोध किया गया है कि परिसीमन का आधार 2001 की जनगणना को बनाया जा रहा है, जबकि सरकार के पास 2011 की जनगणना के आंकड़े भी हैं. मौजूदा वक्त में, 2021 की जनगणना का काम भी चल रहा है। इसके अलावा, चुनाव आयोग के पूर्व विधिक सलाहकार एसके मेंदीरत्ता ने सरकार द्वारा नए परिसीमन आयोग के गठन के फैसले को 'अवैध' और 'असंवैधानिक' करार दिया है.

डीएनएस में आज हम आपको चुनाव को लेकर होने वाले परिसीमन के बारे में बताएंगे और साथ ही, समझेंगे इससे जुड़े कुछ दूसरे अहम पहलुओं को भी……

देश में या राज्य में विधायी निकाय वाले निर्वाचन क्षेत्रों की सीमा तय करने की प्रक्रिया को ही परिसीमन कहा जाता है। परिसीमन की प्रक्रिया में किसी एक राज्य के लिए आवंटित सीटों की संख्या में बदलाव संभव है. लेकिन साथ ही यह ध्यान रखा जाता है कि किसी भी राज्य के लोकसभा सीटों की संख्या और उस राज्य के जनसंख्या के बीच का अनुपात सभी राज्यों के लिए समान बना रहे. इसका मकसद समान जनसमूह को एक समान प्रतिनिधित्व और इसके लिए भौगोलिक क्षेत्र का उचित बंटवारा सुनिश्चित करना है.

हर जनगणना के बाद भारत की संसद द्वारा संविधान के अनुच्छेद-82 के तहत एक परिसीमन अधिनियम लागू किया जाता है। भारत में, ऐसे परिसीमन आयोगों का गठन अब तक 4 बार किया जा चुका है- 1952 में परिसीमन आयोग अधिनियम, 1952 के तहत; 1963 में परिसीमन आयोग अधिनियम, 1962 के तहत; 1973 में परिसीमनअधिनियम, 1972 के तहत; 2002 में परिसीमन अधिनियम, 2002 के तहत.

परिसीमन आयोग का अध्यक्ष सर्वोच्च न्यायालय का अवकाश प्राप्त जज होता है, और इसके सदस्यों में मुख्य निर्वाचन आयुक्त या मुख्य निर्वाचन आयुक्त द्वारा नामित कोई अन्य निर्वाचन आयुक्त और संबंधित राज्यों के निर्वाचन आयुक्त शामिल होते हैं. परिसीमन आयोग भारत में एक उच्च अधिकार प्राप्त निकाय है जिसके आदेशों को कानून के तहत जारी किया गया है और इन्हें किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।

गौरतलब है कि साल 1981 और 1991 के जनगणना के बाद कोई भी परिसीमन नहीं किया गया था. दरअसल जिन राज्यों ने अपने यहां जनसंख्या नियंत्रण से जुड़े प्रयासों को अच्छी तरह से लागू किया उनकी तुलना में जनसंख्या बाहुल्य वाले राज्यों को परिसीमन से कुछ फायदा हो सकता था. ऐसी संभावना थी कि जनसंख्या बाहुल्य वाले राज्यों को संसद में ज्यादा प्रतिनिधित्व मिल जाए. इन्हीं विवादों को टालने के लिए संविधान में संशोधन किया गया और परिसीमन को 2001 तक टाल दिया गया. बाद में, इसमें पुनः संशोधन करके परिसीमन को साल 2026 तक टाल दिया गया. यही वजह था कि साल 2002 में जो परिसीमन किया गया था उसमें लोकसभा की जो मौजूदा सीटें थी, उनकी बस सीमाओं में ही परिवर्तन किया गया और साथ ही, जो आरक्षित सीटें थी, उनको लेकर काम किया गया. सीटों की संख्या में कोई बदलाव नहीं किया गया.

बता दें कि 2002 में अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर और नगालैंड में परिसीमन नहीं किया गया था. उस समय कुछ संगठनों ने गुवाहाटी हाई कोर्ट में परिसीमन की प्रक्रिया को चुनौती दी थी. उनका कहना था कि जब इन राज्यों में अभी एनआरसी की प्रक्रिया चल रही है तो ऐसे में, परिसीमन के लिए साल 2001 के जनगणना आंकड़ों का इस्तेमाल करना ठीक नहीं होगा. इसीलिए तत्कालीन राष्ट्रपति ने 2008 में इन चार राज्यों में परिसीमन को न करने का आदेश दे दिया. लेकिन इस साल 28 फरवरी को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने 2008 के आदेश में बदलाव करते हुए इन चारों राज्यों में परिसीमन करने का आदेश जारी कर दिया. अब अगर इन चार राज्यों में परसीमन की प्रक्रिया आगे बढ़ती है, तो सीटों की संख्या में कोई बदलाव नहीं होगा. बस संसदीय क्षेत्रों की सीमा में बदलाव और सीटों के आरक्षण को लेकर काम किया जाएगा.

अब सवाल यह उठता है कि निर्वाचन आयोग की विधिक सलाहकार एसके मेंदीरत्ता ने सरकार द्वारा परिसीमन के फैसले को 'गैरकानूनी' और 'असंवैधानिक' क्यों कहा? दरअसल साल 2008 में जनप्रतिनिधित्व कानून 1950 में संशोधन करके उसमें सेक्शन 8ए जोड़ा गया था. इसके मुताबिक परिसीमन का काम अब चुनाव आयोग ही देखेगा, यानी इसके लिए अलग से परिसीमन आयोग गठित करने की जरूरत नहीं होगी. ऐसे में, सरकार द्वारा नए परिसीमन आयोग का गठन किया जाना 'गैरकानूनी' और 'असंवैधानिक' है. बहरहाल, नए परिसीमन आयोग और उसके कामों का भविष्य क्या होगा यह तो अब अदालत ही तय करेगी.